Dehradun Crime: मां ने दी बेटे की सुपारी

Dehradun Crime: देहरादून में दिनदहाड़े गैस एजेंसी के मालिक अर्जुन शर्मा की हत्या से पूरे शहर में सनसनी फैल गई थी. उस की हत्या का कारण उस की मम्मी वीना शर्मा ही थी. वीना शर्मा को बेटे से ही अपनी जान का खतरा था, उस ने अदालत से सुरक्षा की गुहार भी लगाई थी. क्या हुआ जो बेटे को अपनी मम्मी की वजह से जान गंवानी पड़ी? पढ़ें, प्रौपर्टी और गैस एजेंसी विवाद में लिपटी हत्या की यह हाईप्रोफाइल कहानी…

इसी साल फरवरी का महीना था. सर्द हवाएं चल रही थीं. धूप निकली हुई थी. 11 फरवरी को सुबह के करीब साढ़े 10 बजने वाले थे. बाजार में लोगों का आनाजाना बढ़ चुका था. अचानक देहरादून की तिब्बती मार्केट में ताबड़तोड़ फायरिंग होने लगी. भगदड़ मच गई. कुछ मिनटों में ही एक व्यक्ति के गोली लगने की खबर फैल गई.

कुछ लोगों ने एक गोरे नवयुवक को गोलियां लगने से घायल बीच सड़क पर ही तड़पते देखा. उन की आंखों के सामने ही उसे गोलियां मारने वाले 2 युवक स्कूटी पर आए थे. वे तुरंत फरार हो गए. किसी को उन्हें पकडऩे की हिम्मत नहीं हुई. एक व्यक्ति ने इस फायरिंग की सूचना पुलिस को दे दी. देहरादून की कोतवाली थाने की पुलिस सूचना मिलने पर कुछ मिनटों में ही मौके पर पहुंच गई. घायल युवक को अस्पताल ले जाया गया, किंतु इमरजेंसी के डौक्टरों ने युवक को मृत घोषित कर दिया.

अब बारी थी उस की पहचान की. उस में जरा भी समय नहीं लगा. कारण घटनास्थल पर ही मौजूद लोगों में कुछ उसे और उस के फेमिली वालों को जानतेपहचानते थे. मृतक के फेमिली वालों को भी इस घटना की सूचना मिल गई थी. इस तरह मृतक की पहचान कर्नल रमेश चंद शर्मा के बेटे अर्जुन शर्मा के रूप में हुई, जो इंदिरा नगर कोतवाली बसंत विहार का निवासी था. वह देहरादून की जीएमएस रोड स्थित अमरदीप गैस एजेंसी का मालिक था.

उस की दिनदहाड़े राजधानी में हुई हत्या से पुलिस भी भौचक रह गई थी. हत्यारों का पता लगाने और उन्हें पकडऩे की पुलिस प्रशासन के सामने एक बड़ी चुनौती आ गई थी. जांच की शुरुआत एसएचओ संतोष कुंवर की देखरेख में फोरैंसिक टीम से हुई. मौके पर आला पुलिस अधिकारी भी पहुंच कर वारदात का मुआयना करने लगे.

इन में एसएसपी अजय सिंह, सीओ अनुज आर्य, कोतवाल संतोष कुंवर, एसओजी इंसपेक्टर मुकेश त्यागी, एसआई दीपक धारीवाल के अलावा सिपाहियों में आशीष शर्मा, संदीप, ललित आदि ने परेड ग्राउंड स्थित तिब्बती मार्केट का हर तरह से मुआयना किया. उन्होंने घटना के बारे में जानकारी लेने के दरम्यान आसपास के लोगों से पूछताछ की.

वहां मौजूद लोगों ने बताया कि अर्जुन शर्मा वहां हर रोज सुबह टेनिस खेलने आता था और फिर जिम जाता था. घटना वाले दिन जब वह जिम से निकला था तब उस ने पहले एक फल के ठेले वाले से एक अनानास खरीदा था.  इस के बाद जब वह अपनी कार की ओर जाने लगा. तभी स्कूटी सवार 2 युवक वहां आए और उन्होंने अर्जुन शर्मा पर फायरिंग कर दी थी. इस के बाद दोनों तुरंत स्कूटी से ही फरार हो गए थे.

फोरैंसिक टीम ने घटनास्थल की कई कोणों से तसवीरें लीं और वहां से हत्यारों के फिंगर प्रिंट के नमूने इकट्ठा कर लिए. इस काररवाई के दरम्यान एसपी (सिटी) प्रमोद कुमार और एसएसपी अजय सिंह भी मौजूद थे. उन्होंने जांच टीम को आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों द्वारा हत्यारों की पहचान करने और सीओ अनुज आर्य को मृतक के फेमिली वालों के बारे में तमाम जानकारी जुटाने के निर्देश दिए.

जांच अधिकारी मृतक की पत्नी अभिलाषा से मिले. उस से पूछताछ की. उस ने रोते हुए बताया कि उस के पति अर्जुन शर्मा की हत्या पारिवारिक विवाद के कारण कर दी गई. गैस एजेंसी को ले कर पति का उन की मम्मी बीना शर्मा के साथ ही विवाद चल रहा था, जो अदालत तक जा पहुंचा था. इस बारे में अभिलाषा ने बताया कि उस की सास बीना शर्मा ने अपने बेटे अर्जुन से जान का खतरा बता कर अदालत से सुरक्षा की गुहार भी लगाई थी.

इस के बाद अदालत ने उन्हें एक महिला सुरक्षाकर्मी उपलब्ध करवा दी थी. कारोबारी विवाद के बारे में अभिलाषा ने विस्तार से बताया. उस ने पुलिस को बताया कि इस विवाद में सास बीना शर्मा के साथ कारोबारी विनोद उनियाल और डा. अजय खन्ना भी शामिल हैं. इन के बीच लेनदेन को ले कर एक मुकदमा न्यायालय में चल रहा है.

सास पर लगाया आरोप

इसी के साथ अभिलाषा ने आरोप लगाया कि पति की हत्या करवाने में इन लोगों का ही हाथ है. अभिलाषा शर्मा से डीआईजी राजीव स्वरूप ने भी पूछताछ की. अभिलाषा की तहरीर पर कोतवाली में अर्जुन की हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया गया. एफआईआर संबंधित धाराएं लगा कर अगले चरण की जांच आगे बढ़ा दी गई.

अर्जुन शर्मा के हत्यारों को पकडऩे के लिए एसएसपी द्वारा पुलिस की 5 टीमें गठित की गईं. उन्हें जिले के कई स्थानों पर तैनात कर दिया गया. टीम की सक्रियता का असर हुआ कि 12 फरवरी, 2026 की सुबह पुलिस को अर्जुन शर्मा की हत्या करने वाले शूटर के कोतवाली डोईवाला के क्षेत्र लाल टप्पड़ में छिपे होने की जानकारी मिली. इस सूचना पर पुलिस की 2 टीमें वहां पहुंच गईं. वहां से उसे अगली सुबह करीब साढ़े 3 बजे दबोच लिया गया.

घटनास्थल की जांच करती फोरेंसिक टीम

शूटर के पास से हथियार भी बरामद कर लिया गया. उस ने अपना नाम पंकज राणा बताया. वह इंदिरा कालोनी चक्खूवाला, देहरादून का निवासी था. जल्द ही दूसरा शूटर भी रायपुर के लाड़पुर के जंगल में मुठभेड़ के दौरान पकड़ लिया गया. दोनों के पैर में गोली लग गई थी. उस ने अपना नाम राजीव बताया  दोनों शूटर पंकज और राजीव सगे भाई निकले. पता चला कि पंकज कई सालों से विनोद उनियाल का ड्राइवर है. दोनों घायल शूटरों को प्राथमिक उपचार करवाया गया. उस के बाद मजिस्ट्रैट के सामने उन के बयान दर्ज करवाए गए.

हत्याकांड से संबंधित आगे की पूछताछ के लिए उन्हें रिमांड पर ले लिया गया. दोनों ने पूछताछ में जो कुछ बताया उस के अनुसार हत्याकांड की कहानी इस प्रकार सामने आई—

इस की जड़ में अर्जुन शर्मा के परिवार की देहरादून में ही जीएमएस रोड पर स्थित करोड़ों रुपए की बेशकीमती जमीन है. अर्जुन की मम्मी बीना शर्मा ने इस का सौदा डा. अजय खन्ना से कर दिया था. वह कुछ रकम एडवांस भी ले चुकी थी. जबकि अर्जुन यह प्रौपर्टी अजय खन्ना को नहीं बेचना चाहता था. इसे ले कर उस ने मम्मी का विरोध भी किया था. बाद में यह मामला अदालत में चला गया. इस कारण अर्जुन शर्मा अपनी मम्मी बीना, प्रौपर्टी डीलर विनोद उनियाल व  अजय खन्ना की राह का रोड़ा बन गया था.

बीना हर कीमत पर जमीन बेचने पर उतारू थी. उस ने एक दिन खतरनाक इरादा विनोद उनियाल को बताया. यह सुन कर पहले तो वह सन्न रह गया कि कोई मां अपने बेटे के खिलाफ कैसे इतना खतरनाक निर्णय ले सकती है. बीना ने अर्जुन को इस विवाद से हटाने की जिम्मेदारी विनोद को सौंप थी और उस ने अर्जुन पर जानलेवा हमला करवा कर डराने को कहा था. इस पर विनोद बोला था, ”इस में उस की जान भी जा सकती है.’’

जवाब में बीना बोली, ”वह सब मैं नहीं जानती.’’

रेकी कर मारी गोली

विनोद ने बीना के निर्देश से 2 कदम आगे बढ़ कर योजना बना डाली. उस ने अपने ड्राइवर पंकज और उस के भाई राजीव उर्फ राजू को 12 लाख रुपए की सुपारी दे दी. दोनों को 3 लाख रुपए एडवांस भी दे दिए. पंकज व राजीव को बीना शर्मा और अर्जुन शर्मा के बीच चल रहे विवाद के बारे में भलीभांति जानकारी थी. पंकज और राजीव ने अर्जुन शर्मा की दिनचर्या की रेकी कर ली थी. वह सुबह 9 बजे टेनिस खेलने के लिए तिब्बती मार्केट स्थित जिम में जाता था. इसलिए 11 फरवरी, 2026 की सुबह दोनों 10 बजे ही अर्जुन शर्मा की कार के आसपास जा कर टहलने लगे थे.

मम्मी बीना शर्मा के साथ अर्जुन शर्मा (फाइल फोटो)

जैसे ही अर्जुन वहां आया और अपनी कार की ओर जाता दिखाई दिया, वैसे ही दोनों शूटरों ने तुरंत तमंचे निकाल लिए और उस पर फायरिंग कर दी. गोली लगने से अर्जुन जमीन पर गिर गया. दोनों शूटर स्कूटी से फरार हो गए. इस के बाद दोनों ने कपड़े बदले और विनोद उनियाल के एक ठिकाने पर जा कर छिप गए. वे पुलिस की गतिविधि पर नजर रखे हुए थे, लेकिन पुलिस जांच की तीक्ष्ण निगाहों से नहीं बच पाए. शूटरों से पूछताछ के बाद बीना शर्मा समेत प्रौपर्टी डीलर विनोद उनियाल और डा. अजय खन्ना का नाम आने पर उन्हें भी हिरासत में ले लिया गया. उन लोगों से भी से 2 घंटे तक अलगअलग पूछताछ की.

उन के बयानों से बीना शर्मा, विनोद उनियाल डा. अजय खन्ना के बीच सांठगांठ का पूरा पता चल गया. उन्होंने  अर्जुन हत्याकांड में अपनी संलिप्तता कुबूल कर ली. विनोद और डा. खन्ना ने अर्जुन और उस की मम्मी के बीच मनमुटाव और विवाद का फायदा उठाया. कई साल पहले अर्जुन ने विनोद उनियाल के साथ एक औनलाइन बिजनैस भी शुरू किया था. अर्जुन का आरोप था कि उस की मम्मी बीना अकसर विनोद उनियाल को पैसे देती रहती थी.

विनोद ने कुछ साल पहले बीना की करोड़ों रुपए की पुश्तैनी जमीन की रजिस्ट्री डा. अजय खन्ना के नाम करवा दी थी. इसी बात को ले कर अर्जुन की अपनी मम्मी बीना, विनोद उनियाल और डा. अजय खन्ना से तनातनी शुरू हो गई थी, जिस का अंत अर्जुन की हत्या पर हुआ. अर्जुन इस बात से भी अपनी मम्मी से खफा था कि वह अपनी कमाई के अधिकांश हिस्सों से विनोद उनियाल के बैंक खातों को भर रही थी.

आरोपियों की गिरफ्तारी के बाद मामले का खुलासा करते पुलिस अधिकारी

अर्जुन शर्मा के फादर रमेश चंद शर्मा सेना में कर्नल थे, जो करीब 38 वर्ष पूर्व सेवा के दौरान शहीद हो गए थे. उन की शहादत पर उन की पत्नी बीना शर्मा को आजीविका चलाने के लिए गैस एजेंसी आवंटित हुई थी. परिवार में अर्जुन की पत्नी अभिलाषा के अलावा उन का साढ़े 4 साल का बेटा व ढाई साल की बेटी बची है. अर्जुन शर्मा और उस की मम्मी के बीच शहीद कर्नल की विरासत पर कब्जे की जंग वर्ष 2024 में तब शुरू हो गई थी, जब बीना शर्मा ने अपने बेटे अर्जुन से अपनी जान को खतरा बताते हुए हाईकोर्ट नैनीताल से सुरक्षा मांगी थी.

इस के अलावा बीना शर्मा ने 2024 में अपने ही बेटे अर्जुन पर मारपीट करने का एक मुकदमा भी दर्ज करवा दिया था. मांबेटे में जंग और ज्यादा तब भड़क गई थी, जब बीना शर्मा ने अपनी पुश्तैनी प्रौपर्टी विनोद उनियाल के माध्यम से डा. अजय खन्ना के नाम कर दी थी. हालांकि अर्जुन ने 14 करोड़ रुपए की डील वाली इस प्रौपर्टी पर सिविल कोर्ट से स्टे ले लिया था. इस तरह अर्जुन शर्मा की कानूनी लड़ाई सीधेसीधे अपनी मम्मी के अलावा विनोद और डा. अजय से थी. डा. अजय खन्ना इंडियन मैडिकल असोसिएशन का अध्यक्ष भी है. वह एसके मेमोरियल के नाम से एक अस्पताल भी चलाता है.

इंसपेक्टर (एसओजी) मुकेश त्यागी

डा. अजय करोड़ों रुपए खर्च करने के बाद संपत्ति का उपयोग नहीं कर पा रहा था. इस से वह खार खाए हुए था. वह देहरादून में स्थित अपने अस्पताल का और विस्तार करना चाहता था. अर्जुन शर्मा की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का कारण पेट में गोली लगने से ज्यादा खून निकलना बताया गया था. कथा लिखे जाने तक पांचों आरोपी जेल में बंद थे. Dehradun Crime

 

 

Social Story in Hindi : ब्याज के कर्ज में फंसे डॉक्टर ने कर ली आत्महत्या

Social Story in Hindi : ज्यादातर सूदखोरों का धंधा अवैध रूप से और दबंगई के बूते पर चलता है. कोई व्यक्ति इन के चंगुल में फंस जाता है तो वह इन की ब्याजरूपी दलदल से मुश्किल से निकल पाता है. डा. सिद्धार्थ तिगनाथ भी इन के जाल में इस कदर उलझ गए थे कि करोड़ों रुपए अदा करने के बाद भी वह…

22 अप्रैल, 2021 की शाम लगभग 5 बजे की बात है. मध्य प्रदेश के जिला नरसिंहपुर शहर की कोतवाली के टीआई उमेश दुबे को सूचना मिली कि नरसिंहपुर-करेली रेलमार्ग पर स्थित टट्टा पुल के पास रेल पटरियों पर एक आदमी की लाश पड़ी है. सूचना मिलने के बाद पुलिस मौके पर पहुंची तो रेल पटरियों के बीच में एक आदमी की लाश क्षतविक्षत हालत में पड़ी थी. लग रहा था जैसे उस ने जानबूझ कर आत्महत्या की हो. वह अचानक दुर्घटना का मामला नहीं लग रहा था. उस आदमी का चेहरा पहचानने में नहीं आ रहा था. पुलिस ने सब से पहले वह शव रेल लाइनों  के बीच से हटवा कर साइड में रखवा दिया ताकि उस लाइन पर ट्रेनों का आवागमन सुचारू रूप से हो सके.

इस के बाद उस के कपड़ों की तलाशी ली तो पैंट की जेब में एक मोबाइल फोन और एक चाबी मिली. तब तक कई लोग वहां इकट्ठे हो चुके थे. पुलिस ने उन से लाश की शिनाख्त करानी चाही, लेकिन कोई भी मृतक को नहीं पहचान सका. पुलिस जांच कर ही रही थी कि तभी किसी ने पुलिस को रेल लाइन के नजदीक  सड़क पर खड़ी एक लावारिस स्कूटी के बारे में जानकारी दी. जांच में वह स्कूटी वहां जमा भीड़ में से किसी की नहीं थी. एक पुलिसकर्मी ने स्कूटी की डिक्की खोली तो उस में शादी का निमंत्रण कार्ड मिला, जिस के आधार पर पता चला कि वह शादी का कार्ड डा. सिद्धार्थ तिगनाथ के नाम का था.

कोतवाली पुलिस ने लाश का पंचनामा तैयार कर पोस्टमार्टम के लिए वह जिला अस्पताल भेज दी. इस के बाद भादंवि की धारा 174 (संदिग्ध मृत्यु) का मामला दर्ज कर लिया. सिद्धार्थ तिगनाथ कोई मामूली इंसान नहीं थे. वह शहर के एक जानेमाने डाक्टर थे. इसलिए पुलिस ने मोबाइल फोन के जरिए डा. सिद्धार्थ तिगनाथ के घर वालों की सूचना दी. उस समय सिद्धार्थ के पिता डा. दीपक तिगनाथ अपने ही रेवाश्री हौस्पिटल में मरीजों का इलाज कर रहे थे. जैसे ही उन्हें सिद्धार्थ के रेल से कटने की सूचना मिली, वे अपना होश खो बैठे. आननफानन में अस्पताल का स्टाफ डा. दीपक तिगनाथ और घर वालों को ले कर जिला अस्पताल पहुंच गए.

अस्पताल में सिद्धार्थ का शव देख कर घर वालों का रोरो कर बुरा हाल हो रहा था. सिद्धार्थ की पत्नी अपने 5 साल के बेटे को सीने से चिपकाए बिलख रही थी. घर वालों को यह समझ नहीं आ रहा था कि आखिरकार सिद्धार्थ ने इस तरह का आत्मघाती कदम क्यों उठा लिया. डा. सिद्धार्थ तिगनाथ नगर के प्रतिष्ठित कांग्रेसी नेता एवं पेशे से दंत चिकित्सक थे. सोशल मीडिया पर यह खबर पूरे जिले में जब वायरल हुई तो किसी को यकीन ही नहीं हुआ कि एक हाईप्रोफाइल डाक्टर फैमिली का सदस्य आत्महत्या जैसा कदम उठा सकता है. लौकडाउन के बावजूद देखते ही देखते जिला अस्पताल में डा. तिगनाथ के रिश्तेदार और उन के प्रशंसकों की भीड़ जमा होने लगी.

सिद्धार्थ की एकलौती बहन गार्गी रीवा में थी. दूसरे दिन जब वह नरसिंहपुर पहुंची तो पोस्टमार्टम के बाद सिद्धार्थ का अंतिम संस्कार किया गया. जब 5 साल के बेटे ने डा. सिद्धार्थ की चिता को मुखाग्नि दी तो उपस्थित घर वालों एवं अन्य लोगों की आंखों से आंसुओं की झड़ी लग गई. प्रारंभिक जांच में पुलिस ने डा. सिद्धार्थ तिगनाथ के कुछ मित्र और परिजनों के बयान दर्ज किए. मामले की तहकीकात के लिए पुलिस ने सिद्धार्थ के पिता डा. दीपक तिगनाथ, मां ज्योति तिगनाथ, पत्नी नेहा के अलावा नरसिंहपुर के सुरेश नेमा, शेख रियाज, प्रसन्न तिगनाथ, घनश्याम पटेल कुंजीलाल गोविंद पटेल के बयान दर्ज किए. इस के बाद पुलिस टीम ने रेलवे स्टेशन नरसिंहपुर के स्टाफ के बयान दर्ज किए.

इस से पता चला कि डा. सिद्धार्थ ने ट्रेन से कट कर अपनी जीवनलीला समाप्त की थी. रेलवे स्टाफ ने पुलिस को बताया कि ट्रेन के ड्राइवर के हौर्न बजाने के बाद भी सिद्धार्थ रेल पटरियों से दूर नहीं हुए थे. मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर मुख्यालय में  रेवाश्री हौस्पिटल एक बड़ा प्राइवेट हौस्पिटल है, जिस के डायरेक्टर डा. दीपक तिगनाथ हैं.  मैडिसिन में एमडी डिग्रीधारी कार्डियोलौजिस्ट डा. दीपक तिगनाथ पिछले 4 दशकों से पूरे जिले में अपनी चिकित्सा सेवाएं दे रहे हैं. डा. दीपक तिगनाथ के परिवार में एक बेटा सिद्धार्थ और एक बेटी गार्गी है. गार्गी की  रीवा के रहने वाले अजय शुक्ला से शादी हो चुकी है. डा. दीपक तिगनाथ का बेटा सिद्धार्थ दंत चिकित्सक के रूप में रेवाश्री हौस्पिटल में ही अपने पिता की तरह लोगों का इलाज करते थे. परिवार में डा. सिद्धार्थ की पत्नी नेहा और उन का 5 साल का एक बेटा है.

सिद्धार्थ की शुरुआती शिक्षा रीवा के सैनिक स्कूल में हुई. उन के दादाजी गणित के शिक्षक थे, इसलिए गणित उन का पसंदीदा विषय था. क्रिकेट में भी उन की बेहद दिलचस्पी रहती थी. स्कूली पढ़ाई के बाद सिद्धार्थ बीडीएस की डिग्री ले कर दंत चिकित्सक बने, उन की इंटर्नशिप देख उन के सीनियर ने उन्हें सफल सर्जन बनने की सलाह दी. पिता भी एक सफल डाक्टर थे, वही सब अच्छे गुण विरासत में उन्हें भी मिले. राजनीति में भी सक्रिय थे डा. सिद्धार्थ चिकित्सा के साथ राजनीति को वह समाज सेवा का एक सफल माध्यम मानते थे. इसी कारण से वह राजनीति एवं प्रशासनिक की पढ़ाई के लिए पुणे स्थित पूर्व चुनाव आयुक्त टी.एन. शेषन के संस्थान में गए.

इसी संस्थान में पढ़ाई के दौरान ‘चिकित्सा पद्धति एवं उस का क्रियान्वयन कैसा हो’ विषय पर अपनी थीसिस के माध्यम से अपने विचार जब टी.एन. शेषन के सामने रखे तो शेषन डा. सिद्धार्थ से बहुत प्रभावित हुए. उन्होंने कहा था कि राष्ट्र को ऐसे ही परिपक्व और उत्कृष्टता दे सकने वाले तुम्हारे जैसे नौजवानों की जरूरत है. डा. सिद्धार्थ तिगनाथ एक समय जिले की राजनीति में कांग्रेसी नेता के रूप में सक्रिय रहे थे. सन 2011 में उन्हें प्रदेश के 2 बड़े नेता कमलनाथ और सुरेश पचौरी ने होशंगाबाद लोकसभा क्षेत्र के उपाध्यक्ष की कमान सौंपी थी. लोकसभा क्षेत्र में संगठन की मजबूती के लिए उन्होंने रातदिन काम किया.

किसान आंदोलन हो या उन की फसलों का मुआवजा, जहां प्रशासनिक व्यवस्था धराशाई हो जाती थी, वे किसानों को बातचीत के लिए तैयार करते. किसी कैंसर पेशेंट को क्या सहायता मिल सकती है, वह उसे पूरी मदद अपने माध्यमों से करते. चिलचिलाती गरमी में स्टेशन पर पानी के पाउच बांटते, ऐसी नेतागिरी वह अपने दम पर तन मन धन से करते थे. तिगनाथ फैमिली को पूरे इलाके में उन की दौलत और शोहरत के कारण जाना जाता था. हर किसी के सुखदुख में तिगनाथ फेमिली हमेशा साथ रहती. डा. सिद्धार्थ अपने व्यवहार एवं शैली के चलते थोड़े से समय में ही सब के चहेते बन चुके थे.

कहते हैं कि जीवन में यदि खुशियां हैं तो दुखों के पहाड़ भी आते हैं. कुछ लोग इन पहाड़ों को काट कर रास्ता बना लेते हैं तो कुछ लोग एक चट्टान के आगे अपनी हार मान कर निराश हो जाते हैं. डा. सिद्धार्थ ने भी 41 साल की उम्र में एक गलत फैसला ले कर अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली और अपने भरेपूरे परिवार को यादों के सहारे छोड़ गए. डा. सिद्धार्थ सूदखोरों के बनाए चक्रव्यूह में इस कदर फंस चुके थे कि उस से बच कर  निकलना नामुमकिन था. उन के पिता भी अपनी दौलत बेटे के कर्ज की रकम चुकाने में कुरबान कर चुके थे, फिर भी सूदखोरों का कर्जा जस का तस बना हुआ था. क्यों जरूरत पड़ी कर्ज की डा. सिद्धार्थ की सोच थी कि जिले के नौजवानों को रोजगार के उचित अवसर नहीं मिलते.

इसलिए उन्होंने सन 2016 में ‘विश्वभावन पालीमर’ नाम की फैक्ट्री की शुरुआत की और बेरोजगार जरूरतमंद नौजवानों को उस में रोजगार दिया. इसी दौरान उन्होंने ‘रेवाश्री इंस्टीट्यूट औफ पैरामैडिकल साइंसेस’ कालेज की शुरुआत की, जिस में स्थानीय युवकयुवतियों को मैडिकल की पढ़ाई के साथसाथ रोजगार दे कर उन्हें पगार देनी शुरू की थी. अपने कारोबार को बढ़ाने के लिए वह पैसे की व्यवस्था में लग गए. 2016 की नोटबंदी से कोई अछूता नहीं बचा था. कारोबार में पैसे की जरूरत ने उन्हें स्थानीय सूदखोरों की तरफ धकेला. इसी दौरान सूदखोर आशीष नेमा से उन का संपर्क हुआ. आशीष नेमा अपने साथियों भागचंद यादव, राहुल जैन, धर्मेंद्र जाट, सुनील जाट, अजय जाट के साथ मिल कर सूदखोरी का काम करता था.

स्थानीय लोग बताते हैं कि जो भी जरूरतमंद इन के चंगुल में फंस जाता, उसे ये सूदखोर दिन दूना रात चौगुना ब्याज लगा कर तबाह कर देते. पैसे न देने पर घर में घुस कर परिवार की महिलाओं की बेइज्जती करते और जान से मारने की धमकी देते. नरसिंहपुर और आसपास के इलाके के न जाने कितने लोग इन के कर्ज में दब कर बरबाद हो चुके थे. इन सूदखोरों के पास कर्ज देने का कोई वैधानिक लाइसैंस नहीं था. ये तो केवल अपने रसूख और दबंगई के चलते यह धंधा कर रहे थे. इन सब बातों से अंजान डा. सिद्धार्थ अपने व्यवसाय को बढ़ावा देने के लिए इन सूदखोरों से कर्ज लेने लगे. वे मानते थे कि बैंक से सस्ता लोन मिला है चुक जाएगा. लेकिन वे भूल कर बैठे कि वे उन ठगों के गिरोह की  गिरफ्त में आ गए हैं, जहां कितने ही हाथपैर मारो, दलदल में फंसते जाना है.

सूदखोरों को तो एक दुधारू गाय हाथ आ गई थी. सूदखोरों ने शुरुआत में उन्हें डेढ़दो प्रतिशत के ब्याज पर कर्जा दिया, बाद में यह ब्याज चक्रवृद्धि की तर्ज पर लगने लगा. एक समय ऐसा आया, जब डा. सिद्धार्थ से सूदखोर 120 फीसद तक ब्याज वसूलने लगे. कुछ अवसरों पर तो पैनल्टी की राशि 1 लाख रुपए प्रतिदिन तक हो गई थी. सिद्धार्थ को सूदखोरों के चंगुल से बचाने के लिए उन का पूरा परिवार मजबूती के साथ खड़ा तो हुआ लेकिन भ्रष्ट सिस्टम के आगे उन की एक न चली. सूदखोरों ने दोस्ती कर के फंसाया एक संभ्रांत परिवार का चिराग डा. सिद्धार्थ सूदखोरों के चंगुल में ऐसे फंसे कि उन के पास दुनिया छोड़ने का ही इकलौता विकल्प रह गया था. अपनी धनदौलत, मानसम्मान, जीवन सब कुछ गंवाने के बाद भी वह सूदखोरों के कर्जे तले दबते रहे.

खास बात यह है कि बरबादी के इस चक्रव्यूह की रचना आशीष नेमा नाम के उस शख्स ने की थी, जिस ने डा. सिद्धार्थ से अपनी जानपहचान को दोस्ती का रूप दिया, फिर उन्हें लुटवाने के लिए घाघ, माफिया सूदखोरों के पास ले गया. कोतवाली थाना पुलिस द्वारा इस मामले की विवेचना में यह बात सामने आई कि नरसिंहपुर शहर में लगभग 20 सूदखोरों से संबंध रखने वाला मास्टरमाइंड गुलाब चौराहा निवासी आशीष नेमा था. डा. सिद्धार्थ को सूदखोरों से मिलवाने का काम आशीष नेमा ने किया था. इस के पहले आशीष ने सिद्धार्थ से जानपहचान बढ़ा कर दोस्ती की. दोस्ती के चलते आशीष ने डा. सिद्धार्थ का दिल जीत लिया था. दरअसल आशीष को यह बात पता थी कि डा. सिद्धार्थ को पैसों की जरूरत है. इसी बात का फायदा उठा कर उस ने पहले छोटीमोटी रकम दे कर सिद्धार्थ का विश्वास हासिल कर लिया.

छोटीमोटी मदद के बाद आशीष और सौरभ रिछारिया ने शहर के नामीगिरामी सूदखोरों से मोटी रकम ब्याज पर उठवा दी. आशीष और सौरभ रिछारिया ने कर्जा तो दिला दिया, लेकिन ये सिद्धार्थ की मजबूरी का फायदा उठा कर उन्हें ब्लैकमेल करने लगे. अकसर दोनों सिद्धार्थ से ब्लैंक चैक साइन करवा के रख लेते थे और फिर उन के खिलाफ चैक बाउंस का मामला दर्ज कराने की धमकी दे कर उन से अनापशनाप तरीके से वसूली करने लगे. डा. सिद्धार्थ ने सेकेंडहैंड कारों को बेचने के लिए महिंद्रा फस्ट चौइस नाम से एक एजेंसी की शुरुआत की. इस के लिए उन्होंने 50 लाख रुपए का कर्जा आशीष के माध्यम से दूसरे सूदखोरों से लिया. इस सूदखोरी से मिलने वाली ब्याज की रकम में आशीष नेमा भी पार्टनर रहता. डा. सिद्धार्थ पर जब कर्जा बढ़ता गया तो आशीष नेमा भी अपने असली रंग में आ गया.

3 साल पहले की घटना से जुड़ीं कडि़यां डा. सिद्धार्थ की मजबूरी का फायदा उठा कर आशीष ब्याज पर ब्याज वसूलने का काम करने लगा. डा. सिद्धार्थ अपने क्लीनिक से होने वाली सारी आमदनी इन्ही सूदखोरों को देते रहे, मगर उन का कर्जा खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था, क्योंकि सूदखोरों ने ब्याज की दर 20 से ले कर 120 फीसद तक कर दी थी. उन की एजेंसी की सभी कारें भी सूदखोरों ने हथिया लीं. पुलिस घटना के सभी पहलुओं की जांच में लगी थी. पुलिस ने जब अपने थाने के रिकौर्ड की पड़ताल की तो एक अहम जानकारी हाथ लगी. करीब 3 साल पहले डा. तिगनाथ फैमिली द्वारा नरसिंहपुर के कुछ सूदखोरों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई गई थी.

6 मई, 2018 को तिगनाथ परिवार के सभी सदस्यों ने तत्कालीन एसपी को एक लिखित शिकायत दे कर बताया था कि नगर के कुछ सूदखोरों ने उन के घर में घुस कर गालीगलौज कर जान से मारने की धमकी दी थी. सबूत के तौर पर तिगनाथ फैमिली ने अपने घर पर लगे सीसीटीवी फुटेज, काल रिकौर्डिंग भी पुलिस को उपलब्ध कराई थी. इस मामले में 7 मई, 2018 को डा. सिद्धार्थ के अलावा उन के पिता डा. दीपक तिगनाथ, मां और पत्नी ने जबलपुर में तत्कालीन आईजी से मुलाकात कर उन्हें भी सूदखोरों की प्रताड़ना के सबूत दिए थे. 19 मई, 2018 को सिद्घार्थ तिगनाथ अपनी मां, पत्नी के साथ तत्कालीन एसपी मोनिका शुक्ला से मिले थे. उन्हें सूदखोरों के खिलाफ सारे सबूत और 8 लाख की लूट संबंधी प्रमाण भी दिए गए थे.

पुरानी फाइलों के पन्ने पलटने पर पुलिस का संदेह यकीन में बदल चुका था कि डा. सिद्धार्थ ने सूदखोरों की प्रताड़ना की वजह से ही यह आत्मघाती कदम उठाया है. पूरे मामले की जांच कर रहे एसआई जितेंद्र गढ़वाल को एक डायरी हाथ लगी, जिसे पढ़ कर मालूम हुआ कि सूदखोरों के चक्रव्यूह में बुरी तरह फंस चुके थे. डा. सिद्धार्थ की डायरी ने खोले अहम राज डा. सिद्धार्थ ने अपनी डायरी में मौत से पहले लिखा था, ‘मैं इस विश्वास के साथ दुनिया छोड़ रहा हूं कि मैं सच्चा और इज्जतदार था. बहुत बड़ा योगदान दे सकता था, पर मेरे जीवन में धूर्त लोगों का जमघट रहा है. पिछले 10 सालों से अब बहुत हुआ, इस संसार में रिस्की है अच्छा होना.

कमलनाथजी, मोदीजी अवैध सूदखोरी, चैक रख कर ब्लैकमेलिंग करने वालों के खिलाफ कानून जरूर बनाइएगा. शायद मेरी जिंदगी का एक अर्थ निकले. ‘मेरा ये लेटर मीडिया को जरूर देना. शायद इस दबाव में पुलिस कुछ काररवाई करे. जब जीवित रहते किसी ने उन की बात नहीं सुनी तो डायरी में ये सब कुछ लिख कर, अपने जीवन को ही सबूत के तौर पर भेंट चढ़ा दिया. इस विश्वास के साथ कि उन्हें न्याय मिलेगा और सरकार इन अपराधों को रोकने के लिए कुछ कानून बनाएगी, जिस से भविष्य में कोई इन सूदखोरों के चक्र में न फंसे.’ डायरी पढ़ कर पता लगा कि प्रतिदिन एक लाख रुपए तक की पैनल्टी लगा कर सूदखोरों ने सिद्धार्थ और उन के पूरे परिवार को जिस तरह से प्रताडि़त किया, उस की कहानी सुनने मात्र से रोंगटे खड़े हो जाते हैं.

10 से 20 फीसद के ब्याज से शुरू हुआ यह खेल आखिरकार 120 फीसद ब्याज की दर के कर्ज तक जा पहुंचा था. चंद लाख रुपए का कर्जा लेने वाले डा. सिद्धार्थ तिगनाथ ब्याज की अदायगी करतेकरते ही 5 करोड़ रुपए से अधिक की धनराशि सूदखोरों को दे चुके थे. बावजूद इस के सूदखोर कर्जा उतरने ही नहीं दे रहे थे. नतीजतन परिवार की चलअचल संपत्ति गंवा चुके डा. सिद्धार्थ तिगनाथ ने आखिरकार बीती 22 अप्रैल को दुनिया से अलविदा कह दिया. इस के पूर्व वह एक ऐसी डायरी लिख कर गए, जिस में अपनी मौत का जिम्मेदार सूदखोरों की प्रताड़ना को बताया. उन की डायरी के पन्नों में नरसिंहपुर के लगभग 20 से अधिक सूदखोरों के नाम और अभी तक उन को दिए गए पैसों का पूरा हिसाब था.

मरने से पहले डा. सिद्धार्थ सूदखोरों के चंगुल में फंसे अन्य लोगों को सूदखोरों से बचाने की मार्मिक अपील भी कर गए. चला जस्टिस फार डा. सिद्धार्थ अभियान डा. सिद्धार्थ की मौत के बाद उन के परिवार वाले, राजनैतिक हस्तियां और सामाजिक कार्यकर्ता नरसिंहपुर पुलिस पर आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए दबाव बनाने लगे. समाचार पत्रों में रोज ही सूदखोरों पर शिकंजा कसने के समाचार छप रहे थे. डा. सिद्धार्थ के बहनोई अजय शुक्ला ने फेसबुक पर ‘जस्टिस फार डा. सिद्धार्थ अभियान’ छेड़ दिया था. इस मुहिम का असर रहा कि युवक कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष कुनाल चौधरी, जिला पंचायत नरसिंहपुर के पूर्व अध्यक्ष देवेंद्र पटेल ने भी डा. सिद्धार्थ को न्याय दिलाने के लिए मोर्चा खोल दिया.

उन्होंने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से ले कर डीजीपी व एसपी नरसिंहपुर तक को शिकायत कर दोषी सूदखोरों को गिरफ्तार करने की मांग की. मामले की गंभीरता को देखते हुए एसपी विपुल श्रीवास्तव ने व्यक्तिगत रुचि दिखा कर प्रकरण की जांच कराई. नतीजा यह रहा कि सिद्धार्थ की तेरहवीं के ठीक एक दिन पहले ही पुलिस ने 7 लोगों के खिलाफ आत्महत्या करने को विवश करने का मामला दर्ज कर लिया गया. लंबी पूछताछ के बाद पुलिस ने जिन 7 लोगों के खिलाफ भादंवि की धारा 306, 34 का अपराध दर्ज किया था. उन में सुनील जाट निवासी संजय वार्ड, अजय उर्फ पप्पू जाट, भागचंद उर्फ भग्गी यादव नरसिंहपुर को 6 मई 2021 को गिरफ्तार कर लिया गया.

वहीं 2 मुख्य आरोपी आशीष नेमा के कोविड पौजिटिव होने व सौरभ रिछारिया के घर में परिजन के संक्रमित होने पर ये गिरफ्तार नहीं किए गए थे. इन का जिले के बाहर इलाज चल रहा था. जबकि धर्मेंद्र जाट और राहुल जैन फरार हो गए, जिन की सरगरमी से पुलिस ने तलाश शुरू कर दी. खैरी गांव का पूर्व सरपंच धर्मेंद्र जाट अपने बीवीबच्चों को जिले से बाहर रिश्तेदारों के यहां भेज कर खुद भी भागने की फिराक में था, मगर पुलिस की सक्रियता से उसे सुबह तड़के खैरी गांव में बने उस के मकान से गिरफ्तार कर लिया. गुलाब चौराहा नरसिंहपुर निवासी राहुल जैन पुलिस को चकमा दे कर भाग गया.

30 मई, 2021 को एसआई जितेंद्र गढ़वाल को मुखबिर के माध्यम से सूचना मिली कि डा. सिद्धार्थ मामले का एक आरोपी राहुल जैन जबलपुर में छिपा हुआ है. एसआई जितेंद्र गढ़वाल, आरक्षक पंकज और आशीष की टीम वहां पहुंची तो पता चला कि वह तो जबलपुर के कछपुरा इलाके में दूध बेचने का धंधा कर रहा है. पुलिस टीम ने वहां से राहुल जैन को गिरफ्तार कर लिया .  यूं तो डा. सिद्धार्थ की डायरी में उन 20 सूदखोरों के नाम दर्ज थे जो उन से ब्याज के रूप में लाखों की रकम हड़प चुके थे, परंतु पुलिस की जांच में केवल 7 लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है. सिद्धार्थ के घर वाले इस बात को ले कर नाराज हैं.

उन का कहना है कि सभी सूदखोरों के खिलाफ कड़ी कानूनी काररवाई की जाए, जिस से अब कोई शख्स उन सूदखोरों के बनाए चक्रव्यूह में न फंस सके. कथा संकलन तक 2 मुख्य आरोपी आशीष नेमा और सौरभ रिछारिया को पुलिस गिरफ्तार नहीं कर पाई थी. Social Story in Hindi

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित