Fake Encounter Case. फरजी एनकाउंटर के मामले में सीबीआई की विशेष अदालत ने उत्तराखंड के 17 पुलिसकर्मियों को उम्रकैद की जो सजा सुनाई है, उस से रविंद्र सिंह के परिजनों ने राहत महसूस की है. लेकिन इस फैसले से झूठी वाहवाही लूटने वाले पुलिसकर्मियों को भी सबक लेना चाहिए.
6 जून, 2014 को दिल्ली के तीसहजारी कोर्ट में अन्य दिनों की अपेक्षा बहुत भीड़भाड़ थी. इस की वजह यह थी कि उस दिन सीबीआई के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश जे.पी.एस. मलिक की अदालत में एक खास मामले पर फैसला सुनाया जाना था. यह खास मामला था गाजियाबाद के एमबीए के छात्र रणवीर सिंह को उत्तराखंड पुलिस द्वारा तथाकथित मुठभेड़ में मार गिराने का. मृतक रणवीर सिंह के घर वाले इस मुठभेड़ को फरजी बता रहे थे. सीबीसीआईडी के बाद इस मामले की जांच सीबीआई को मिली थी.
मृतक रणवीर सिंह के पिता रविंद्र सिंह अपने बड़े बेटे संदीप सिंह और परिवार के अन्य लोगों के साथ सुबह 10 बजे ही सीबीआई कोर्ट पहुंच गए थे. दूसरी ओर उत्तराखंड पुलिस के जिन 18 पुलिसकर्मियों पर फरजी मुठभेड़ का आरोप लगा था, उन सभी के परिजन भी न्यायालय में मौजूद थे. अनेक मीडियाकर्मी और वकील भी कोर्ट रूम में सुबह से ही जमे हुए थे.
निर्धारित समय पर सीबीआई के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश जे.पी.एस. मलिक कोर्ट में बैठे तो वहां मौजूद सभी लोगों की निगाहें उन पर जम गईं. उन के सामने जब इस केस की फाइल पेश की गई तो फाइल देखने के बाद उन्होंने कहा कि फैसला आज दोपहर 2 बजे सुनाया जाएगा.
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दोपहर 2 बजे से पहले ही कोर्ट फिर से खचाखच भर गया. कोर्ट ने जब फैसला सुनाने से पहले सभी आरोपी पुलिसकर्मियों को अदालत कक्ष में बुलाया तो मृतक के परिजनों की आंखों में उन के प्रति आक्रोश साफ दिखाई दे रहा था.






