Kidnapping Murder Case. परविंदर को इस बात की ईर्ष्या थी कि उस के चाचा दिन दूनी रात चौगुनी उन्नति क्यों करते जा रहे हैं. अपनी इसी ईर्ष्या की वजह से उस ने अपने चाचा को बरबाद करने के लिए जो योजना बनाई, आखिर उस का अंजाम क्या हुआ…

शाम के ठीक पौने 4 बजे जसकीरत कपड़ा ले कर अपनी स्कूटी को चमकाने लगा था, क्योंकि 4 बजे उसे सुलतानपुर लोधी रोड पर ट्यूशन पढ़ने जाना था. वह अपनी हर चीज को इसी तरह साफसुथरी रखता था. 14 साल का जसकीरत नौवीं में पढ़ता था. वह रोजाना स्कूटी साफ करता, कौपीकिताबें लेता और मां कुलदीप कौर के हाथों जूस पी कर ट्यूशन पढ़ने के लिए निकल जाता.

11 अप्रैल की शाम को भी जसकीरत मां के हाथों जूस पी कर ट्यूशन पढ़ने चला गया था. बेटे के जाने के बाद कुलदीप घर के कामों में व्यस्त हो गई. जसकीरत 4 बजे ट्यूशन पढ़ने जाता था तो साढ़े 6, 7 बजे तक लौटता था. लेकिन उस दिन वह रात 8 बजे तक नहीं लौटा तो मां को चिंता हुई. फिर उन्होंने सोचा कि ट्यूशन पढ़ कर वह अपने किसी दोस्त के साथ उस के घर या बाजार चला गया होगा, इसीलिए उसे देर हो रही है.

वह बेटे के बारे में ही सोच रही थी कि जसकीरत के पिता सरदार नरेंद्र सिंह फैक्ट्री से आ गए. ड्राइंगरूम में अपना ब्रीफकेस रख कर बेसिन में हाथमुंह धोते हुए उन्होंने पूछा, कुलदीप, जसकीरत नहीं दिख रहा, अभी ट्यूशन पढ़ कर नहीं लौटा क्या? जी नहीं, अभी तक तो नहीं लौटा. लगता है, दोस्तों के साथ बाजार चला गया है या फिर किसी के घर चला गया है. आप कपड़े बदलिए, मैं चाय बना कर लाती हूं. कुलदीप कौर ने कहा.

नरेंद्र सिंह कपड़े जरूर बदलने लगे, लेकिन पत्नी की बात उन्हें हजम नहीं हुई. क्योंकि जसकीरत बिना बताए कहीं जाने वालों में नहीं था. चाय पीने में आधा घंटा और गुजर गया. रात के साढ़े 9 बजे तक भी जसकीरत नहीं आया तो नरेंद्र और कुलदीप को चिंता हुई. नरेंद्र सिंह ने ट्यूशन पढ़ाने वाले मास्टर को फोन कर के जसकीरत के बारे में पूछा तो उस ने हैरानी जताते हुए कहा, सरदारजी, आज तो जसकीरत ट्यूशन पढ़ने आया ही नहीं था. क्या कहा…जसकीरत ट्यूशन पढ़ने नहीं गया था? पर घर से तो वह कौपीकिताब ले कर गया था? नरेंद्र सिंह ने हैरानी से कहा. इसी के साथ उन का शरीर कांप उठा. उन के मन में आया, जसकीरत ट्यूशन पढ़ने नहीं गया तो फिर गया कहां?

अब मामला गंभीर और चिंता का विषय बन गया था. जसकीरत बहुत ही सीधासादा और पढ़ने वाला लड़का था. बिना मतलब घूमनाफिरना उसे कतई पसंद नहीं था. इस तरह का लड़का बिना बताए कहां जा सकता था? बहरहाल, नरेंद्र सिंह और कुलदीप कौर खानापीना भूल कर बेटे की तलाश में जुट गए. सब से पहले उन्होंने जसकीरत के दोस्तों और साथ पढ़ने वालों को फोन किए. जिन के नंबर नहीं थे, उन के घर जा कर पता किया. पार्कों, बाजारों और सिनेमाघरों में जा कर देखा, लेकिन जसकीरत का कुछ पता नहीं चला.

थकहार कर पतिपत्नी घर लौट आए कि शायद वह घर आ गया हो, लेकिन तब तक वह नहीं आया था. रात के साढ़े 11 बज चुके थे. नरेंद्र सिंह के कई दोस्त और बिजनैस से जुड़े कुछ परिचित लोग भी जसकीरत के बारे में सुन कर उन की कोठी पर आ गए थे. सभी ने सलाह कर के फैसला लिया कि अब इस बारे में पुलिस को सूचित कर देना चाहिए.

सभी घर से निकल रहे थे कि नरेंद्र सिंह के बड़े भाई का बेटा परविंदर सिंह उर्फ शैली आ गया. उतनी रात को चाचा की कोठी पर उतने लोगों को देख कर उस ने पूछा, क्या हुआ चाचाजी? बेटा, जसकीरत न जाने कहां चला गया है? हम उसी की सूचना देने थाने जा रहे हैं. चाचाजी, मैं भी आप के साथ चलता हूं, लेकिन वह गायब कैसे हो गया? ये बातें बाद में करेंगे. पहले थाने चल कर उस के गायब होने की सूचना देते हैं. नरेंद्र सिंह ने कहा और घर के बाहर आ गए. सभी अपनीअपनी गाडि़यों से चले तो थाने जाने के बजाय वे एसपी (डी) जसबीर सिंह के आवास पर जा पहुंचे. उन्हें सारी बात विस्तार से बताई गई तो उन्हें भी हैरानी हुई.

चूंकि मामला शहर के एक उद्योगपति के बेटे के गायब होने का था, सो उन्होंने नरेंद्र सिंह को सांत्वना देते हुए कहा कि आज रात वे बच्चे को अस्पताल, रेलवे स्टेशन और अपने रिश्तेदारों के यहां खोज लें, मदद के लिए वह कुछ सिपाहियों को उन के साथ भेजे देते हैं. अगर बच्चा नहीं मिलता तो सुबह गुमशुदगी दर्ज करा कर पूरे जिले की पुलिस उस की तलाश में लगा देंगे.

एसपी आवास से निकल कर सभी अस्पताल की ओर जा रहे थे कि तभी नरेंद्र सिंह के मोबाइल फोन की घंटी बजी. फोन नंबर अंजान था, इसलिए नरेंद्र सिंह को थोड़ा हैरानी हुई. फिर भी उन्होंने फोन रिसीव किया कि कहीं से किसी ने जसकीरत के बारे में तो फोन नहीं किया.

जैसे ही उन्होंने ‘हैलो’ कहा, दूसरी ओर से थोड़ी कड़क आवाज में कहा गया, नरेंद्र सिंह, ध्यान से मेरी बात सुनो, तुम्हारा बेटा हमारे कब्जे में है. मंत्रीजी ने कहा है कि इलैक्शन नजदीक है, इसलिए खर्च की जरूरत है. अगर बेटा सहीसलामत चाहिए तो 30 लाख रुपए की व्यवस्था कर लो, वरना बेटा जिंदा नहीं मिलेगा. हैलो, कौन बोल रहे हैं? किस मंत्री ने कहा है? मैं 30 लाख रुपए दे दूंगा. 30 क्या, 50 लाख दे दूंगा, लेकिन मेरे बेटे को कुछ नहीं होना चाहिए.

नरेंद्र सिंह अपनी रौ में अपनी बात कहते रहे, जबकि दूसरी ओर से फिरौती की रकम मांग कर फोन काट दिया गया था. नरेंद्र सिंह अपना सिर पीट कर रह गए. सब की सलाह पर उन्होंने वापस जा कर यह बात एसपी साहब को बताई तो उन्होंने तुरंत थाना सिटी के थानाप्रभारी इंसपेक्टर सुक्खा सिंह को फोन कर के जसकीरत सिंह के अपहरण का मुकदमा दर्ज कर काररवाई करने का आदेश दे दिया.

इस के अलावा घटना की जानकारी एसएसपी को दे कर तुरंत पुलिस अधिकारियों की एक आपात मीटिंग बुलाई. जसकीरत के अपहरण का मुकदमा अज्ञात लोगों के खिलाफ दर्ज कर पुलिस ने काररवाई शुरू कर दी. सुक्खा सिंह ने रात में ही वायरलैस द्वारा सूचना दे कर कपूरथला शहर की नाकेबंदी करा दी. अगले दिन जसकीरत के फोटो वाले पैंफ्लेट छपवा कर शहर भर में चस्पा करवा दिए गए.

इस घटना की जानकारी आईजी को हुई तो हालात का जायजा लेने वह भी कपूरथला आ गए. उन्होंने जिले के सभी पुलिस अधिकारियों की मीटिंग कर अपहृत जसकीरत को अपहर्त्ताओं के चंगुल से सहीसलामत छुड़ाने के लिए एसपी जसबीर सिंह के नेतृत्व में एक टीम गठित की, जिस में डीएसपी दलजीत सिंह ढिल्लो, थानाप्रभारी इंसपेक्टर सुक्खा सिंह और सीआईए के प्रभारी इंसपेक्टर रविंदर सिंह को विशेष रूप से शामिल किया.

सीआईए प्रमुख होने की वजह से रविंदर सिंह के मुखबिरों का नेटवर्क बहुत अच्छा था. इन 5 पुलिस अधिकारियों की मदद के लिए लगभग 100 पुलिसकर्मियों को लगाया गया था, जिन में कई एएसआई और हैडकांस्टेबल भी थे.

इंसपेक्टर रविंदर सिंह ने अपने मुखबिरों को सतर्क कर दिया था. युद्धस्तर पर जसकीरत और अपहर्त्ताओं की तलाश जारी थी. पुलिस टीम को अपहर्त्ताओं के फोन का इंतजार था. क्योंकि उन्होंने फोन कर के केलव फिरौती की रकम बता कर धमकी दी थी. रकम कब और कहां पहुंचानी है, यह उन्होंने नहीं बताया था. इसीलिए इंसपेक्टर रविंदर सिंह ने नरेंद्र सिंह के घर के सभी फोन सर्विलांस पर लगवा दिए थे.

सुबह से शाम हो गई, पर कोई फोन नहीं आया. शाम को रविंदर सिंह के एक मुखबिर ने फोन द्वारा सूचना दी कि तरनतारन रोड पर वैरोवाल इलाके में फतेहाबाद के पास सुनसान में एक बच्चे की खुर्दबुर्द की गई लाश पड़ी है. सूचना मिलते ही एसपी जसबीर सिंह, डीएसपी दलजीत सिंह ढिल्लो, रविंदर सिंह जसकीरत के मातापिता और कुछ रिश्तेदारों के साथ वहां पहुंच गए. लाश बोरी में भरी थी.

तेजाब की वजह से बोरी का ऊपरी हिस्सा और लाश की पीठ बुरी तरह से जली हुई थी. ऊपर से पता चल गया था कि लाश बच्चे की है. बोरी से लाश निकाली गई तो पता चला कि लाश जसकीरत की थी. बेटे की लाश देख कर नरेंद्र सिंह और कुलदीप कौर बेहोश हो कर गिर पड़े. उन के साथ आए रिश्तेदारों ने उन्हें संभाला और उन्हें घर पहुंचा दिया.

इस के बाद पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया कि अपराधियों तक पहुंचने का कोई सुराग मिल जाए, पर वहां ऐसा कुछ नहीं मिला, जिस से अपराधियों तक पहुंचा जाता या जांच में मदद मिलती. ऐसा लगता था, जैसे हत्या कहीं और कर के लाश यहां ला कर फेंकी गई थी. शिनाख्त मिटाने के लिए उस पर तेजाब डाल दिया गया था.

दलजीत सिंह ढिल्लो और रविंदर सिंह की समझ में नहीं आ रहा था कि अपहर्त्ताओं ने बिना फिरौती वसूले ही बच्चे की हत्या क्यों कर दी? इस का मतलब या तो जसकीरत अपहर्त्ताओं को पहचानता था या फिर यह अपहरण फिरौती के लिए नहीं, बल्कि दुश्मनी की वजह से किया गया था.

जांच को भटकाने के लिए फिरौती के लिए फोन किया गया था. क्योंकि अपहरण के मामले में ऐसा कम ही होता है कि अपहर्त्ता बिना रकम वसूले पकड़ को मार दें. जब तक रकम नहीं मिल जाती, अपहर्त्ता पकड़ को संभाल कर रखते हैं. पकड़ को तभी मारते हैं, जब अपहर्त्ताओं को लगता है कि रकम नहीं मिलने वाली और वे पुलिस के शिकंजे में फंसने वाले हैं.

बहरहाल, लाश को पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दिया गया. इस के बाद थाने आ कर सुक्खा सिंह ने इस मामले में हत्या और लाश खुर्दबुर्द करने की धाराएं जोड़ दीं. पुलिस ने नरेंद्र सिंह से पूछताछ की. इस पूछताछ में रविंदर सिंह भी शामिल थे. उन्होंने पहला सवाल यही किया, गंभीरता से सोच कर बताइए कि आप का कोई ऐसा दुश्मन तो नहीं है, जिस ने कभी देख लेने की धमकी दी हो? नहीं, हम सीधेसादे व्यापारी हैं. दुश्मनी या लड़ाईझगड़े से हम दूर ही रहते हैं.

नरेंद्र सिंह ने सच कहा था. उन के पिता स्व. बलदेव सिंह सीधेसादे किसान थे. बाद में उन्होंने व्यवसाय कर लिया था. उन के 2 बेटे और 2 बेटियां थीं. उन्होंने सब की शादियां कर दी थीं. बेटों में बड़ा बेटा जगपाल सिंह था, तो छोटा नरेंद्र सिंह.

जगपाल मस्त और लापरवाह किस्म का आदमी था, इसलिए वह कोई कारोबार नहीं जमा पाया. उस के 2 बेटे थे, परविंदर और दविंदर. परविंदर 12वीं पास कर के डाक्टरी की पढ़ाई कर रहा था. वह अपने चाचा नरेंद्र के काफी करीब था, इसलिए ज्यादातर वह उन्हीं के यहां रहता था. उस का घर नजदीक ही सैंट्रल टाउन में था. दूसरी ओर नरेंद्र सिंह कारोबार में सफल रहे, क्योंकि वह बचपन से ही होशियार थे. आज वह फैक्ट्री के मालिक थे. उन के पास सब कुछ था.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने पर पता चला कि जसकीरत की हत्या गला दबा कर की गई थी. पोस्टमार्टम के बाद लाश घर वालों को मिली तो उस के अंतिम संस्कार में कारोबारी और रिश्तेदार ही नहीं, पूरा शहर उमड़ पड़ा. लोगों में पुलिस प्रशासन के प्रति इतना आक्रोश था कि उस के विरोध में जम कर नारेबाजी की गई. नाराज लोगों ने आईजी और एसएसपी के बंगले का घेराव भी किया.

पुलिस बड़ी तत्परता से कातिलों को पकड़ने में जुटी थी. इस घटना को घटे 17 दिन बीत चुके थे. 28 अप्रैल को शहर भर के लोगों ने शहीद भगत सिंह चौक पर धरना दे कर अमृतसरदिल्ली मार्ग जाम कर दिया. उस दिन और अगले दिन यानी 29 अप्रैल को पूरा कपूरथला शहर बंद रहा. काफी मेहनत के बाद पुलिस के हाथ सिर्फ यह सुराग लगा कि जिस फोन नंबर से अपहर्त्ताओं ने फिरौती के लिए फोन किया था, वह सीडीएमए नंबर था.

पुलिस पता करने लगी कि यह फोन कहां से किया गया था? दूसरी ओर नरेंद्र की कोठी से ले कर गली में जहांजहां सीसीटीवी कैमरे लगे थे, सभी की फुटेज खंगाली गई. लेकिन इस से भी कहीं कुछ हाथ नहीं लगा. डीएसपी दलजीत सिंह ढिल्लो के आदेश पर एक बार फिर नरेंद्र सिंह की कोठी से ले कर ट्यूशन पढ़ने की जगह तक की क्राइम सीन पर गौर किया गया. इस में पुलिस के हाथ कुछ सुराग लगा.

नरेंद्र सिंह की रोज एवेन्यू स्थित कोठी से कुछ दूरी पर गली के बाहर एक दुकान के छज्जे के नीचे लगे सीसीटीवी कैमरे की फुटेज से कुछ अहम सुराग हाथ लगा था. यह कैमरा अब तक इसलिए नजरों से बचा था, क्योंकि यह ओट में था. फुटेज के अनुसार, जसकीरत स्कूटी से गली से निकल रहा था, तभी परमिंदर ने उसे रोक लिया था. इस के बाद जसकीरत स्कूटी की पिछली सीट पर बैठ गया था तो परविंदर स्कूटी चला कर ले गया था.

इस फुटेज से स्पष्ट हो गया कि उस दिन परविंदर ही जसकीरत को कहीं ले गया था. इस के बाद समय गंवाए बगैर रविंदर सिंह और सुक्खा सिंह ने परविंदर को धर दबोचा.  फिर तो थोड़ी देर बाद उस की निशानदेही पर हरनामनगर निवासी 19 वर्षीय मैडिकल के छात्र राजविंदर सिंह उर्फ राजा और शालीमार एवेन्यू निवासी 19 वर्षीय कौमर्स के छात्र अर्शदीप सिंह उर्फ अर्श को गिरफ्तार कर लिया गया.

तीनों को सीआईए स्पैशल स्टाफ के औफिस ला कर अधिकारियों के सामने जब पूछताछ की गई तो उन्होंने अपना अपराध स्वीकार करते हुए जसकीरत के अपहरण और हत्या की जो कहानी सुनाई, वह कुछ और नहीं, ईर्ष्या की उपज थी.

परविंदर सिंह उर्फ शैली को हर समय एक ही बात का दुख सालता रहता था कि उस के चाचा नरेंद्र सिंह दिन दूनी रात चौगुनी उन्नति क्यों करते जा रहे हैं? वह एक सफल कारोबारी हैं, जबकि उस के पिता का कारोबार बैठता जा रहा है. चाचा के पास शानदार कोठी है, फैक्ट्री है, कारें हैं, उन का बेटा जसकीरत महंगे स्कूल में पढ़ता है. उन के पास जो शानोशौकत, इज्जत, रुतबा, धनदौलत और जो भौतिक सुखसुविधाएं हैं, वे सब उस के पास क्यों नहीं हैं?

परविंदर दिनरात इसी सोच और ईर्ष्या में डूबा रहता था. रातदिन एक ही बात सोचतेसोचते वह मानसिक रोगी बन गया.  कभी गुस्से में वह अपने स्व. दादा को गालियां देने लगता कि उस बूढ़े ने उस के लिए कुछ नहीं किया तो कभी अपने मांबाप को कोसता कि उन लोगों ने भी कुछ नहीं किया.

दिनरात सोचसोच कर उस की जलन बढ़ती जा रही थी. ईर्ष्या की ही वजह से वह चाचा नरेंद्र सिंह को अपना सब से बड़ा दुश्मन समझने लगा. पर दिखावे के लिए इतना प्यार दर्शाता था, जैसे वह उन का ही बेटा है. जबकि हर समय वह चाचा को लूटने और उन्हें कंगाल बनाने की योजनाएं बनाता रहता था, लेकिन उस की समझ में यह नहीं आता था कि वह यह सब कैसे करे?

बारहवीं करने के बाद वह डाक्टरी की पढ़ाई करने लगा. इस में नरेंद्र सिंह ने काफी मदद की थी. एक दिन वह टीवी पर अपराध और सच्ची घटना पर आधारित एक सीरियल देख रहा था.

सीरियल के उस दिन के एपीसोड की कहानी उसी जैसे भटके एक नवयुवक की थी. परविंदर बड़े ध्यान से सीरियल के एकएक पौइंट को देख रहा था. उस ने देखा कि किस तरह एक लड़के ने अपने सगे मामा को कंगाल बना दिया था, वह इस बात पर भी गौर कर रहा था कि वारदात होने के बाद पुलिस अपराध के किनकिन पहलुओं पर गौर करती है और चालाक अपराधी कैसे खुद को बचाते हुए पुलिस की पकड़ से दूर रहता है.

सीरियल देख कर परविंदर ने भी योजना बना डाली कि चाचा को कैसे बरबाद किया जाए. पर यह काम वह अकेला नहीं कर सकता था, इसलिए उस ने अपने 2 जिगरी दोस्तों राजविंदर और अर्शदीप को साथ मिला लिया.

परविंदर की योजना थी कि अपने चाचा के बेटे जसकीरत का अपहरण कर के 30-40 लाख रुपए फिरौती वसूल कर विदेश चला जाएगा. वहां उस की किस्मत खुद ही चमक जाएगी. एक ट्रैवल एजेंट से तीनों ने बात भी कर ली थी कि उन तीनों को विदेश भेजने में कितना खर्च आएगा. इस के बाद जसकीरत के अपहरण की योजना बन गई.

जसकीरत का अपहरण परविंदर के लिए कोई मुश्किल काम नहीं था. योजना को अच्छी तरह ठोकबजा कर टीवी के सीरियल की तर्ज पर उन्होंने सब से पहले सीसीटीवी कैमरों के बारे में पता किया कि वे उन्हें कहांकहां अड़चन पैदा कर सकते हैं. यह जान लेने के बाद योजना के अगले चरण में उन्होंने फरजी आईडी पर 25 मार्च, 2016 को 2 सिम लिए और अपने फोन घर पर छोड़ दिए, क्योंकि सीरियल में दिखाया गया था कि मोबाइल फोन के जरिए पुलिस अपराधी तक कैसे पहुंच जाती है.

यह सब कर के मास्टरमाइंड परविंदर 27 मार्च, 2016 को एक सुनसान सड़क पर एक मजदूर से तीनों ने उस का मोबाइल फोन छीन लिया. फोन की समस्या दूर होने के बाद तीनों 10 अप्रैल तक जसकीरत के ट्यूशन पढ़ने जाने की रेकी करते रहे कि वह किनकिन रास्तों से हो कर जाता है और कैमरे कहांकहां लगे हैं?

घटना वाले दिन 11 अप्रैल की शाम 4 बजे जसकीरत जैसे ही घर से ट्यूशन के लिए निकला, परविंदर ने उसे रास्ते में रोक लिया और स्कूटी खुद चलाते हुए फत्तूढींगा की ओर ले गया. जसकीरत ने पूछा कि वह उसे इधर कहां ले जा रहा है तो उस ने कहा, ‘‘आज मैं तुझे तेरी होने वाली भाभी से मिलवाने चल रहा हूं.’’

फत्तूढींगा के पास परविंदर के दोनों साथी राजा और अर्श आई-20 कार लिए खड़े थे. परविंदर ने जसकीरत को अपने दोस्तों से मिलवा कर कार में बैठा लिया और फिर रूमाल सुंघा कर उसे बेहोश कर दिया. रूमाल में उन्होंने क्लोरोफार्म डाल रखा था.

परविंदर उस की स्कूटी को हमीरा छोड़ आया. उस के वापस आते ही तीनों ने बेहोश पड़े जसकीरत का गला रस्सी से कस कर उसे मार दिया और पहले से ही अमृतसर रोड पर लिए किराए के एक कमरे में उस की लाश को बोरे में भर कर रख दिया.

इतना करने के बाद मजदूर से छीने मोबाइल से नरेंद्र सिंह को फोन कर के फिरौती मांगी. उस के बाद सभी पास के गुरुद्वारे में जा कर सेवा करने लगे. परविंदर अपने चाचा की छटपटाहट देखने देर रात घर पहुंचा और फिर पकड़े जाने तक वह चाचा के साथ ही रहा, ताकि किसी को उस पर शक न हो और पुलिस काररवाई का भी पता चलता रहे.

अगले दिन 12 अप्रैल, 2016 को तीनों लाश वाला बोरा फतेहाबाद के पास वीराने में फेंक कर उस पर तेजाब डाल दिया. इस तरह अपनी मानसिक कुंठा शांत करने के लिए एक नासमझ सनकी ने अपने चाचा का हंसताखेलता घर बरबाद कर दिया. तीनों अभियुक्तों को दिनांक 8 मई, 2016 को अदालत में पेश कर 3 दिनों के पुलिस रिमांड पर लिया गया. इस के बाद 2 दिनों के लिए और रिमांड पर लिया गया.

रिमांड अवधि के दौरान तीनों अभियुक्तों की निशानदेही पर जसकीरत की स्कूटी, आई-20 कार बरामद करने के साथ उन जगहों की शिनाख्त कराई गई, जहांजहां वे जसकीरत को ले गए थे. रिमांड अवधि समाप्त होने के बाद एक एक बार फिर परविंदर उर्फ शैली, राजविंदर उर्फ राजा तथा अर्शदीप उर्फ अर्श को अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

और कहानियां पढ़ने के लिए क्लिक करें...