Real Crime Story: पैसे कमाने के लिए मनोहरलाल गुप्ता जो कर रहा था, वह वैसे ही गलत था, लेकिन सायरा बानो के साथ उस ने जो किया वह उस से भी ज्यादा गलत हुआ. परंतु ऐसे लोगों के लिए तो पैसा ही सब कुछ होता है. पैसे के लिए किसी की जान भी लेनी पड़े तो वे पीछे नहीं हटते.

उस काली लांसर का नंबर था एचआर 20 एफ 4529. रफ्तार ज्यादा नहीं थी, इसलिए पीसीआर की गाड़ी पर सवार एएसआई दर्शन सिंह की निगाह अचानक उस के भीतर चली गई. गाड़ी की पिछली सीट पर पड़ा कंबल उन्हें संदिग्ध लगा. ऐसा लग रहा था, जैसे कंबल के नीचे कुछ छिपाया गया है. उस वक्त सुबह के साढ़े 5 बजे थे. तारीख थी 13 जनवरी, 2016. दर्शन सिंह नाइट ड्यूटी खत्म कर के लौट रहे थे.

काली लांसर उन की पुलिस वैन के एकदम पास से निकल कर आगे बढ़ गई थी. एक तो लांसर ने पीसीआर की गाड़ी को बाईं तरफ से ओवरटेक किया था, जो यातायात नियम के विरुद्ध था, दूसरे बगल से निकलते ही लांसर के ड्राइवर ने रफ्तार बढ़ा दी थी. इस से वह संदेह के दायरे में आ गया था.  उस समय दर्शन सिंह की वैन पंचकूला के सैक्टर-19 स्थित अमरटैक्स चौक के पास थी. दर्शन सिंह ने अपने साथी एएसआई अनिल कुमार, जो गाड़ी ड्राइव कर रहे थे, से लांसर को रुकवाने को कहा.

लांसर रिहाइशी एरिया की तरफ से निकल कर चौक से वीरान जगहों की ओर जाने वाली सड़क पर मुड़ गई थी. अनिल कुमार ने वैन की रफ्तार बढ़ा कर लांसर से आगे निकाली और लांसर के ड्राइवर को रुकने का इशारा किया. ड्राइविंग सीट पर बैठे व्यक्ति ने रफ्तार कम कर के सड़क के बाएं किनारे पर कार रोक दी. ड्राइविंग सीट पर जो व्यक्ति बैठा था, वह मजबूत कदकाठी वाला था. कड़ाके की ठंड के बावजूद उस ने आधे बाजू वाली शर्ट के साथ हाफ स्वेटर पहन रखा था. भीतर बैठेबैठे ही वह नरमी से बोला, ‘‘जी सर, कोई गलती हो गई हो तो हुक्म करें.’’

लांसर के रुकते ही एएसआई दर्शन सिंह वैन से उतर कर उस के पास आ गए थे. उन्होंने ड्राइविंग सीट पर बैठे व्यक्ति से पूछा, ‘‘पुलिस को देख कर तुम ने अपनी गाड़ी की रफ्तार क्यों बढ़ाई और इस कंबल के नीचे क्या छिपा रखा है?’’

वह आदमी भी अपनी कार से बाहर आ गया था. आगे बढ़ कर दर्शन सिंह के पैर छूते हुए वह दोनों हाथ जोड़ कर बोला, ‘‘नहीं सर, आप लोगों को देख कर रफ्तार नहीं बढ़ाई. पहुंचने की जल्दी में खाली सड़क देख कर यूं ही एक्सेलेटर दबा दिया था. कंबल ठंड की वजह से रख रखा है. इस के नीचे कुछ नहीं है, अभी दिखाए देता हूं.’’

कहने के साथ ही उस आदमी ने गाड़ी का पिछला दरवाजा खोल कर कंबल बाहर निकाल लिया. उस के नीचे कुछ नहीं था, न ही उस में कुछ लिपटा था. इस के बाद एएसआई अनिल कुमार ने गाड़ी के अंदर की पूरी तलाशी ले ली. गाड़ी में कोई संदिग्ध चीज नहीं मिली.

‘‘ठीक है सर, अब मैं जाऊं? अगर चायनाश्ते की कोई सेवा हो तो बता दीजिए.’’ लांसर ड्राइवर ने कहा और बिना पुलिस वालों की ओर देखे, कंबल को मोड़ कर गाड़ी में रख दिया और ड्राइविंग सीट पर बैठने लगा.

तभी दर्शन सिंह ने उस के कंधे पर हाथ रख कर उसे गाड़ी में बैठने से रोकते हुए कहा, ‘‘ठहरो, ऐसी भी क्या जल्दी है. जरा अपना नाम, पता वगैरह तो नोट करवा दो. यह भी बताओ कि इतनी सुबह तुम कहां से आ रहे हो और कहां जा रहे हो?’’

‘‘जी सर,’’ उस ने पीछे मुड़ते हुए कहा, ‘‘मेरा नाम मनोहरलाल गुप्ता है और पिता का नाम अच्छेलाल गुप्ता. मैं चंडीगढ़ के सैक्टर 56 के फ्लैट नंबर 6308 में रहता हूं. यह मेरा अपना फ्लैट है.’’

‘‘तो इधर पंचकूला में क्या करने आए थे?’’ दर्शन सिंह ने पूछा.

‘‘पंचकूला में सैक्टर 10 में मेरा एक दोस्त रहता है.’’

‘‘क्या नाम है उस का और सैक्टर 10 के किस नंबर के मकान में रहता है तुम्हारा दोस्त?’’

‘‘उस का नाम राजन है और वह कोठी नंबर 1081 में किराए पर रहता है. वह कोठी चंडीगढ़ के किसी पुलिस अफसर की है. कल मैं अपने दोस्त से मिलने आया था तो उस ने जिद कर के अपने पास रोक लिया था. अब मैं वहीं से आ रहा हूं और घर जा रहा हूं.’’

‘‘लेकिन तुम तो चंडीगढ़ के बजाय उलटी दिशा में जा रहे हो?’’

‘‘सर, मैं ने शिमलाअंबाला हाईवे से जीरकपुर के रास्ते चंडीगढ़ जाने की सोची थी. दूसरी तरफ से जाने पर घर दूर पड़ता है.’’

‘‘चलो ठीक है, गाड़ी के कागजात चैक करवाओ, फिर चले जाना.’’

‘‘सर, गाड़ी के कागज तो इस वक्त मेरे पास नहीं हैं.’’

‘‘क्यों, यह गाड़ी तुम्हारी नहीं है क्या?’’

‘‘नहीं सर, यह मेरे एक दोस्त निशांत की गाड़ी है. उस का चंडीगढ़ के सैक्टर 45 में अपना होटल था, कुछ दिनों पहले वह होटल बेच कर कहीं चला गया. जाते वक्त यह कह कर अपनी यह कार मेरे पास छोड़ गया कि कुछ दिनों बाद आ कर गाड़ी ले जाएगा.’’

‘‘गाड़ी के कागजात नहीं दे गया?’’

‘‘नहीं सर, गाड़ी के सारे कागजात उसी के पास हैं.’’

‘‘निशांत का फोन नंबर होगा तुम्हारे पास, उस से बात करवाओ.’’ दर्शन सिंह ने कथित मनोहरलाल को गौर से देखते हुए कहा.

‘‘सर, निशांत ने अपना पुराना नंबर बदल दिया है, नया नंबर मुझे अभी तक नहीं दिया.’’

‘‘तो पुराना नंबर ही बता दो. क्या था पुराना नंबर?’’

‘‘सर, वह तो मैं ने डिलीट कर दिया है.’’

दर्शन सिंह को उस की इन बातों पर यकीन नहीं हुआ. उन का संबंध कंट्रोल रूम से था, जबकि संदिग्ध व्यक्ति से वांछित पूछताछ करना थाना या चौकी पुलिस के अधिकार में होता है. इसलिए उन्होंने मनोहरलाल से ज्यादा पूछताछ न कर के उस के बारे में सैक्टर 19 की पुलिस चौकी को बता दिया. थोड़ी देर में पुलिस चौकी के इंचार्ज एसआई राजेंद्र सिंह और थाना सैक्टर 20 के थानाप्रभारी इंसपेक्टर अजीत सिंह पुलिस टीम के साथ वहां आ पहुंचे. उन्हें संदेह था कि पकड़े गए व्यक्ति के पास चोरी की कार है और इस का संबंध किसी बड़े कार चोर गिरोह से है. उन्हें लगा कि पूछताछ में किसी बड़े कार चोर गिरोह का खुलासा हो सकता है.

मनोहरलाल से हल्कीफुल्की पूछताछ के बाद अजीत सिंह ने बरामद कार की तलाशी के लिए डिक्की खुलवाई. डिक्की में एक बोरी रखी थी, जिस का मुंह सिला हुआ था. बोरी में पालक, धनिया और मेथी भरी होने की बात कह कर मनोहरलाल ने बताया कि उस के परिवार में एक पारिवारिक फंक्शन है, उसी के लिए उस ने बीते दिन चंडीगढ़ की सदर सब्जी मंडी से ये सब्जियां खरीदी थीं. इस में संदेह जैसा कुछ नजर नहीं आया. फिर भी पुलिसिया स्वभाव के चलते अजीत सिंह ने पूछ लिया कि बोरी में कुल कितने वजन का सामान है. इस सवाल का जवाब देने में मनोहरलाल की जुबान लड़खड़ा गई. इस पर अजीत सिंह ने अपने 2 सिपाहियों से बोरी उठा कर उस के वजन का अनुमान लगाने को कहा.

पालक और धनिया वगैरह का वजन ज्यादा नहीं होता, लेकिन पुलिस के 2 जवान भी उस बोरी को आसानी से नहीं उठा सके. उन्होंने बताया कि बोरी का वजन एक क्विंटल के आसपास है. निस्संदेह बोरी में अन्य कोई भारी चीज थी. इस से संदेह का दायरा और बढ़ गया. बोरी की सिलाई उधेड़ कर उस के भीतर भरे सामान को देखने का प्रयास किया गया तो एक ऐसा अप्रत्याशित दृश्य पुलिस के सामने आया, जिसे देख सब की आंखें फटी की फटी रह गईं. बोरी में पालक व धनिया के बीच एक युवती की लाश को मोड़ कर रखा गया था. उस के हाथ और पैर पीछे की ओर बंधे हुए थे. उस की नाक से कुछ खून भी निकला था, जो जम गया था.

कार और उस के ड्राइवर की हकीकत सामने आने के बाद अजीत सिंह ने मोबाइल द्वारा घटना की सूचना जिला पंचकूला के डीसीपी अनिल धवन को दे कर उन से दिशानिर्देशन हासिल किए. इस के बाद उन्होंने पीसीआर 19 के इंचार्ज एएसआई दर्शन सिंह से तहरीर ले कर धारा 302/201/34 के तहत मुकदमा दर्ज करने के लिए थाने भिजवा दी. इसी के साथ उन्होंने मनोहरलाल गुप्ता को विधिवत हिरासत में ले कर मौके पर ही उस से पूछताछ शुरू कर दी. उस ने जल्दी ही अपना अपराध स्वीकार कर लिया. मनोहरलाल ने बताया कि मृतका का नाम सायरा बानो था और वह मुंबई की रहने वाली थी.

मनोहरलाल ने आगे बताया, ‘‘इसे मैं ने अपने दोस्त राजन गुप्ता और उस की पत्नी पायल गुप्ता के साथ मिल कर मारा है. इस की हत्या के पीछे एक लंबी कहानी है. मैं आप को हर बात विस्तारपूर्वक बताऊंगा, कोर्ट में भी वही बयान दूंगा. मैं आप लोगों का पूरा सहयोग करूंगा. बस आप लोग मेरा टौर्चर मत कीजिएगा. मैं पहले भी कुछ केसों में गिरफ्तार हो कर पुलिस की मार झेल चुका हूं.’’  कुछ देर बाद डीसीपी

अनिल धवन के अलावा सीआईए इंसपेक्टर नरेंद्र कादियान भी वहां आ पहुंचे. इन पुलिस अधिकारियों ने भी मनोहरलाल से पूछताछ की. उस के बाद अनिल धवन के निर्देश पर अजीत सिंह ने मौके की बाकी काररवाई पूरी कर लाश पोस्टमार्टम के लिए पंचकूला के सिविल अस्पताल भिजवा दिया. जरूरी काररवाई निपटा कर पुलिस मनोहरलाल को थाने के बजाय पहले पंचकूला के सेक्टर-10 स्थित राजन गुप्ता की कोठी 1081 ले गई. वह पहले ही बता चुका था कि जिस चादर में सायरा की लाश लपेट कर रखी गई थी और जिस तौलिए पर उस के खून के छीटें पड़े थे, वे राजन के घर पर ही रह गए थे.

इस समय इन चीजों को वे दोनों कहीं छिपाने गए होंगे. मनोहरलाल ही उन दोनों को पहचानता था. लिहाजा उसे साथ ले कर पुलिस गुप्ता दंपति की तलाश में लग गई. आखिर पुलिस की मेहनत रंग लाई और उसी दिन दोपहर बाद 3 बजे दोनों पंचकूला के माजरी चौक पर पुलिस को मिल गए. पुलिस ने तीनों को ले जा कर थाने में अलगअलग लौकअप में बंद कर दिया. रात में उन से कोई खास पूछताछ नहीं की गई. अगले दिन पुलिस ने तीनों को इलाका मजिस्ट्रैट के सामने पेश कर के एक सप्ताह के कस्टडी रिमांड पर ले लिया.

दालत से निपटने के बाद पूछताछ के लिए तीनों को सीआईए के पूछताछ केंद्र ले जाया गया, जहां तीनों से विस्तृत पूछताछ की गई. इस पूछताछ में तीनों ने पुलिस को जो बताया, उस से सायरा बानो हत्याकांड की सारी कहानी खुल कर सामने आ गई : चंडीगढ़ का रहने वाला मनोहरलाल गुप्ता खूब पैसा कमा कर बड़ा आदमी बनने के सपने देखता था. उस के पिता सब्जी बेचने का काम करते थे. इस काम में उसे इतनी कमाई नहीं थी कि बच्चों को साफसुथरे माहौल में रख कर सलीके से पढ़ायालिखाया जा सकता. मनोहरलाल का बड़ा भाई अशोक भी रेहड़ी पर सब्जियां लाद कर गलीमोहल्लों में बेचने जाता था. गुजारे लायक पढ़ाई कर लेने के बाद मनोहरलाल भी भाई के साथ वही काम करने लगा.

सन 2000 में जब वह 20 साल का हुआ तो सब्जी बेचने के साथसाथ वह स्थानीय सिनेमाघरों में जा कर टिकटें ब्लैक करने लगा. बाद में उसे जुए की लत लग गई तो उस का उठनाबैठना गलत लोगों के साथ हो गया. इस का नतीजा यह निकला कि वह 2 बार दुष्कर्म के केस में और एक बार ब्लाइंड मर्डर केस में जेल गया. हालांकि इन सभी आरोपों से वह बरी हो गया. लेकिन पुलिस की मार खाने के अलावा उस ने अपनी जिंदगी का काफी समय जेल में गुजारा था.

जेल से निकलने के बाद उस ने इन कामों से तौबा कर के सेक्टर-45, चंडीगढ़ के एक होटल में नौकरी कर ली. इस होटल का मालिक निशांत कुछ रहस्यमय सा व्यक्ति था. उस के बारे में मनोहरलाल बस इतना ही जान पाया था कि वह मूलरूप से हिमाचल प्रदेश का रहने वाला था. मनोहरलाल को वह समझाया करता था कि इस दुनिया में सीधे रास्ते से इतना ही कमाया जा सकता है कि गुजर होता रहे. मजे की जिंदगी जीने के लिए मोटा पैसा कमाना हो तो किसी भी उलटेसीधे काम से गुरेज नहीं करना चाहिए. दरअसल वह अपने होटल में आने वाले अपने ग्राहकों को कालगर्ल्स उपलब्ध करा कर उन से अच्छा पैसा वसूलता था. उस ने इस काम के गुर मनोहरलाल को भी सिखा दिए थे.

इस का नतीजा यह निकला कि थोड़े ही दिनों में वह भी इस काम से पैसों में खेलने लगा. इस बीच उस ने शादी कर ली और 2 बेटियों तथा एक बेटे का पिता बन गया. रहने को उस ने चंडीगढ़ के सैक्टर-56 में एक बढि़या फ्लैट खरीद लिया. निशांत के संपर्क में कई कालगर्ल्स थीं. इन्हीं में एक थी सायरा बानो. वह खुद को मुंबई की रहने वाली बताया करती थी. निशांत इस तरह की लड़कियों के बारे में जानने के लिए ज्यादा गहराई में नहीं जाता था. वह इन के जिस्म व हुस्न के हिसाब से कीमत लगा कर उन्हें ग्राहक के पास भेज देता था, जिस का 2 तिहाई हिस्सा वह अपने पास रखता था.

लड़कियों को नए नाम दे कर वह नसीहत दे दिया करता था कि वे किसी भी ग्राहक को न तो अपना असली नाम बताए और न ही कभी अपने मूल पते व परिवार वगैरह की जानकारी दें. सायरा बानो को उस ने पूनम नाम दे रखा था. निशांत बिना मेहनत के खूब पैसे बटोर रहा था. फिर भी एक दिन कई लड़कियों की कमाई समेट कर वह चंडीगढ़ छोड़ कर चला गया. होटल उस ने किसी को बेच दिया था. उस के जाने के बाद लड़कियों ने दूसरे ठिकाने ढूंढ़ लिए.

मनोहरलाल इस धंधे के गुर सीख गया था. लेकिन होटल बिक जाने की वजह से उसे आगे यह धंधा चलतेफिरते ही करना था. इसी सिलसिले में उस ने मोटी रकम का लालच दे कर सायरा को अपने साथ रख लिया. निशांत की लांसर कार उस के पास रह गई थी, जिसे वह अपने इसी काम के लिए इस्तेमाल करने लगा था. मनोहरलाल का एक जानकार था राजन गुप्ता. वह शिवमंदिर वाली गली, कीर्तिनगर, सिरसा हरियाणा का रहने वाला था. उस ने नेपाली लड़की पायल से शादी कर रखी थी और इसी तरह के धंधे के लिए पंचकूला में रह रहा था.

एक दिन अचानक उस की मुलाकात पुराने जानकार मनोहरलाल से हुई तो उस ने उसे व उस की पत्नी को पार्टनर बना कर इस काम को बड़े स्तर पर करने का मन बना लिया. धंधा करने वाली लड़कियां अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा या तो अपने घर भेज देती थीं या फिर किसी विश्वसनीय व्यक्ति पर भरोसा कर के उस के पास जमा करवाती रहती थीं.जब उन्हें जरूरत होती थी, वे अपना पैसा वापस ले लेती थीं. निशांत पर तमाम लड़कियों ने भरोसा किया था, लेकिन वह उन्हें धोखा दे कर उन का पैसा ले उड़ा था. इन में सायरा भी थी. इस स्थिति में उसे आगे किसी पर विश्वास नहीं करना चाहिए था. लेकिन उसे मनोहरलाल के अलावा राजन और पायल भी भले लोग लगे थे.

एक बार सायरा बीमार हुई तो इन लोगों ने एक प्राइवेट क्लीनिक में उस का इलाज कराया. वहां पता चला कि उसे एड्स है. यह जानते हुए भी कि उस के संपर्क में आने वाले लोगों की जान जोखिम में पड़ सकती है, इन्होंने उस से धंधा करवाना बंद नहीं किया. सायरा ने एक बार इन लोगों को बताया भी था कि उस की मां बीमार रहती है, मां के इलाज के लिए वह पैसा इकट्ठा कर रही है ताकि मुंबई जा कर ठीक से मां का इलाज करा सके. 11 जनवरी, 2016 को सायरा इन लोगों को बिना बताए सीधे एक ग्राहक के पास चली गई. रात में उस ने मनोहरलाल को पंचकूला की एक जगह के बारे में बता कर वहां से पिकअप करने को कहा. मनोहरलाल बताई गई जगह पर पहुंचा तो वह शराब के नशे में धुत्त थी. वह उसे राजन के यहां ले गया.

वहां पहुंच कर सायरा ने झगड़ा करते हुए कहा, ‘‘आप लोगों के पास मेरे जो ढाई लाख रुपए जमा हैं, वे मुझे दे दो. मुझे अपनी मां का इलाज कराने मुंबई जाना है.’’

‘‘देखो,’’ मनोहरलाल ने उसे समझाना चाहा, ‘‘तुम्हारे इलाज पर काफी पैसा खर्च हो रहा है. फिर भी तुम चिंता मत करो, एक हफ्ते के अंदर हम तुम्हें तुम्हारा सारा पैसा लौटा देंगे.’’

‘‘अपना इलाज भी मैं खुद करवाऊंगी. बस तुम लोग अभी के अभी मेरा ढाई लाख रुपया वापस कर दो.’’

इस के बाद वह चिल्लाने लगी. समझाने पर भी वह नहीं मानी तो पायल ने आगे बढ़ कर उसे 5-6 थप्पड़ जड़ दिए. इस पर चुप होने के बजाय वह और जोरों से चिल्लाने लगी. राजन को गुस्सा आया तो उस ने रसोई से बेलन ला कर उस के सिर व कंधे पर कई वार कर दिए.

सायरा को निढाल होते देख मनोहरलाल ने उसे धक्का दे कर बैड पर गिरा दिया. पायल ने तुरंत उस के मुंह में रूमाल ठूंस कर उस के हाथपैर पीछे ले जा कर बांध दिए. मुंह में रूमाल ठूंसते वक्त उस के मुंह से खून निकलने लगा था. इस पर मनोहरलाल ने उस की नाक व मुंह को दबा दिया, जिस से उस की मौत हो गई. तीनों ने मिल कर उस की लाश को मखमल की चादर में लपेट कर एक जगह छिपा कर रख दिया. उस रात और अगले पूरे दिन लाश उसी तरह पड़ी रही. अब तक उस में से हलकी बदबू आने लगी थी. ऐसे में लाश को जल्दी ठिकाने लगाना जरूरी था.

3 जनवरी की सुबह मनोहरलाल अकेला जा कर बड़ी सी बोरी में पालक, धनिया और गोभी वगैरह ले आया. उसी में लाश को रख कर बोरी को सिल दिया और अकेला ही सायरा की लाश को ठिकाने लगाने के लिए घर से निकल पड़ा. संयोग से रास्ते में ही पुलिस द्वारा पकड़ लिया गया. इस बीच राजन व पायल वारदात में इस्तेमाल चादर व तौलिया किसी वीरान जगह पर फेंकने चले गए थे, बाद में उन्हें भी उसी दिन पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था. पूछताछ के बाद उन की निशानदेही पर पुलिस ने चादर, तौलिया और बेलन बरामद कर लिए. कार पहले ही कब्जे में ली जा चुकी थी.

सायरा के फोन में उस की बड़ी बहन शबाना बानो का फोन नंबर था. उस से संपर्क कर के पुलिस ने उन लोगों से पंचकूला आ कर शव की पहचान करने के लिए कहा, ताकि पोस्टमार्टम करवाया जा सके. लेकिन शबाना व उस की मां फातिमा ने कहा कि वह तो उन के लिए 10 साल पहले तब ही मर चुकी थी, जब वह 16 साल की उम्र में घर से भाग गई थी. उन लोगों ने अपनी बदतर माली हालत का हवाला दे कर पंचकूला आने में असमर्थता जाहिर की. उन्होंने पुलिस से अनुरोध किया कि सायरा का अंतिम संस्कार वही करवा दें.

इस के बाद पुलिस के सामने दूसरा कोई चारा नहीं बचा था. 72 घंटों तक शव को मार्च्युरी में रखने के बाद उस का पोस्टमार्टम करवा कर 7 जनवरी, 2016 की शाम पुलिस की देखरेख में मनीमाजरा के कब्रिस्तान में दफना दिया गया. रिमांड अवधि समाप्त होने पर पुलिस ने मनोहरलाल गुप्ता, राजन गुप्ता व पायल गुप्ता को फिर से न्यायालय में पेश कर के न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया. Real Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

और कहानियां पढ़ने के लिए क्लिक करें...