कड़ाके की सर्दी हो और ऊपर से बरसात हो जाए तो सर्दी के तेवर और भी भयावह हो जाते हैं. रोज की तरह दोपहर को भोगनाथ बिट्टू के घर पहुंचा तो वह रजाई में लिपटी बैठी थी. दोनों एकदूसरे को देख कर मुसकराए, फिर हथेलियां रगड़ते हुए भोगनाथ बोला, ‘‘आज तो गजब की सर्दी है.’’
‘‘इसीलिए तो रजाई में दुबकी बैठी हूं,’’ बिट्टू बोली, ‘‘रजाई छोड़ने का मन ही नहीं कर रहा, लेकिन तुम इतनी ठंड में कहां घूम रहे हो?’’
‘‘घूम नहीं रहा, सुबह से तुम्हें देखा नहीं था, इसलिए रोज की तरह तुम से मिलने चला आया,’’ भोलानाथ ने जवाब दिया, ‘‘सोचा था, तुम आग ताप रही होगी तो मैं भी हाथ सेंक लूंगा, लेकिन यहां तो हालात दूसरे ही है. लगता है मुझ से ज्यादा तुम्हें गर्मी की जरूरत है. दूसरे तरीके से हाथ सेंक कर मुझे तुम्हारी ठंड दूर करनी होगी.’’ कहने के बाद भोगनाथ ने बिट्टू का चेहरा अपने हाथों में ले लिया.
बिट्टू ने एक झटके से अपना चेहरा अलग कर लिया और ठंडे हो गए गालों पर हथेलियां मलते हुए बोली, ‘‘हटो भी, कितने ठंडे हैं तुम्हारे हाथ, एकदम बर्फ जैसे.’’
‘‘बिट्टू, कुछ चीजें ठंडी जरूर लगती हैं, लेकिन उन की तासीर बड़ी गर्म होती है,’’ भोगनाथ ने चुहल की, ‘‘मेरी बात पर विश्वास न हो तो आजमा कर देख लो. 2 मिनट में मेरे हाथ तुम्हें गर्म तो लगने ही लगेंगे, खुद भी इतनी गर्म हो जाओगी कि रजाई शरीर से उतार फेंकोगी.’’
भोगनाथ के कथन का आशय समझ कर बिट्टू के गाल सुर्ख हो गए. वह उसे मीठी फटकार लगाते हुए बोली, ‘‘मैं तुम से कई बार कह चुकी हूं कि इस तरह की बातें मत किया करो. लेकिन तुम हो कि मानते ही नहीं.’’
भोगनाथ ने थोड़ा आगे की ओर झुक कर बिट्टू की आंखों में झांका, ‘‘तो फिर कैसी बातें किया करूं?’’
‘‘वैसी ही अच्छीअच्छी बातें, जैसे दूसरे प्रेमी करते हैं.’’
‘‘प्रेमियों की बात कहीं से भी शुरू हो, जिस्म पर ही पहुंच कर खत्म होती है.’’
‘‘भोग, अभी हमारी शादी नहीं हुई है.’’
‘‘शादी भी जल्दी हो जाएगी.’’
‘‘तब जो मन में आए, बातें कर लेना.’’
‘‘बातें तो अभी भी कर रहा हूं. शादी के बाद तो कुछ और करूंगा.’’
बिट्टू को उस की बातों में रस आने लगा. मुसकरा कर उस ने पूछा, ‘‘शादी के बाद क्या करोगे?’’
‘‘कह कर बताऊं या कर के?’’
‘‘फिर शुरू हो गए.’’
‘‘उकसा तो तुम ही रही हो,’’ भोगनाथ मुसकराया, ‘‘लगता है तुम्हारा मन डोल रहा है.’’
जवाब में मुंह खोलने के लिए बिट्टू ने मुंह खोला ही था कि तभी हवा का तेज झोंका बरसात की ठंडी फुहारों को खुले दरवाजे के भीतर तक ले आया. ठंड से बिट्टू और भोगनाथ दोनों के बदन सिहर उठे. बिट्टू ने रजाई को और मजबूती से लपेट लिया, ‘‘उफ! यह बारिश और यह ठंड आज किसी की जान ले कर ही मानेगी.’’
‘‘किसी की क्या, फिलहाल तो मेरी जान पर ही बनी हुई है.’’
‘‘वो कैसे?’’
‘‘तुम ने तो सर्दी से अपना बचाव कर रखा है, मैं खुले दरवाजे के सामने खड़ा ठंड से कांप रह हूं.’’
‘‘तो दरवाजा भेड़ कर तुम भी रजाई ओढ़ लो.’’ बिट्टू के मुंह से अनायास निकल गया. यह बात उस ने कैसे कह दी. वह खुद ही नहीं समझ पाई.
भोगनाथ को शायद इसी पल की प्रतीक्षा थी. बिट्टू ने उस से दरवाजा भेड़ने को कहा था, पर उस ने दरवाजा बंद कर के सिटकनी लगा दी. उस के पास आ कर बिटटू की रजाई में घुसने लगा, ‘‘बिट्टू, तुम कितनी गर्म हो. अपने जैसा मुझे भी गर्म कर दो न?’’
‘‘मेरी रजाई में तुम कहां घुसे आ रहे हो,’’ बिट्टू ने हड़बड़ा कर कहा, ‘‘कोई आ जाए तो मैं मुफ्त में बदनाम हो जाऊंगी.’’
‘‘इश्क की दुनिया में उन का ही नाम होता है, जो बदनाम होते हैं.’’
‘‘समझने की कोशिश करो भोग,’’ बिट्टू ने प्रतिरोध किया, ‘‘तुम लड़के हो, तुम्हारा कुछ नहीं बिगड़ेगा लेकिन मैं किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहूंगी.’’
‘‘मैं चाहता भी नहीं हूं कि कोई तुम्हारा मुंह देखे. तुम्हारा मुंह देखने के लिए मैं हूं न.’’ भोगनाथ ने रजाई के साथसाथ बिट्टू को भी जकड़ लिया. बिट्टू के बदन में ठंड की सिहरन दौड़ी तो पुरुष स्पर्श की मादक अनुभूति भी हुई.
गर्म रजाई और बिट्टू के तन की गरमी से भोगनाथ का शरीर सुलगने लगा. रजाई के भीतर से ही उस ने बिट्टू की कमर में हाथ डाल दिया. बिट्टू के तनमन में चिंगारियां सी चटखने लगीं. आनंद की उठती लहरों से उस की पलकें मुंदने लगीं और सांसों की रफ्तार तेज हो गई.
दोनों चुप थे, लेकिन उन की शारीरिक गतिविधियां एकदूसरे से बहुत कुछ कह रही थीं. मस्ती में भर कर वह भोगनाथ को अपने ऊपर खींचने लगी. बिट्टू की देह को मस्त और बहकते देख कर भोगनाथ ने उसे निर्वस्त्र किया, फिर स्वयं भी निर्वस्त्र हो गया. इस के बाद दोनों एकदूसरे में समा गए.
कुछ देर में जब दोनों के तन की आग ठंडी हुई तो दोनों एकदूसरे की बांहों से आजाद हुए. उस के बाद ही बिट्टू को पता चला कि पुरुष संसर्ग कितना आनंददायक होता है.
उत्तर प्रदेश के जिला सीतापुर के पिसावां थाना क्षेत्र के गांव सरवाडीह में भगौती रहता था. उस के परिवार में उस की पत्नी रामश्री और 2 बेटियां बिट्टू, सीमा और एक बेटा शोभित था. भगौती पिसावां कस्बे में एक दुकान पर लोहे की ग्रिल बनाने का काम करता था. भगौती को मिलने वाली मजदूरी से घर का खर्च बड़ी मुश्किल से चल पाता था. घर की आर्थिक स्थिति काफी खराब थी.
घर में बिट्टू भाईबहनों में सब से बड़ी थी. बात उस समय की है, जब बिट्टू की उम्र 16 साल थी. यौवन की दहलीज पर बिट्टू की खूबसूरती निखर गई थी.
भगौती के मकान से कुछ दूरी पर केदार रहता था. उस के परिवार में पत्नी जयरानी और 3 बेटों भोगनाथ, पिंटू और शिवा के अलावा 1 बेटी सविता थी. केदार मेहनतमजदूरी कर के परिवार का भरणपोषण करता था. दोनों के घरों में काफी मेलजोल था और एकदूसरे के घर भी आनाजाना था.
आनेजाने के दौरान जवान होती बिट्टू पर भोगनाथ की नजर पड़ी तो उस की मदमस्त काया देख कर उस की नजरें उस पर जम गईं. जैसी लड़की की चाहत उस के दिल में थी, बिट्टू ठीक वैसी थी. बिट्टू का हसीन चेहरा उस की आंखों के रास्ते उस के दिल में उतरता चला गया.
घर के रास्ते पहले से खुले हुए थे. भोगनाथ की बिट्टू से खूब पटती थी. उस का कारण भी था, बिट्टू भी दिल ही दिल में भोगनाथ को पसंद करने लगी थी. धीरेधीरे वह भी उस की तरफ खिंचती चली गई. दोनों एकदूसरे से दिल ही दिल में प्यार करते थे. अपने प्यार का इजहार करने के लिए उन के पास पर्याप्त अवसर थे. इसलिए उन्हें न मोहब्बत के इजहार में वक्त लगा न इश्क के इकरार में.