Expressway Scams . विकास के नाम पर बिछाए जा रहे चमचमाते हाईवे और एक्सप्रैसवे आज महज भ्रष्टाचार का स्मारक बन कर रह गए हैं. विश्वस्तरीय इंफ्रास्ट्रक्चर का दंभ भरने वाली ये सड़कें जब पहली ही बारिश में धंसने और दरकने लगती हैं तो सिस्टम की खोखली नींव बेनकाब हो जाती है. कमीशनखोरी और घटिया निर्माण सामग्री के इस नापाक गठजोड़ ने जनता के टैक्स की गाड़ी कमाई को सीधे गड्ढों में झोंक दिया है. सवाल यह है कि आखिर कब तक 'कमीशन का घुन’ विकास को खोखला कर जनता की जान से यूं ही खेलता रहेगा?
भारत में विकास को रफ्तार देने वाली नई हाईवे और एक्सप्रैसवे की हालत बनने के कुछ दिनों बाद ही जगहजगह खस्ता हो गई. कुछ सड़कें तो एक भी बारिश को नहीं झेल पाईं और धंस गईं या गड्ढों से भर गईं. आखिर क्यों टूट रहै हैं हाईवे? इन के निर्माण, सरकार की नीतियां और विभागीय अनियमितताओं से जुड़े कई सवाल हैं. इन घोटालों का दोषी कौन है? जबकि देश के 1.39 लाख किलोमीटर लंबे हाईवे एक्सप्रैसवे से सरकार को रोजाना 192 करोड़ यानी सालाना 70 हजार करोड़ रुपए की कमाई हो रही है.
उत्तर प्रदेश (यूपी) के 2 बड़े शहरों लखनऊ और कानपुर को जोडऩे वाली करीब 63 किलोमीटर की हाईवे बनाई गई, जबकि करीब 93 किलोमीटर की दूरी वाली दोनों बड़े शहरों के बीच पहले से ही बेहतर सड़कें थीं. नई हाईवे का निर्माण भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण यानी एनएचएआई द्वारा किया गया. इस पर करीब 4,200 करोड़ रुपए की लागत आई. एक्सप्रैसवे नाम के साथ तर्क दिया गया कि यह दोनों शहरों के बीच का सफर आसान और समय बचाने वाला होगा.






