Family Conspiracy Case. अशोक कुमार जैन ने खुद की मेहनत से करोड़ों का फाइनैंस का बिजनैस तो खड़ा किया और तमाम चलअचल संपत्ति जुटाई. इस के बावजूद ऐसा क्या हुआ कि उन की पत्नी और एकलौते बेटे ने रिश्तेदारों के साथ साजिश रच कर उन्हें पागलखाने भिजवा दिया. 

6 दिसंबर, 2016 को राधारमण बंसल दिल्ली के शाहदरा की अनाजमंडी स्थित अपनी दुकान पर दोपहर का खाना खा कर आराम कर रहे थे, तभी 3 बजे के करीब जगाने पर उन की आंखें खुलीं तो उन्होंने अशोक कुमार जैन को सामने खड़े पाया. वह उन के घनिष्ठ मित्र थे. वह पूर्वी दिल्ली के कड़कड़डूमा के ऋषभ विहार स्थित अपनी कई करोड़ की कोठी में एकलौते बेटे सिद्धार्थ जैन और पत्नी सुमन जैन के साथ रहते थे.

अशोक कुमार जैन का फाइनैंस का कारोबार था. उन की कई फाइनैंस कंपनियां थीं, जिन के उन्होंने कनाट प्लेस में 3 औफिस बना रखे थे. इस तरह अशोक कुमार जैन एक बड़े बिजनैसमैन थे. वह करोड़ों रुपए की चलअचल संपत्ति के मालिक थे. राधारमण बंसल से उन की 38 साल पुरानी गहरी दोस्ती थी.

अशोक कुमार जैन को देख कर राधारमण उठ बैठे. लेकिन अशोक कुमार जैन की हालत देख कर वह हैरान रह गए, क्योंकि हमेशा मुसकराते रहने वाले अशोक कुमार जैन के चेहरे पर घबराहट साफ दिख रही थी. वह जो कुर्ता पहने थे, वह गंदा और फटा हुआ था, पैरों में भी वह कुछ नहीं पहने थे. उन की दाढ़ी भी बढ़ी हुई थी. इस से पहले कि राधारमण कुछ पूछते, उन्होंने कहा, ‘‘जरा 60 रुपए दो, रिक्शे वाले को देने हैं.’’

राधारमण को मामला गड़बड़ लगा. वह सोचने लगे कि ऐसी क्या बात हो गई कि यह इस हालत में उन के पास आए हैं और इन के पास रिक्शे वाले को देने तक के पैसे नहीं हैं, वह कुछ कहते, अशोक कुमार ने कहा, ‘‘देख क्या रहे हो, मैं पागलखाने से भाग कर आ रहा हूं. घर वालों ने मुझे पागलखाने पहुंचा दिया था.’’

राधारमण ने उस समय कुछ पूछना उचित नहीं समझा और अशोक कुमार जैन को बैठा कर रिक्शे वाले को पैसे दे कर विदा कर दिया. इस के बाद उन्होंने उन्हें चाय वगैरह पिला कर बात की तो अशोक कुमार जैन ने उन्हें जो बताया, वह इस तरह था.

अशोक कुमार जैन के बताए अनुसार, उन की पत्नी और कुछ रिश्तेदार उन पर सारी प्रौपर्टी 32 साल के बेटे सिद्धार्थ जैन के नाम करने का दबाव बना रहे थे. उन्होंने ऐसा करने से मना किया तो उन लोगों ने उन्हें तरहतरह से प्रताडि़त कर के दिसंबर के पहले सप्ताह में एक कमरे में 3-4 दिनों के लिए बंद कर दिया.

शोरशराबा करने और दरवाजा पीटने के बाद भी जब उन लोगों ने दरवाजा नहीं खोला तो उन्होंने कमरे का सामान तोड़ना शुरू कर दिया. उस के बाद उन लोगों ने दरवाजा खोला.

5 दिसंबर को वे उन्हें जबरदस्ती कार में डाल कर शाहदरा स्थित मानव व्यवहार एवं संबद्ध विज्ञान संस्थान (इहबास), जिसे लोग मेंटल हौस्पिटल कहते हैं, ले गए और उन्हें पागल बता कर वहां भरती करा दिया.

पत्नी सुमन जैन, जिसे उन्होंने जीवन की सारी सुखसुविधाएं मुहैया कराई थीं, भरपूर प्यार दिया था, उसे भी उन पर तरस नहीं आया और एकलौता बेटा जिसे उन्होंने महंगे स्कूल में पढ़ाया था, उस की हर चाहत पूरी की थी, जिस के उज्ज्वल भविष्य के लिए उन्होंने इतना बड़ा बिजनैस खड़ा किया था, वह न जाने कैसे इतना कठोर हो गया था.

इहबास के डाक्टरों से वह बारबार खुद के ठीकठाक होने की बात करते रहे, लेकिन उन्होंने उन की एक न सुनी. उन्हें शायद इस काम के पैसा दिया गया था, जिस से उन्होंने उन्हें आननफानन में भरती कर लिया था.

अशोक कुमार जैन का कहना था कि वह बिलकुल ठीक थे, इस के बावजूद डाक्टरों ने उन्हें न जाने कौनकौन सी दवाएं दीं कि थोड़ी ही देर में उन्हें नींद आ गई. 68 साल के अशोक कुमार जैन उस पागलखाने में कैद हो कर रह गए. वह किसी भी तरह वहां से निकलना चाहते थे, लेकिन गेट पर तैनात सुरक्षाकर्मियों की वजह से वहां से निकलना आसान नहीं था. आखिर अगले दिन यानी 6 दिसंबर, 2016 को दोपहर बाद उन्हें मौका मिल ही गया.

जैसे ही सुरक्षागार्ड लंच करने के लिए इधरउधर हुए, इस का फायदा उठा कर वह पागलखाने से निकल भागे. पागलखाने से निकल कर वह सोचने लगे कि कहां जाएं? घर वह जा नहीं सकते थे, 2 शादीशुदा बेटियां थीं, उन के यहां भी जाना उन्होंने उचित नहीं समझा. ऐसे में उन्हें सब से ज्यादा भरोसेमंद दोस्त राधारमण बंसल की याद आई, जिन की शाहदरा की अनाजमंडी में दुकान थी. वह एक रिक्शे में बैठ कर उन की दुकान पर पहुंच गए.

दोस्त की व्यथा सुन कर राधारमण को बहुत दुख हुआ. अशोक कुमार जैन ने उन से साफ कह दिया कि अब वह वहीं रहेंगे. अपने घर बिलकुल नहीं जाएंगे. उन की हालत देख कर लग रहा था कि उन्हें आराम की सख्त जरूरत है. इसलिए दुकान पर नौकर को बिठा कर वह अशोक कुमार जैन को शाहदरा की बिहारी कालोनी स्थित अपने घर ले गए.

नहाधुला कर उन्होंने अशोक कुमार जैन को अपने कपड़े पहनाए और खाना खिला कर उन्हें लिटा दिया. राधारमण ने तय कर लिया था कि दुख इस घड़ी में वह दोस्त की हर तरह से मदद करेंगे और जब तक उन का मन करेगा, वह दोस्त को अपने यहां भाई की तरह रखेंगे.

अशोक कुमार जैन का उन के घर पहले से ही आनाजाना था, इसलिए वह उन के परिवार के हर सदस्य से घुलेमिले थे. शाम सवा 6 बजे के करीब अशोक कुमार जैन राधारमण के घर में बैठे घर वालों से बातें कर रहे थे, तभी उन के मोबाइल पर थाना जीटीबी नगर के एसआई वीरपाल का फोन आया. उन्होंने राधारमण से पूछा, ‘‘क्या अशोक कुमार जैन आप के यहां हैं?’’

‘‘जी, वह मेरे पास ही बैठे हैं.’’ राधारमण ने कहा और फोन अशोक कुमार जैन को दे दिया.

एसआई ने कहा, ‘‘अशोकजी, आप अस्पताल से बिना डिस्चार्ज हुए, बिना बताए भाग आए. आप को ऐसा नहीं करना चाहिए था.’’

‘‘मैं पागल थोड़े ही हूं, जो वहां रहूं. मुझे तो जबरदस्ती भरती कराया गया था.’’ अशोक कुमार जैन ने कहा.

‘‘मैं आप की बात मानता हूं, लेकिन आप को अस्पताल से आना ही था तो आप प्रौपर तरीके से डिस्चार्ज हो कर आते. इस तरह आना गैरकानूनी है. थाने में आप का बेटा सिद्धार्थ और अन्य लोग आए हुए हैं. ये आप की गुमशुदगी दर्ज कराना चाहते हैं.’’ एसआई वीरपाल ने कहा.

‘‘मैं लापता थोड़े ही हूं. अपनी मरजी से अपने दोस्त के घर आया हूं. यहां से मैं कहीं नहीं जाऊंगा.’’

‘‘आप का अपना घर है, परिवार है, आप वहां क्यों रुके हैं. आप अपने घर जा सकते हैं. आप का बेटा लेने आया है.’’

‘‘जो लोग मुझे जबरदस्ती पागलखाने में डाल आए, उन्हें आप मेरे घर वाले कह रहे हैं. इन के साथ मैं हरगिज नहीं जाऊंगा.’’ अशोक कुमार जैन ने जाने से साफ मना कर दिया.

दोस्त के घर रहने से उन के मन का डर निकल चुका था. रात करीब साढ़े 8 बजे राधारमण के घर खाने की तैयारी चल रही थी, तभी उन के मोबाइल पर अशोक कुमार जैन के बेटे सिद्धार्थ का फोन आया. उस ने कहा, ‘‘अंकल, मैं आप की कोठी के बाहर खड़ा हूं. डैडी को बाहर भेज दीजिए.’’

‘‘सिद्धार्थ बेटा, यह नहीं जा रहे तो मैं इन्हें जबरदस्ती कैसे भेज सकता हूं.’’ राधारमण ने कहा.

इस बातचीत के कुछ देर बाद सिद्धार्थ अपनी मौसी के बेटे सतेंद्र जैन और मामा अशोक के साथ राधारमण के यहां आ पहुंचा. उस समय सभी लोग चौथी मंजिल पर थे. अशोक जैन कुरसी पर बैठे टीवी देख रहे थे. रिमोट उन के हाथ में था. सिद्धार्थ ने वहीं से पुलिस कंट्रोलरूम के 100 नंबर पर फोन किया तो थोड़ी देर में एक पुलिस वाला आ पहुंचा. सिद्धार्थ ने राधारमण से कहा, ‘‘अंकल इन्हें भेज दो.’’

‘‘बेटा, तुम्हारे डैडी सामने बैठे हैं, मैं ने इन्हें बांध तो रखा नहीं है और न ही मुझे इन से कोई लालच है. तुम इन्हें ले जाओ.’’

सामने बैठे पिता से 32 वर्षीय सिद्धार्थ ने अपने किए की माफी मांगने के बजाय उन से सीधे घर चलने को न कह कर उन से अमर्यादित भाषा में कहने लगा. उन्हें 3-4 थप्पड़ भी मारे. यह देख कर राधारमण को गुस्सा तो बहुत आया, पर उन्होंने दखलंदाजी करना उचित नहीं समझा.

सिद्धार्थ के मामा अशोक ने अचानक अशोक कुमार जैन की टांग पकड़ कर खींच ली, जिस से वह कुरसी से गिर गए. उन के गिरते ही सतेंद्र ने उन के पेट पर लात मारी. यह सब वहां मौजूद दिल्ली पुलिस के कांस्टेबल के सामने हो रहा था. उस ने उन लोगों को ऐसा करने से नहीं रोका. तीनों अशोक कुमार जैन को लौबी में घसीटते हुए ले गए. राधारमण से रहा नहीं गया तो उन्होंने कहा कि यह 68 साल के बुजुर्ग हैं, बीमार हैं और इन्होंने खाना भी नहीं खाया है. इन्हें सीढि़यों के बजाए लिफ्ट से ले जाओ. इस पर सिद्धार्थ ने कहा, ‘‘नहीं, यह इसी लायक है. हम इसे सीढि़यों से ही ले जाएंगे.’’

यह सब कहनेकरने वाला सिद्धार्थ उन का वही एकलौता बेटा था, जिस के लिए वह न जाने कितने मंदिर गए थे, न जाने कितने पीरफकीरों से दुआएं मांगी थीं. उस के बाद 2 बेटियों के बाद वह पैदा हुआ था. जो दौलत और प्रौपर्टी उन्होंने अपनी अथक मेहनत से हासिल की थी, उसी को पाने के लिए उन के साथ यह सब हो रहा था. यहां हम एक बात यह भी बता देना चाहते हैं कि अशोक कुमार जैन को पिता से फूटी कौड़ी नहीं मिली थी.

अशोक कुमार जैन के पिता महेंद्र कुमार जैन सैंट्रल बैंक की चांदनी चौक शाखा में कैशियर थे. उन के 2 बेटे और 3 बेटियां थीं. वह बारहटूटी चौक पर छोटे से कमरे में किराए पर रहते थे. किराए का कमरा भी ऐसा था, जो जरा सी बारिश होने पर टपकने लगता था. पूरी उम्र उन्होंने किराए के कमरे में ही काटी. लेकिन उन्होंने अपने सभी बच्चों को उच्चशिक्षा दिलाई थी.

अशोक कुमार जैन ने दिल्ली के जानेमाने श्रीराम कालेज औफ कौमर्स से बीकौम किया था. उस के बाद उन्होंने दिल्ली ला कालेज से वकालत की पढ़ाई पूरी की. पढ़ाई के बाद वह तीसहजारी न्यायालय में प्रैक्टिस करने लगे, जहां उन की दोस्ती सीनियर एडवोकेट सुरेश गुप्ता से हुई.

एडवोकेट सुरेश गुप्ता राधारमण के बहनोई थे, जो सदरबाजार के डिप्टीगंज मोहल्ले में रहते थे. राधारमण बहन के यहां आतेजाते  रहते थे. वह अशोक कुमार जैन के हमउम्र थे, इसलिए बहनोई के मार्फत उन की दोस्ती अशोक कुमार जैन से हो गई. धीरेधीरे उन की दोस्ती गहरी होती गई. उसी बीच सुमन जैन से उन की शादी हो गई.

अशोक कुमार जैन अपना कोई बिजनैस करना चाहते थे, लेकिन उन के पास पैसे नहीं थे. चूंकि उन्हें एकाउंट के क्षेत्र का अच्छा अनुभव था, इसलिए उसी से संबंधित बिजनैस के बारे में वह सोचते रहते थे. ऐसे में ही उन के दिमाग में फाइनैंस कंपनी खोलने का विचार आया. लेकिन इस के लिए भी पैसों की जरूरत थी.

पैसे न होने की वजह से वकालत छोड़ कर वह एक फाइनैंस कंपनी में नौकरी करने लगे. नौकरी के दौरान उन्होंने फाइनैंस से संबंधित सारी बारीकियों को समझा. इस बीच वह 2 बेटियों शिवानी, हिमानी के अलावा बेटे सिद्धार्थ के पिता बन गए थे.

परिवार बढ़ने पर घर का खर्च भी बढ़ गया था. इस से उन की चिंता बढ़ गई. इन्होंने मेहनत करनी शुरू कर दी. छोटीछोटी बचत से उन्होंने कुछ पैसा जमा कर रखा था. इधरउधर से कुछ पैसों का जुगाड़ कर के उन्होंने बड़ी बेटी शिवानी के नाम से एक फाइनैंस कंपनी खोल दी. शुरुआत में तो इस कंपनी से कोई खास फायदा नहीं हुआ, लेकिन कुछ सालों बाद कंपनी से अच्छी आमदनी होने लगी. इस के बाद उन्होंने छोटी बेटी हिमानी के नाम से एक और फाइनैंस कंपनी शुरू कर दी.

बिजनैस बढ़ा तो अशोक कुमार जैन ने दिल्ली के कनाट प्लेस में 3 औफिस खोल लिए. कुछ सालों में उन्होंने मेहनत और लगन से इसी बिजनैस से करोड़ों रुपए की संपत्ति अर्जित कर ली. उन्होंने दिल्ली के कड़कड़डूमा कोर्ट के सामने स्थित पौश कालोनी ऋषभ विहार में एक आलीशान कोठी बनवाई. अब तक उन का सामाजिक स्तर काफी ऊंचा हो चुका था. उन्होंने तीनों बच्चों को अच्छे स्कूलों में शिक्षा दिलवाई.

बेटियां जवान हुईं तो उन की शादियां कर दीं. बड़ी बेटी शिवानी की शादी दिल्ली के भोलानाथ नगर के रहने वाले अंकित जैन से और हिमानी की अशोक विहार के रजत जैन से कर दी. वह चाहते थे कि बेटा सिद्धार्थ उन के बिजनैस को संभाले, पर उसे तो इंटरनेट का शौक लगा था.

रातरात भर जग कर वह इंटरनेट पर न जाने क्याक्या करता रहता था और दिन में सोता था. अशोक कुमार जैन उस से देर रात जागने की वजह पूछते तो वह उन्हें कुछ बताता नहीं था. लाख समझाने के बाद भी वह बिजनैस की तरफ ध्यान नहीं दे रहा था.

अशोक कुमार जैन को बेटे के लक्षण ठीक नहीं लग रहे थे, इसलिए वह जब भी उसे डांटते उन की पत्नी बेटे का पक्ष ले कर उस का बचाव करने लगती. धीरेधीरे पत्नी और बेटे का व्यवहार उन के प्रति बदलने लगा. बेटे के साथ पत्नी भी उन पर हावी होने लगी.

अशोक कुमार जैन अब तक अकूत संपत्ति के मालिक बन चुके थे. उन्होंने इंदिरापुरम में भी एक दुकान खरीद ली थी. इस के अलावा उन्होंने द्वारका में भी एक फ्लैट खरीद लिया था.

सुमन को पता नहीं क्या सूझा कि वह अशोक कुमार जैन से सारी संपत्ति बेटे सिद्धार्थ के नाम करने की जिद करने लगी. इस काम में सुमन का भाई अशोक और उस की बहन का बेटा सतेंद्र जैन भी उस का साथ दे रहे थे. अशोक कुमार जैन बेहद सीधे व्यक्ति थे. परिवार के लोग इसी बात का फायदा उठाना चाहते थे. अगर वह तेजतर्रार होते तो उन में से किसी की भी उन के सामने बोलने की हिम्मत नहीं होती.

अशोक कुमार जैन के अनुसार, जो बेटा कभी उन के सामने बोलता तक नहीं था, मां और अन्य संबंधियों की शह पर उन के साथ बदतमीजी से पेश आने लगा. वह तरहतरह से उन्हें प्रताडि़त करने लगा. सभी का यही कहना था कि सारी प्रौपर्टी सिद्धार्थ के नाम कर दी जाए. किस प्लानिंग के तहत सभी सारी प्रौपर्टी अशोक कुमार जैन से उस के नाम करने को कह रहे थे, इस के बारे में उन के अलावा और कोई नहीं जानता था.

लेकिन अशोक कुमार जैन ने भी तय कर लिया था कि दिनरात मेहनत कर के उन्होंने जो संपत्ति जुटाई है, उसे वह जीतेजी किसी हरामखोर के नाम नहीं करेंगे. वह शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना झेलते रहे. नवंबर, 2016 के आखिरी सप्ताह में एक रात उन की पत्नी सुमन और बेटे सिद्धार्थ ने उन्हें रात को घर से निकाल दिया.

वह अपनी कोठी के बाहर रात भर ठंड में कांपते बैठे रहे, पर उन्हें उन पर दया नहीं आई. यह बात उन्होंने किसी को इसलिए नहीं बताई, क्योंकि इस से घर की बदनामी होती. दिसंबर के पहले सप्ताह में तो उन्होंने अति कर दी. अशोक कुमार जैन पर दबाव बनाने के लिए उन्होंने उन्हें 3-4 दिनों के लिए एक कमरे में बंद कर दिया. जब वह कमरे का सामान तोड़ने लगे तो उन्होंने उन्हें योजना के तहत उस पागलखाने में भरती करा दिया, जहां सचमुच के पागल को भरती कराना आसान नहीं होता.

अशोक कुमार जैन के पागलखाने से भागने पर संस्थान के अधिकारियों में हड़कंप मच गया. उन्होंने उन के बेटे सिद्धार्थ को फोन कर के पूछा कि अस्पताल से भाग कर अशोक कुमार जैन घर तो नहीं पहुंचे. पागलखाने से पिता के भागने की बात सुन कर सिद्धार्थ परेशान हो गया. उस ने अपने सभी रिश्तेदारों को फोन किया, पर पिता के बारे में कहीं से कोई जानकारी नहीं मिली.

शाम को उसे पता चला कि अशोक कुमार जैन अपने जिगरी दोस्त राधारमण के यहां हैं, इसलिए वह रात साढ़े 8 बजे के करीब अपने मौसेरे भाई सतेंद्र जैन और मामा अशोक को ले कर राधारमण के यहां जा पहुंचा. सिद्धार्थ अपने पिता को राधारमण के यहां से सीढि़यों से इस तरह घसीट कर ला रहा था, जैसे वह बहुत बड़े अपराधी हों. तीनों अशोक कुमार जैन को फिर उसी पागलखाने ले गए, जहां से वह भाग कर आए थे.

दोस्त के साथ जो हुआ था, उसे देख कर राधारमण का दिल कांप उठा. अशोक कुमार जैन के साथ वे कुछ अनर्थ न कर दें, दूसरे एसआई वीरपाल को पता था कि अशोक कुमार जैन उन के यहां है, ऐसे में अगर उन्हें कुछ ऐसा हो जाता तो वह फंस सकते थे. इस बात से परेशान हो कर वह अपने बेटे को साथ ले कर रात साढ़े 11 बजे थाना फर्शबाजार पहुंचे, जहां उन्हें एसीपी औफिस में एसीपी दिनेश कुमार मिले.

राधारमण ने एसीपी को अपने दोस्त अशोक कुमार जैन की पूरी कहानी बताई तो उन्होंने कहा कि सिद्धार्थ उन्हें लिख कर दे गया है कि वह अपने पिता को फिर से अस्पताल ले जा रहा है. एसीपी दिनेश कुमार ने उसी समय मानव व्यवहार एवं संबद्ध विज्ञान संस्थान के डाइरैक्टर डा. निमेश जी. देसाई और मैडिकल सुपरिंटैंडेंट डा. दीपक कुमार से बात की. उन्होंने बताया कि अशोक कुमार जैन अस्पताल पहुंच गए हैं और उन्हें दवा दे दी गई है, जिस से वह सो गए हैं.

यह जानकारी मिलने के बाद राधारमण को तसल्ली हुई कि अशोक कुमार जैन ठीक से पहुंच तो गए हैं. राधारमण समझ गए थे कि अशोक कुमार जैन के साथ जो हो रहा है, वह सब प्रौपर्टी को ले कर हो रहा है. उन का बेटा रिश्तेदारों के साथ मिल कर उन्हें पागल करार देने पर तुला है, जबकि वह पूरी तरह स्वस्थ हैं. उन्होंने दिल्ली पुलिस आयुक्त को एक शिकायती पत्र लिखा. जिस में बताया गया था कि सुमन जैन उन का बेटा सिद्धार्थ जैन, सुमन का भाई अशोक और बहन का बेटा सतेंद्र जैन साजिश के तहत अशोक कुमार जैन को पागल घोषित कर के उन की संपत्ति अपने नाम कराना चाहते हैं. उन्होंने अशोक कुमार जैन को इहबास से मुक्त कराने की मांग की.

पुलिस कमिश्नर आलोक कुमार वर्मा को राधारमण ने शिकायती पत्र दे तो दिया था, पर उन्हें नहीं लग रहा था कि पुलिस उन्हें जल्द मुक्त करा सकेगी. तब तक इहबास में दोस्त की हालत पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता था, इसलिए दोस्त को इहबास से निकलवाने के लिए उन्होंने अदालत की शरण में जाने का फैसला किया.

राधारमण ऐसे एडवोकेट को तलाशने लगे, जो उन के दोस्त को इहबास से जल्द से जल्द निकलवा सके. उन्हें किसी ने कड़कड़डूमा कोर्ट के एडवोकेट मनीष भदौरिया के बारे में बताया. वह जानेमाने वकील हैं. उन के पिता एन.के. भदौरिया भी सीनियर वकील हैं. उन्होंने कई बुजुर्गों को अदालत से न्याय दिलाया है. राधारमण ने एडवोकेट मनीष भदौरिया से मुलाकात कर उन्हें पूरी बात बताई.

एडवोकेट मनीष भदौरिया ने मामले की पूरी जानकारी ले कर कड़कड़डूमा कोर्ट की चीफ मैट्रोपौलिटन मजिस्ट्रेट सावित्री की अदालत में अशोक कुमार जैन की पत्नी सुमन जैन, बेटे सिद्धार्थ जैन, सुमन के भाई अशोक और बहन  के बेटे सतेंद्र जैन को आरोपी बना कर अशोक कुमार जैन को इहबास से मुक्त कराने की याचिका दायर की.

माननीय न्यायाधीश सावित्री ने 14 दिसंबर, 2016 को चारों लोगों को कोर्ट में बुलाया. इहबास से अशोक कुमार जैन को भी कोर्ट में बुलवा लिया गया था. कोर्ट में उन्होंने दोनों पक्षों को सुना. कोर्ट में जिस तरह से अशोक कुमार जैन बातें कर रहे थे, उस से कहीं से नहीं लग रहा था कि वह मानसिक रूप से डिस्टर्ब हैं. उन्होंने अदालत में कहा कि वह मानसिक रूप से पूरी तरह स्वस्थ हैं और घर वालों ने उन्हें साजिश के तहत इहबास में भरती कराया है. वह वहां हरगिज नहीं रहना चाहते.

अशोक कुमार जैन ने बताया था कि वह इस समय अपने घर वालों के बजाय दोस्त राधारमण के यहां रहना पसंद करेंगे. कोर्ट ने आदेश दिया कि अशोक कुमार जैन जब राधारमण के घर रहना चाहते हैं और राधारमण भी उन्हें अपने साथ रखना चाहते हैं तो वह उन के यहां रह सकते हैं.

इस के अलावा यह भी आदेश दिया कि 19 दिसंबर, 2016 को अशोक कुमार जैन को मैडिटेशन सैंटर भी ले जाया जाए. मामले की सुनवाई के लिए उन्होंने 11 जनवरी, 2017 तारीख निश्चित कर दी.

इस आदेश के बाद अशोक कुमार जैन और उन के दोस्त को जहां राहत मिली, वहीं दूसरी ओर आरोपी पक्ष के चेहरों पर मायूसी छा गई. दोस्त की पहल पर अशोक कुमार जैन को इहबास की कैद से मुक्ति मिल ही गई है, साथ ही वह दोस्त के घर रह कर बड़ी राहत और खुशी महसूस कर रहे हैं. वह उन के घर उन के परिवार के सदस्य की तरह रह रहे हैं.

अब यहां एक सवाल यह उठता है कि अशोक कुमार जैन ने दिनरात मेहनत कर के करोड़ों रुपए की जो संपत्ति और बिजनैस स्थापित किया है, वह सब किस के लिए है? जाहिर है, सब बेटे के लिए ही किया था. एकलौता बेटा जिसे उन्होंने अच्छे स्कूलों में पढ़ाया, ताकि आगे चल कर वह उन के बिजनैस को संभाल सके तो आखिर ऐसी क्या वजह हो गई कि वही बेटा उन्हें पागलखाने में भरती करा आया? सुखदुख में साथ देने की कसमें खाने वाली उन की पत्नी सुमन बिजनैस और प्रौपर्टी को अपने और बेटे के नाम कराने पर क्यों तुल गई है? कहीं ऐसा तो नहीं कि सुमन और सिद्धार्थ को बहका कर कोई रिश्तेदार अपना स्वार्थ साधने की कोशिश कर रहा है, उन्हीं की गिद्धदृष्टि उन की करोड़ों रुपए की संपत्ति पर लगी है. Family Conspiracy Case

— 2017 में प्रकाशित

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