UP Crime: काली कमाई का कुबेर – यादव सिंह

UP Crime: भ्रष्टाचार की गटरगंगा में मछलियां भी पलती हैं और मगरमच्छ भी. सैकड़ों करोड़ कमाने वाला नोएडा अथौरिटी का चीफ इंजीनियर यादव सिंह॒ऐसा मगरमच्छ था, जिस ने छोटी मछलियों को पनपने भी दिया तो अपने स्वार्थों की खातिर. उस के खिलाफ बारबार जांच हुई लेकिन नतीजा कोई नहीं निकला. आखिर सीबीआई ने इस मगरमच्छ को धर ही दबोचा. दे श की राजधानी दिल्ली के बिलकुल पास स्थित उद्योगों व कौरपोरेट जगत में विश्वस्तरीय पहचान बना चुके नोएडा में छोटेबड़े रईसों की कोई कमी नहीं है.

यहां के विभिन्न सैक्टरों में यूं तो एक से बढ़ कर एक कोठिया बनी हैं, लेकिन सैक्टर-51 स्थित एक बंगलेनुमा कोठी नंबर ए-10 पिछले कुछ समय से खासी चर्चाओं में थी. यह कोठी खास महज इसलिए नहीं थी कि उस की 3 मंजिला बनावट जुदा थी, बल्कि इसलिए कि वह उत्तर प्रदेश सरकार के एक ऐसे अफसर की कोठी थी, जिसे सारा देश उस के कारनामों के लिए जान गया था. आसपास रहने वाले लोग तो चर्चा करते ही थे, उधर से गुजरने वाले लोग भी इस कोठी को अलग नजरिए से देखते थे. पहले वहां पर लालनीली बत्ती वाली गाडि़यों का खूब आवागमन रहता था. इस के बावजूद कम लोग ही कोठी के अंदर जा पाते थे. तगड़ी कदकाठी वाला कोठी का मालिक पूरे रुआब से रहता था. वह आसपास के लोगों से बात तक नहीं करता था.

लेकिन पिछले चंद महीनों में इस कोठी की रौनक जाती रही. लग्जरी गाडि़यां तो दूर गिनेचुने लोग ही वहां आतेजाते थे. लोगों का ध्यान भी इस कोठी की तरफ से हटना शुरू हो गया था, लेकिन 3 फरवरी, 2016 को न सिर्फ कोठी, बल्कि उस का मालिक भी एक बार फिर चर्चाओं में आ गया. इस की वजह यह थी कि कोठी के मालिक को देश की सब से बड़ी जांच एजेंसी सेंट्रल ब्यूरो औफ इन्वैस्टीगेशन (सीबीआई) ने गिरफ्तार कर लिया था.

गिरफ्तार किए गए शख्स का नाम था यादव सिंह. नोएडा/ग्रेटर नोएडा और यमुना एक्सप्रैसवे अथौरिटी का सस्पैंड चीफ इंजीनियर. वह सरकारी तंत्र का इतना बड़ा भ्रष्ट अफसर था कि उस के कारनामों ने बड़ेबड़े घपलों को भी मात दे दी थी. उस का रसूख और हैसियत ऐसी थी कि आला दर्जे के अधिकारी भी उस से एक मिनट की मुलाकात के लिए तरसते थे. क्या नेता, क्या अधिकारी सब उस के आगेपीछे घूमते थे. यूं तो वह आरोपों और जांच के दायरे में कई बार घिरा, लेकिन उस की पकड़ इतनी मजबूत थी कि कभी उस का बाल भी बांका नहीं हो सका. वह जिसे चाहता था, अपनी अंगुलियों पर नचा देता था. लेकिन वक्त ने उस के रसूख को भी लील लिया.

सीबीआई की एंटीकरैप्शन व एसटीएफ विंग ने यादव सिंह को पूछताछ के लिए अपने लोधी रोड, दिल्ली स्थित हैड क्वार्टर बुलवाया, जहां पूछताछ के बाद उसे गिरफ्तार कर लिया गया. पहले से ही सुर्खियों में रहे यादव सिंह के खिलाफ यह बहुत बड़ी काररवाई थी. अगले दिन सीबीआई टीम यादव को ले कर गाजियाबाद स्थित सीबीआई कोर्ट पहुंची तो वहां पहले से मीडियाकर्मियों की भारी भीड़ थी. यादव सिंह का सीबीआई की गिरफ्त में होना ही बड़ी खबर थी.

यादव सिंह सीबीआई की सफेद रंग की टवेरा कार से नीचे उतरा तो लोग उसे सही ढंग से देख पाए. वह काली पैंट, व्हाइट जैकेट और नीली कैप लगाए हुए था. वक्त की चाल का शिकार हुए यादव सिंह की हालत हारे हुए जुआरी जैसी थी. गहमागहमी के बीच सीबीआई ने उसे विशेष जज जे. श्रीदेवी की अदालत में पेश कर के पूछताछ के लिए 10 दिनों का रिमांड मांगा. प्राथमिक चार्जशीट के अध्ययन और कुछ देर चली सुनवाई के बाद अदालत ने उसे 6 दिनों के रिमांड पर सीबीआई को सौंप दिया. रिमांड स्वीकृत होते ही टीम उसे ले कर दिल्ली के लिए रवाना हो गई.

काली कमाई से हजारों करोड़ का साम्राज्य खड़ा करने वाला यादव सिंह सीबीआई के शिकंजे में कैसे आया? एक मामूली इंजीनियर अरबपति कैसे बन गया? इस के पीछे भी एक कहानी थी. यादव सिंह मूलत: आगरा का रहने वाला था. मत्त्वकांक्षी यादव सिंह की परवरिश गरीबी में हुई थी. उस का ख्वाब था कि वह बड़ा आदमी बने. इतना बड़ा कि गरीबी उस के आसपास भी न मंडरा सके. उस ने इलैक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा किया. इस के बाद सन 1980 में उस की नौकरी नोएडा आथौरिटी में लग गई.

इंसान जितना महत्त्वाकांक्षी होता है, अपनी महत्त्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए उस का दिमाग उतना ही तेज चलता है. यादव सिंह के कई साल नौकरी में बीत गए. इस बीच उस ने न सिर्फ अपने काम, बल्कि अथौरिटी के पूरे संचालन को अच्छी तरह से समझ लिया. सरकारी सिस्टम की उन बारीकियों को उस ने बारीकी से समझा, जहां अतिरिक्त आय के स्रोत थे. बात सिर्फ इतनी नहीं थी. उस ने यह भी जान लिया था कि सरकारी तंत्र राजनीतिज्ञों के इशारों के गुलाम होते हैं. नौकरशाह का रसूख ऊपर तक हो तो वह खुल कर खेल सकता है. यादव सिंह इसी राह पर चला और छुटभैये नेताओं से शुरू हुआ उस का सफर एक दिन उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के सत्ता के गलियारों तक जा पहुंचा.

इस का उसे फायदा तब मिला जब सन 1995 में एक दर्जन से ज्यादा इंजीनियरों को नजरअंदाज कर के उसे प्रोजैक्ट इंजीनियर के पद पर प्रमोशन दे दिया गया. यादव सिंह के पास इस पद के हिसाब से डिग्री नहीं थी, लेकिन राजनीतिज्ञों के संरक्षण की वजह से उसे डिग्री हासिल करने के लिए 3 साल का समय दिया गया. बिलकुल उसी तरह जैसे किसी को लाइसेंस देने से पहले ही बंदूक दे दी जाए. इस के बाद यादव सिंह खुल कर खेला. बाद में उस ने डिग्री भी हासिल कर ली.

तनख्वाह भले ही सीमित थी, पर यादव सिंह के ठाठबाट देखते ही बनते थे. उस की किस्मत तब और भी जोरों से जागी, जब सन 2002 में उसे चीफ मैंटीनेंश इंजीनियर के पद पर तैनात किया गया. अथौरिटी में यह बेहद महत्वपूर्ण और बड़ा पद था. अगले 9 सालों में यादव सिंह ने अपने नेटवर्क को भी मजबूत बनाया और मनमानी दौलत भी एकत्र की. आलम यह था कि यादव सिंह ने नोएडा के ही सैक्टर-51 और सैक्टर-24 में 2 आलीशान कोठियां  खड़ी कर ली थीं. इस के अलावा उस ने अपने परिवार के लिए आगरा में भी देवरी रोड पर बड़ी सी भव्य कोठी बनवा दी थी. इस कोठी में उस के बड़े भाई कपूर सिंह और उन का परिवार रहता था. यह आर्थिक हैसियत सिर्फ प्रत्यक्ष थी, जबकि वास्तव में हकीकत और भी बड़ी थी.

वक्त यादव सिंह का साथ दे रहा था. वह जैसा चाहता था, ठीक वैसा ही होता था. उन दिनों प्रदेश में बसपा की मायावती सरकार थी. यादव सिंह सरकार में मजबूत पकड़ बना चुका था. वह मुख्यमंत्री मायावती तक अपनी पहुंच बताता था. अथौरिटी में चीफ मैंटीनेंस इंजीनियर के और भी पद थे, पर उस ने अपनी पहुंच का इस्तेमाल कर के सभी पद न केवल खत्म करा दिए, बल्कि अपने लिए इंजीनियर इन चीफ का पद सृजित करा लिया. यादव सिंह के पास दौलत, ताकत और पहुंच सभी कुछ॒था. आला अधिकारियों से ले कर राजनैतिक आकाओं की उस पर नजरें इनायत थीं.

यादव सिंह को किसी ने कहा कि अगर वह तिलक लगाए और सोना पहने तो समृद्धि और भी बढ़ जाएगी. उस ने ऐसा ही किया. उस के माथे पर तिलक के साथ गले में सोने की चेन और हाथों की अंगुलियों में हीरे जडि़त सोने की कई अंगूठियां दमकने लगीं. सिस्टम पर पकड़ होने की वजह से बसपा सरकार में यादव सिंह की तूती बोलती थी. विरोधी सहकर्मियों ने उसे हटाने के लिए एक बार प्लानिंग भी की, लेकिन यादव सिंह सब पर भारी पड़ा और अपनी ताकत से विरोधियों को आईना दिखा दिया. वे लोग पद पर होते हुए भी काम के लिए तरस गए. यादव सिंह के परिवार में उस की पत्नी कुसुमलता के अलावा बेटा सन्नी और 2 बेटियां थीं करुणा और गरिमा.

सन 2011 से यादव सिंह के खिलाफ घोटाले की आवाज उठनी शुरू हुई. बाद में नवंबर महीने में बीजेपी सांसद किरीट सोमैया ने यादव सिंह के खिलाफ 950 करोड़ का घोटाला उजागर किया. यह बात अलग थी कि यादव सिंह पर तत्काल इस का कोई असर नहीं हुआ. यादव सिंह का सफर बहुजन समाज पार्टी की मायावती सरकार से शुरू हो कर  सन 2012 में समाजवादी पार्टी की अखिलेश यादव सरकार तक आ गया था. अखिलेश सरकार आई तो यादव सिंह पर शिकंजा कसने की तैयारी की गई. 950 करोड़ के टेंडर घोटाले में अथौरिटी के चीफ इंजीनियर के खिलाफ 13 जून, 2012 को थाना सैक्टर-39 में विभिनन धाराओं में मुकदमा दर्ज कर लिया गया. इस बार यादव सिंह को सस्पैंड कर दिया गया.

विरोधी खुश हुए कि यादव सिंह अब लपेटे में आ जाएगा, क्योंकि मामला काफी बड़ा था. लेकिन यह विरोधियों की सोच थी. उन की खुशफहमी को तब झटका लगा, जब यादव सिंह ने अपने दिमागी गणित का फार्मूला मौजूदा सरकार में भी चला दिया. सस्पैंड होने के बावजूद अथौरिटी में यादव सिंह का हस्तक्षेप बराबर बना रहा. बड़े आवंटनों में यादव सिंह की सहमति ली जाती थी. इस रसूख का नतीजा यह निकला कि नोएडा पुलिस ने यादव सिंह को इस मामले में क्लिनचिट दे दी और अदालत में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर दी.

फिर कभी इस घोटाले पर सवाल खड़ा न हो, इसलिए इस मामले की सीबीसीआईडी जांच भी हुई, लेकिन यादव सिंह इस में भी बच गया. कुछ महीनों की गर्दिशों के बाद यादव सिंह को न केवल बहाल कर दिया गया, बल्कि प्रमोशन भी मिला. उसे यमुना एक्सप्रेस वे अथौरिटी का चीफ इंजीनियर बना दिया गया. एक बार फिर यादव सिंह को पंख लगे. वह अपने रसूख को बरकरार रख कर मजे से नौकरी करने लगा. इस के बाद एक तरह से उस की ताकत और भी बढ़ गई थी. अब उस का कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता था. यादव सिंह औडी जैसी महंगी लग्जरी गाडि़या रखता था. लेकिन वह अपनी कारों पर सरकारी ड्राइवर नहीं रखता था.

यादव सिंह के रसूख का आलम यह था कि उस से मिलने के लिए लोग तरसते थे. वह कहीं किसी फंक्शन में जाता था तो बड़े अफसर और नेता उस के इर्दगिर्द मंडराते नजर आते थे. यादव सिंह का व्यवहार आला दर्जे के अधिकारी जैसा होता था. फंक्शन किसी का भी हो, लेकिन सारी रौनक यादव सिंह पर आ कर सिमट जाती थी. औफिस आने वाले बड़े बिल्डर और ठेकेदार सब से पहले यादव सिंह को खुश करते थे. अथौरिटी में वही होता था, जो यादव सिंह चाहता था. उस की मर्जी के बिना न कोई ठेका दे सकता था और न ही कोई छोटेबड़े आवंटन हो सकते थे. उस की खुशी और अनुमति दोनों के ही मायने होते थे. सरकारी लोगों को वह अपनी निजी जिंदगी से दूर ही रखता था.

यादव सिंह की दौलत पर किसी को कोई शक नहीं था, लेकिन उस की दौलत का दायरा कितना था, यह कोई नहीं जानता था. इस की भी वजह थी, क्योंकि मोटी डील वह अपने घर और होटलों में करता था. किसी की आर्थिक हैसियत का अंदाजा 2 तरीकों से ही होता है. पहला वह खुद जम कर उस का प्रदर्शन करे या फिर कोई दूसरा मय तथ्यों के उस का खुलासा कर दे. यादव सिंह के मामले में वक्त के साथ दूसरा तरीका अपनाया गया.

वह अकूत दौलत का मालिक है, यह बात 17 नवंबर, 2014 को तब पता चली, जब आयकर महानिदेशक (जांच) कृष्णा सैनी के निर्देश पर आयकर निदेशक (जांच) अशोक कुमार त्रिपाठी के नेतृत्व में आयकर विभाग की कई टीमों ने उस की नोएडा वाली कोठी सहित उस के कई ठिकानों पर एक साथ छापेमारी की. इस से उन लोगों की गलतफहमी तो दूर हुई ही, जो उन्हें छोटामोटा अमीर समझते थे, आयकर विभाग भी बुरी तरह चौंक गया. 2 दिनों तक चली इस छापेमारी में यादव सिंह की करोड़ों की संपत्ति पकड़ में आई. प्रौपर्टी के कागजात व अन्य दस्तावेज कई सूटकेसों में भरे हुए थे. कोठी के बाहर खड़ी सफेद रंग की औडी कार की डिग्गी से ही 10 करोड़ रुपए नगद बरामद हुए.

घर में रखी तिजोरियों और अलमारियों को खंगालने के साथ ही आयकर विभाग ने उन के कई बैंकों के लौकर भी खंगाले और वहां से संपत्तियों के पेपर्स के साथसाथ करीब 2 करोड़ रुपए के आभूषण बरामद किए. इन आभूषणों में 9 लखा हार, हीरे के कई सैट, हीरे जड़ाऊ कंगन और गहनों के गिफ्ट आदि थे. घर में ही गहनों का मिनी शोरूम बना था. उस के परिवार और नजदीकियों के नाम करोड़ों की संपत्तियां थीं.

यह बड़ी काररवाई थी. इस से यादव सिंह छटपटा गया. इस के चलते ही यह राज भी खुल गया कि यादव सिंह ने अपनी पत्नी को तलाक दे रखा था. इस की वजह भी पता चल गई. दरअसल यादव सिंह ने पत्नी व बच्चों के नाम पर कारोबारी घरानों के साथ मिल कर 30 से ज्यादा कपंनियां खड़ी कर दी थीं. इन कंपनियों में कुसुम गारमेंट्स प्रा.लि., न्यू एरा सौफ्टवेयर, चाहत टैक्नौलोजी प्रा.लि., केएस अल्ट्राटैक प्रा.लि., क्विक इन्फौटैक सौल्यूशन प्रा.लि. व हिचकी क्रियेशंस प्रा.लि. प्रमुख थीं.

खास बात यह थी कि महज कुछ हजार से शुरू होने वाली ये कंपनियां कुछ ही दिनों में करोड़ों के टर्नओवर तक पहुंच गई थीं. बताते हैं कि यादव सिंह ब्लैकमनी को कंपनियों में लगा कर उसे व्हाइट मनी बनाना चाहता था. वैसे यादव सिंह खुद इन कंपनियों के मालिक नहीं था. इन कंपनियों को उस ने सन    2006 से ही खड़ा करना  शुरू कर दिया.

एक तरफ की काली कमाई दूसरी तरफ जा रही थी. कंपनियों में नोट गिनने की मशीनें थीं. करोड़ों रुपयों की शिफ्टिंग में निजी सुरक्षाकर्मियों का सहारा लिया जाता था. बात यहीं खत्म नहीं हुई. यादव सिंह के यहां से छापे में मिले आभूषणों के आंकलन और परख के लिए सर्राफों को बुलाया गया. आभूषणों को देख कर सर्राफों को भी पसीने आ गए, क्योंकि सभी जेवरात न केवल महंगे थे, बल्कि सौ फीसदी खरे थे. यादव सिंह भ्रष्ष्टाचार का मगरमच्छ बन कर सामने आया था. अपने पद पर रहते हुए उस ने अपने नाते रिश्तेदारों को धड़ाधड़ महंगे प्लाट आवंटित किए थे.

आयकर विभाग ने यादव सिंह का पासपोर्ट भी जब्त कर लिया था. इस सब के बावजूद यादव सिंह बेफिक्र था. इस की वजह थी उन की सियासी पकड़ और पहुंच. चर्चा होने लगी थी कि यादव सिंह आयकर विभाग को टैक्स चुका कर पाकसाफ बच जाएगा. क्योंकि आयकर विभाग को बरामद संपत्तियों, नगदी पर टैक्स से मतलब होता है. बहरहाल, आयकर विभाग ने अपनी जांच जारी रखी. इसी जांच में पता चला कि यादव सिंह के परिवार के नाम जो कंपनियां थीं, उन का लेनदेन विदेशों में भी था. प्रवर्तन निदेशालय को इस से अवगत करा दिया गया. इसी बीच यादव सिंह सुप्रीम कोर्ट की तरफ से भ्रष्टाचार के मामलों को ले कर बनाए गए विशेष जांच दल (एसआईटी) के रडार पर वह आ गया. एसआईटी ने इस मामले को संज्ञान में ले कर काररवाई शुरू कर दी.

यादव सिंह के खिलाफ सरकार ने तत्काल कोई काररवाई नहीं की थी. इस पर राजनीतिक दलों ने घेराबंदी शुरू की. जब सरकार पर सवाल उठने लगे तो मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने साफ किया कि आयकर विभाग और अन्य एजेंसियों की जांच रिपोर्ट आने के बाद सरकार यादव सिंह के खिलाफ कोई काररवाई करेगी. आखिर 8 दिसंबर को यादव सिंह समेत 3 लोगों को सस्पैंड कर दिया गया. यादव सिंह यह सोच कर बेफिक्र था कि इस बार भी वह पुराने फार्मूले अपना कर बच जाएगा.

लेकिन यादव सिंह का समय अनुकूल नहीं था. फिर भी उसे अपनी पहुंच और रसूख पर पूरा भरोसा था. उसे पूरी उम्मीद थी कि धीरेधीरे सब ठीक हो जाएगा. लेकिन यादव सिंह के सितारे गर्दिश में थे. शायद उस का बिगड़ा खेल बन भी जाता, लेकिन इसी बीच उत्तर प्रदेश के चर्चित सीनियर आईपीएस अमिताभ ठाकुर की पत्नी और सामाजिक कार्यकर्ता डा. नूतन ठाकुर ने 11 दिसंबर को हाईकोर्ट में एक याचिका दायर कर दी.

उन्होंने तर्क दिया कि यादव सिंह के यहां आयकर छापों में करोड़ों की अवैध संपत्ति के सुबूत मिले हैं. इसलिए उस के खिलाफ सीबीआई जांच होनी चाहिए. अदालत ने 16 दिसंबर को सरकार से जवाब तलब किया तो सरकार ने इसी बीच 10 फरवरी को यादव सिंह के खिलाफ जांच करने के लिए रिटायर्ड जस्टिस अमरनाथ वर्मा की अध्यक्षता में एक सदस्यीय जांच आयोग गठित कर दिया.

बाद में हुई सुनवाई में याची ने अदालत में तर्क दिया कि राज्य सरकार ने काररवाई करने के बजाय न्यायिक आयोग बना दिया. ऐसा इसलिए किया गया, ताकि सूबे में पूर्व और मौजूदा सरकारों में ऊंची पहुंच रखने वाले यादव सिंह के मामले को रफादफा किया जा सके. आरोप लगाया गया कि सन 2002 से 2014 के बीच यादव सिंह करीब 2 हजार करोड़ की परियोजनाओं से ने बड़ी तादाद में अवैध संपत्ति अर्जित की. याची सीधे तौर पर सीबीआई जांच की मांग की.

इस पर कोर्ट ने एसआईटी से भी जानकारियां हासिल कीं. कई सुनवाइयों के बाद आखिर 16 जुलाई, 2015 की हाईकोर्ट की लखनऊ बैंच के मुख्य न्यायमूर्ति डा. धनंजय यशवंत चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति नारायण शुक्ल की खंडपीठ ने सीबीआई जांच के आदेश दे दिए. हाईकोर्ट ने कहा कि ‘हमारे मतानुसार इस मामले के हालात सीबीआई के सुपुर्द करने लायक हैं. क्योंकि इस में भ्रष्टाचार का मामला बनता है.’ अदालत के हस्तक्षेप के बाद यादव सिंह की बचाव की तैयारियां धरी की धरी रह गई. उस के लिए यह बड़ी मुसीबत थी. इस बुरे वक्त में उस के नातेरिश्तेदारों से ले कर बड़े घरानों और नेताओं ने भी पल्ला झाड़ लिया था. वजह यह थी कि कोई भी जांच के लपेटे में नहीं आना चाहता था.

इस दौरान वह खुद भी सामने नहीं आया. आखिर हाईकोर्ट के आदेश पर सीबीआई ने इस मामले में 30 जुलाई, 2015 को यादव सिंह व उस के साथियों के खिलाफ धारा 120बी, 409, 420, 466, 467, 469, 471 के अंतर्गत केस दर्ज कर लिया. इस पूरे प्रकरण की जांच का जिम्मा एसटीएफ व एंटी करैप्शन विंग के सुपुर्द कर दिया गया. सीबीआई जानती थी कि यादव सिंह बड़ा खिलाड़ी है. इसलिए वह उसे बचने का कोई मौका नहीं देना चाहती थी.

4 अगस्त, 2015 को सीबीआई की टीमों ने एक साथ दिल्ली, आगरा, नोएडा व फिरोजाबाद समेत 12 स्थानों पर छापेमारी की और यादव सिंह की 38 प्रौपर्टी का पता लगाने के साथ ही महत्वपूर्ण दस्तावेज बरामद कर लिए. सीबीआई की 14 सदस्यीय टीम ने यादव सिंह की कोठी में घंटों जांचपड़ताल की. आयकर विभाग ने भी सबूत एकत्र किए. अगले कुछ महीनों में जांच में जुटी सीबीआई ने धीरेधीरे टेंडर व जमीनों के आवंटन से जुड़ी 3 हजार फाइलों का जखीरा एकत्र कर लिया. सीबीआई ने इस दौरान कई बार नोएडा अथौरिटी जा कर जांच की और टेंडर से जुड़ी मूल पत्रावलियों को जब्त किया.

यादव सिंह ने सन 2002 से ले कर 1 दिसंबर, 2014 तक विभिन्न कार्यों के हजारों करोड़ रुपए के टेंडर जारी किए थे. सन 2014 में तो महज 8 दिनों के भीतर उस ने 950 करोड़ रुपए के ठेके बांट दिए थे. यह भी साफ हो गया कि यादव सिंह के पास आय से अधिक संपत्ति है. सीबीआई ने इस की भी जांच की कि 950 करोड़ के बड़े घोटाले में आखिर यादव सिंह बच कैसे गया? इस की नए सिरे से जांच हुई. सीबीआई ने बिल्डरों के ठिकानों पर छापेमारी की और दस्तावेज बरामद किए. इस में खुलासा हुआ कि यादव सिंह ने 5 फीसदी कमीशन के बदले टेंडर बांटे थे. 17 दिसंबर को सीबीआई ने नोएडा के सहायक परियोजना अभियंता रामेंद्र को गिरफ्तार कर लिया. उस से कड़ी पूछताछ के बाद सुबूत जुटाए और उसे जेल भेज दिया गया.

इस बीच अथौरिटी से पता किया गया कि यादव सिंह को तैनाती के बाद से कुल कितना वेतन मिला. पता चला कि सैकड़ों करोड़ की प्रौपर्टी जुटाने वाले यादव सिंह को सन 1980 से निलंबन तक की अवधि में वेतन के रूप में 70 लाख रुपए दिए गए थे. सैकड़ों पत्रावलियों और छापेमारी में बरामद दस्तावेजों की जांच में भ्रष्टाचार के पुख्ता सबूत मिले. जांच टीम ने सीबीआई के डायरेक्टर अनिल कुमार सिन्हा से विचारविमर्श के बाद यादव सिंह को गिरफ्तार करने का फैसला किया. आखिरकार सीबीआई ने 3 फरवरी को यादव सिंह को अपने हैड क्वार्टर बुला कर गिरफ्तार कर लिया.

रिमांड अवधि पूरी होने पर सीबीआई ने यादव सिंह को पुन: अदालत में पेश किया और 5 दिनों का रिमांड और ले लिया. यादव सिंह जांच में सहयोग नहीं कर रहा था. फलस्वरूप सीबीआई को उस की रिमांड अवधि बढ़वानी पड़ी. 17 फरवरी को उसे पुन: अदालत पर पेश किया गया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. फिलहाल वह जेल में है. कथा जांच एजेंसियों की काररवाई व जनचर्चाओं पर आधारित. UP Crime

 

Punjab News: डीआईजी हरचरण सिंह भुल्लर अधिकारी बड़ा तो रिश्वत भी मोटी

Punjab News: 8 लाख रुपए की रिश्वतखोरी के आरोप में गिरफ्तार पंजाब पुलिस के डीआईजी हरचरण सिंह भुल्लर के घर पर हुई सीबीआई छापेमारी के दौरान नकद 7.5 करोड़ रुपए, 1.5 किलो स्वर्ण आभूषण, 2 लग्जरी कार, 22 महंगी घडिय़ों समेत अनेक बेशकीमती सामान बरामद हुआ है. हैरानी की बात तो यह है कि गिरफ्तार डीआईजी 100 करोड़ रुपए की संपत्ति के मालिक भी हैं. आखिर कौन है यह धनकुबेर और कहां से आई ये संपत्ति?

11 अक्तूबर, 2025 को एक स्क्रैप व्यापारी ने सीबीआई के चंडीगढ़ स्थित औफिस में लिखित शिकायत दर्ज कराई कि रोपड़ रेंज के डीआईजी हरचरण सिंह भुल्लर ने उस पर फरजी एफआईआर की धमकी दे कर 8 लाख रुपए रिश्वत की मांग की है. यह गोपनीय खबर पाते ही सीबीआई चौकन्नी हो गई थी, क्योंकि शिकायत पुलिस के सीनियर अधिकारी के खिलाफ थी, इसलिए सीबीआई अब डीआईजी की हर गतिविधि पर सूक्ष्मता से नजर रखने लगी. फिर 16 अक्तूबर, 2025 को सीबीआई टीम ने डीआईजी हरचरण सिंह भुल्लर को मोहाली स्थित उन के औफिस में 5 लाख रुपए की पहली किस्त लेते रंगेहाथ गिरफ्तार कर लिया.

इस के तुरंत बाद सीबीआई अधिकारियों ने डीआईजी के मोहाली, चंडीगढ़ और खन्ना स्थित ठिकानों पर ताबड़तोड़ छापेमारी की काररवाई की. इन छापों के दौरान उन के ठिकानों से 7.5 करोड़ रुपए नकद, 2.5 किलोग्राम सोना, 22 कीमती घडिय़ां, 40 लीटर विदेशी शराब, हथियार और कई अन्य कीमती सामान बरामद किया गया. इस के साथ ही 15 प्रौपर्टी के दस्तावेजों के साथसाथ कई बैंक लौकरों की चाबियां भी मिलीं. केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के अनुसार डीआईजी हरचरण सिंह भुल्लर और उन के परिवार के नाम पर 50 अचल और कई बेनामी संपत्तियों के दस्तावेज भी मिले हैं. इस संपत्ति की कुल कीमत 100 करोड़ रुपए से अधिक की बताई जा रही है.

पंजाब पुलिस के रोपड़ रेंज के डिप्टी इंसपेक्टर जनरल औफ पुलिस (डीआईजी) हरचरण सिंह भुल्लर 2009 बैच के आईपीएस अधिकारी हैं. इन के पिता मेजर मेहल सिंह भुल्लर भी पंजाब पुलिस में डीजीपी के पद पर रह चुके हैं. हरचरण सिंह भुल्लर के परिवार में पत्नी, एक बेटा और एक बेटी है. हरचरण सिंह की सेक्टर 40, चंडीगढ़ में अपनी एक कोठी है. इस के अलावा खन्ना में एक फार्महाउस भी है.

पंजाब पुलिस में डीआईजी रैंक तक पहुंचने वाले हरचरण सिंह भुल्लर का करिअर सिविल सेवा के अन्य अधिकारियों से काफी अलग रहा है. जहां अधिकांश पुलिस अधिकारी संघ लोक सेवा आयोग की प्रतिष्ठित परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) में शामिल होते हैं, वहीं दूसरी ओर हरचरण सिंह ने राज्य पुलिस सेवा (एसपीएस) परीक्षा उत्तीर्ण कर पुलिस उपाधीक्षक (डीएसपी) के रूप में पंजाब पुलिस में अपनी नौकरी शुरू की थी.

बाद में नियमानुसार पदोन्नति पा कर वह बिना यूपीएससी क्लीयर किए आईपीएस अधिकारी बने थे. एसपीएस अधिकारी के रूप में हरचरण सिंह भुल्लर ने संगरूर, बरनाला, फतेहगढ़ साहिब, होशियारपुर, खन्ना, जगरों, गुरदासपुर और मोहाली सहित कई जिलों में महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाली थीं. मोहाली में एसएसपी रहते हुए उन्होंने काफी सराहनीय कार्य किया. वर्ष 2016 में यूपीएससी की अनुशंसा पर एसपीएस कोटे से उन का प्रमोशन आईपीएस में हो गया. 2023 में हरचरण सिंह भुल्लर को पुलिस उपमहानिरीक्षक (डीआईजी) का पद मिला और 27 नवंबर, 2024 को उन्होंने रोपड़ रेंज, रूपनगर का प्रभार संभाला था.

अपनी इस नई भूमिका में उन्होंने नशीले पदार्थों के खिलाफ पंजाब में एक बड़ा अभियान चलाया और राज्य में नशे के अवैध व्यापार पर काफी रोकथाम लगाई. हरचरण सिंह भुल्लर अकाली दल नेता बिक्रम सिंह मजीठिया से जुड़े ड्रग्स केस की विशेष जांच दल (एसआईटी) के प्रमुख भी रहे थे. हरचरण सिंह भुल्लर के पिता मेहल सिंह भुल्लर भी इन के साथ ही रहते हैं, जिन का एक गौरवशाली अतीत रहा है. हरचरण सिंह भुल्लर के छोटे भाई का नाम कुलदीप सिंह भुल्लर है, वह एक पूर्व राजनेता रहे हैं, जो 2002 के पंजाब विधानसभा चुनाव में जीरा क्षेत्र से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस उम्मीदवार थे. कुलदीप भुल्लर पूर्व में एमएलए भी रह चुके हैं.

पिता मेहल सिंह रह चुके हैं डीजीपी

डीआईजी हरचरण सिंह भुल्लर के जीवन में उन की प्रेरणा का स्रोत उन के पिता मेजर मेहल सिंह भुल्लर रहे थे, जो स्वयं पंजाब जैसे विशाल राज्य के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) रह चुके थे. मेजर मेहल सिंह एक सेवानिवृत्त सेना अधिकारी और भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी रहे हैं, जिन्होंने 2002-2003 तक पंजाब पुलिस के पुलिस महानिदेशक के रूप में कार्य किया था. डीजीपी मेहल सिंह भुल्लर ने भारतीय सेना के मेजर के रूप में 13वीं पंजाब रेजीमेंट के साथ एक आपातकालीन युद्ध यानी कि इमरजेंसी कमीशंड अधिकारी के रूप में भारतीय सेना में भी काम किया था.

मेजर मेहल सिंह भुल्लर ने भारत-चीन और भारत-पाकिस्तान 1965 के युद्धों में भी भाग लिया था. इस के साथ ही उन्होंने 1960 के दशक से मिजोरम आतंकवाद विरोधी अभियानों में भी भारतीय सैन्य अधिकारी के रूप में उत्कृष्ट कार्य किया था. मेहल सिंह भुल्लर का जन्म सन 1943 में हुआ था. इन की पत्नी का नाम दलजीत कौर है. इन के 2 बेटे हैं हरचरण सिंह भुल्लर और उन से छोटे कुलदीप सिंह भुल्लर.

सैन्य सेवा छोडऩे के बाद मेहल सिंह ने भारतीय पुलिस में अपनी सेवाएं दी और 1980 तथा 1990 के दशक में पंजाब में हो रहे आतंकवाद के खिलाफ निर्णायक लड़ाई में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया. मेजर मेहल सिंह ने पंजाब के उग्रवादियों के आत्मसमर्पण की नीति को प्रोत्साहित किया और पंजाब आम्र्ड पुलिस (पीएपी) को मजबूत करने के लिए जालंधर (पंजाब) में पीएपी कौंप्लेक्स और पुलिस डीएवी स्कूल जैसे संस्थानों की भी स्थापना की. मेजर मेहल सिंह भुल्लर को पंजाब पुलिस के कई उदीयमान खिलाडिय़ों को प्रशिक्षित करने का श्रेय भी दिया जाता है, जिन में प्रमुख रूप से डब्लूडब्लूई पहलवान दलीप सिंह हैं, जिन्हें पूरे विश्व में आज ‘खली’ के रूप में भी जाना जाता है.

पंजाब के जालंधर में पंजाब सशस्त्र पुलिस इनडोर स्टेडियम का नाम उन के सम्मान में ही रखा गया है. मेहल सिंह भुल्लर इस के साथसाथ पंजाब वौलीबाल एसोसिएशन के मानद आजीवन सदस्य भी हैं. डीआईजी हरचरण सिंह भुल्लर के काले कारनामों का खुलासा करने वाला एक स्क्रैप व्यापारी आकाश बत्ता है, जिस ने डीआईजी जैसे उच्च लेवल वाले पुलिस अधिकारी के खिलाफ शिकायत करने की हिम्मत जुटाई थी. दरअसल, आकाश बत्ता पर यह आरोप था कि वह दिल्ली से जाली बिल और बिल्टियों के माध्यम से माल ला कर मंडी गोविंदगढ़ की फर्नेसों में बेचा करता है और इस तरीके से वह टैक्स चोरी कर रहा है. इस के लिए आकाश बत्ता के खिलाफ अपराध संख्या 155 दर्ज की गई थी. आकाश बत्ता के खिलाफ वर्ष 2023 नवंबर के महीने में पंजाब के फतेहगढ़ साहिब जिले के सरहिंद थाने में मामला दर्ज किया गया था.

वैसे आमतौर पर पुलिस थानों में दर्ज होने वाले केस थाने के एसएचओ या उस के नीचे के अधीनस्थ अधिकारियों द्वारा जांच कर निपटा दिए जाने का प्रचलन है, लेकिन इस केस में स्क्रैप के जरिए टैक्स चोरी और राज्य सरकार को चूना लगाने की बात थी तो यह मामला स्टेप बाई स्टेप डीआईजी हरचरण सिंह भुल्लर तक भी पहुंच गया था. इस तरह से वह डीआईजी के लिए एक आसान टारगेट बन गया था. इस के बाद चालान पेश करने की धमकी दे कर बिचौलिए कृष्णु के माध्यम से डीआईजी हरचरण सिंह भुल्लर द्वारा आकाश बत्ता से रिश्वत मांगी गई.

कृष्णु नाभा का रहने वाला था और पुलिस अफसरों का दलाल भी था. स्क्रैप कारोबार के चलते कृष्णु ने आकाश बत्ता से मुलाकात की. कृष्णु ने आकाश को बताया कि वह डीआईजी भुल्लर साहब का खास दोस्त है. उस ने कहा कि तुम्हारे खिलाफ एफआईआर नंबर 155 के बदले में तुम्हें कुछ सेवा पानी करना होगा. इस के लिए सब से पहले 8 लाख रुपए की मांग की गई और उस के बाद हर महीने 5 लाख रुपए देने को कहा गया. आकाश बत्ता को यह भरोसा दिलाया गया कि तुम्हें स्क्रैप बिजनैस में पूरी की पूरी खुली छूट दी जाएगी. तुम मनमरजी से काम कर सकते हो.

जब आकाश बत्ता ने रुपए देने से मना किया तो उसे अब झूठे केस में फंसाने की लगातार धमकियां दी जाने लगीं. अब तक आकाश बत्ता की समझ में पूरी तरह से आ चुका था कि असली डौन डीआईजी हरचरण सिंह भुल्लर है, जबकि कृष्णु बिचौलिया है. झूठे केस डालने और ‘तुझे देख लेंगे, अब तू अपना कारोबार कैसे करता है.’ बारबार इन धमकियों से आकाश बत्ता बुरी तरह से डर चुका था और दिनप्रतिदिन टूटता भी जा रहा था. एक बार उस के मन में यह भी आया कि पंजाब पुलिस के आला अधिकारियों से डीआईजी भुल्लर की शिकायत करनी चाहिए, मगर फिर उस ने सोचा कि पंजाब पुलिस अपने डीआईजी पर काररवाई बिलकुल भी नहीं करेगी. उस के बाद उस ने सीबीआई के सामने इस रिश्वतखोरी का भांडा फोडऩे का अंतिम निर्णय कर लिया.

उस के बाद आकाश बत्ता सीधे चंडीगढ़ स्थित सीबीआई के औफिस में पहुंच गया और अपनी शिकायत लिखित रूप में वीडियो रिकौर्डिंग के साथ सीबीआई को सुनाई और तुरंत काररवाई करने का निवेदन किया. जब सीबीआई अधिकारियों ने कौल रिकौर्डिंग को सुना तो उन के भी होश उड़ गए थे. कौल रिकौर्डिंग में मंथली लेने की बात भी सामने आई.

दरअसल, सीबीआई को किसी भी राज्य में काररवाई करने के लिए गृह विभाग को सूचना देती पड़ती है. विभाग की मंजूरी के बाद ही सीबीआई काररवाई कर सकती है. सीबीआई को शक था कि कहीं पंजाब सरकार अनुमति न दे और काररवाई की सूचना कहीं लीक न हो जाए, इसीलिए सीबीआई ने डीआईजी को कार्यालय बुला कर पकड़ा था.

सीबीआई ने कैसे बिछाया जाल

डीआईजी जैसी बड़ी शख्सियत को पकडऩे के लिए सीबीआई ने बाकायदा जाल बिछाया था और पूरी तैयारी के साथ उन्हें गिरफ्तार किया. सीबीआई ने पहले डीआईजी भुल्लर के लिए बिचौलिए और धन उगाही करने वाले कृष्णु को 8 लाख रुपए के लिए एडवांस 5 लाख रुपए की आकाश बत्ता से रिश्वत लेते हुए चंडीगढ़ के सेक्टर 21 से गिरफ्तार कर लिया. ये रिश्वत डीआईजी भुल्लर के नाम से ली गई थी. सीबीआई ने गिरफ्तार कृष्णु के घर से भी नकदी बरामद की.

जब सीबीआई ने कृष्णु को दबोच लिया तो उस के बाद सीबीआई की तरफ से डीआईजी भुल्लर को कौल किया गया. कौल इस तरह से किया गया था, जिस से डीआईजी को कानोंकान यह पता भी न लग सके कि कोई एजेंसी इस के पीछे काम कर रही है. कौल करने पर डीआईजी भुल्लर ने कौल पर पेमेंट लेने की बात मानी और शिकायतकर्ता एवं पैसे लेने वाले शख्स को अपने औफिस में आने को कहा. इस के बाद तो सीबीआई की विशेष टीम खुद उन के औफिस में पहुंच गई, जहां से उन्हें उठा लिया गया.

सीबीआई ने डीआईजी भुल्लर को गिरफ्तार करने के बाद जब उन के ठिकानों पर छापेमारी की तो टीम को वहां से नोटों से भरे ठसाठस 3 बैग मिले. करीब 4 घंटे तक सीबीआई ने उन के ठिकानों पर छापेमारी की तो उन के घर से तो कुबेर का खजाना ही निकलने लगा था. कैश इतना अधिक था कि सीबीआई की टीम को नोट गिनने वाली कई मशीनें तक मंगवानी पड़ीं. केंद्रीय एजेंसी ने तलाशी पूरी होने के बाद कहा कि उन्होंने डीआईजी भुल्लर के ठिकानों से 7.5 करोड़ रुपए नकद, 2.5 किलोग्राम सोना, लग्जरी कारें, 26 महंगी घडिय़ां जिन में रोलेक्स और राडो जैसी ब्रांडेड घडिय़ां भी शामिल थीं. इस के साथ ही डीआईजी के परिवार के सदस्यों के नाम 50 से अधिक संपत्तियां, संदिग्ध बेनामी इकाइयों के दस्तावेज, लौकर की चाबियां और कई बैंक अकाउंट्स की डिटेल्स भी मिली.

इस के साथ ही समराला में डीआईजी के फार्महाउस से 100 कारतूसों के साथ 4 बंदूकें भी बरामद की गईं. शराब की 108 बोतलें और 17 कारतूस जब्त किए गए. इन संपत्तियों की कीमत 100 करोड़ रुपए से अधिक की बताई जा रही है.

दलाल की पुलिस विभाग में थी पैठ

डीआईजी हरचरण सिंह भुल्लर रिश्वत कांड का दूसरा मुख्य आरोपी बिचौलिया कृष्णु शारदा नाभा के हरिदास कालोनी का रहने वाला है. कृष्णु बचपन में हौकी का एक अच्छा खिलाड़ी रहा था. कृष्णु शारदा कांग्रेस सरकार के समय नवजोत सिंह सिद्धू एवं पूर्वमंत्री साधु सिंह धर्मसोत के निकट भी रहा बताया जाता है. साधारण परिवार से संबंध रखने वाला कृष्णु शारदा सोशल मीडिया में काफी एक्सपर्ट था. कृष्णु ने बौलीवुड स्टार अक्षय कुमार की फिल्म में भी अभिनय किया है.

प्राप्त जानकारी के अनुसार कुछ समय तक नवजोत सिंह सिद्धू के इंटरनेट मीडिया अकाउंट को हैंडल करने के दौरान वह पंजाब पुलिस के अधिकारियों के करीब रहने लगा था. कृष्णु शारदा की कई नई तसवीरें भी अब धीरेधीरे सामने आ रही हैं, जिस में वह कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू, आईपीएस मुखविंदर सिंह छीना, आईएएस वरुण रुजम, आईपीएस गुरुसिमरत सिंह ढिल्लों और डीएसपी दविंदर कुमार अत्री के साथ नजर आ रहा है.

यह भी बताते हैं कि वह डीआईजी हरचरण सिंह भुल्लर के कितना नजदीक था, इस का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उस की डीआईजी औफिस में बिना रोकटोक एंट्री होती थी. शादीशुदा कृष्णु शारदा एक बेटे का पिता है. उस के पापा राजकुमार एक प्राइवेट जौब करते हैं. कृष्णु ने 2018 से ले कर 2022 तक मंडी गोबिंदगढ़ में फायर ब्रिगेड औफिस में आउटसोर्स पर काम किया, जबकि इन दिनों वह कोई काम नहीं करता था. बेरोजगार कृष्णु ने अपने फेसबुक पेज पर कई पुलिस अधिकारियों व राजनेताओं के साथ अपने फोटो भी अटैच किए हुए हैं.

सीबीआई काररवाई के बाद अब कई तरह के सवाल खड़े हो रहे हैं कि आखिर नवजोत सिंह सिद्धू से कृष्णु का क्या और कैसा रिश्ता रहा है, क्योंकि ज्यादातर वाइरल तसवीरों में वह नवजोत सिंह सिद्धू और उन के परिवार के साथ नजर आ रहा है. बिचौलिया कृष्णु शारदा आखिरकार इन नेताओं और अफसरों के साथ किस तरह का संबंध और काम रखता था, अब इस की जांच सीबीआई कर रही है.

इस संबंध में सीबीआई चंडीगढ़ के एंटी करप्शन ब्यूरो की टीम के हाथ कुछ अहम सुराग भी लगे हैं. सीबीआई एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार कृष्णु और डीआईजी भुल्लर के बीच जिन मोबाइल नंबरों और वाट्सऐप के जरिए रिश्वत लेने की बात हो रही थी. उन में कृष्णु के वाट्सऐप चैट में कई नेताओं, आईएएस, आईपीएस और पीसीएस अफसरों की चैट सामने आई है.

अपने वाट्सऐप चैट पर कृष्णु ने कई और नेताओं के साथ लोगों के काम कराने और उन की फाइलों को क्लीयर कराने की चैट भी लगा रखी है, अब आने वाले समय में सीबीआई इन चैट के आधार पर उन संदिग्ध अधिकारियों और नेताओं से भी पूछताछ कर सकती है. बिचौलिया कृष्णु शारदा नियमित रूप से चंडीगढ़ और मोहाली स्थित पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों से मिलने भी जाता रहता था. इस रिश्वतखोरी कांड के सामने आने के बाद पंजाब के राज्यपाल महामहिम गुलाब चंद कटारिया ने डीआईजी भुल्लर की भ्रष्टाचार के मामले में गिरफ्तारी को एक आंखें खोलने वाला मामला बताया है.

रिश्वतखोर डीआईजी भुल्लर को किया सस्पेंड

डीआईजी भुल्लर की एक महीने की सैलरी करीब 2 लाख 64 हजार रुपए बन रही थी, लेकिन उन के घर से कैश और गोल्ड बरामदगी से यह पता चला है कि वे कैसी लग्जरी लाइफ इंजौय कर रहे थे. लुधियाना में डीआईजी भुल्लर के समराला फार्महाउस से जो शराब की बोतलें सीबीआई द्वारा जब्त की गईं, उन में से कई शराब की बोतलों की कीमत 50 हजार से भी अधिक की थी. उन के घर और फार्महाउस से सीबीआई को 500 रुपए के नोट रखने के लिए टेबलें तक छोटी पड़ गई थीं. इस के बाद सीबीआई की टीम द्वारा जमीन पर चटाई बिछा कर उन नोटों की गिनती करनी पड़ी.

उच्च पुलिस अधिकारी डीआईजी भुल्लर के खिलाफ रिश्वतखोरी मामले में शिकायत करने वाले स्क्रैप व्यापारी आकाश बत्ता ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में याचिका दायर कर हाईकोर्ट से सुरक्षा की मांग की है. याचिकाकर्ता आकाश बत्ता को अब हाईकोर्ट की तरफ से पंजाब सरकार और सीबीआई को इस केस का आंकलन कर सुरक्षा देने का आदेश जारी कर दिया गया है. हाईकोर्ट के जस्टिस अमन चौधरी ने सुनवाई के दौरान पंजाब सरकार और सीबीआई को अपने स्पष्ट आदेश पारित किए कि वे याचिकाकर्ता की सुरक्षा और खतरों का आंकलन करें और यदि आवश्यक हो तो कानून के अनुसार सुरक्षा प्रदान करें.

पंजाब सरकार ने भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों में गिरफ्तार किए गए डीआईजी हरचरण सिंह भुल्लर पर सख्त काररवाई की है. राज्य के गृह विभाग ने शनिवार दिनांक 18 अक्तूबर, 2025 को एक आदेश जारी करते हुए उन्हें तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है. निलंबन का यह निर्णय अखिल भारतीय सेवा अधिनियम 3(2) के प्रावधानों के तहत लिया गया है, जिस के अनुसार गिरफ्तारी के 48 घंटे बीत जाने के बाद अधिकारी स्वत: ही निलंबित माना जाता है.

गृह विभाग के आदेश में बताया गया है कि पंजाब के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) गौतम यादव की रिपोर्ट के आधार पर यह कदम उठाया गया. रिपोर्ट के अनुसार रोपड़ रेंज के डीआईजी हरचरण सिंह भुल्लर (आईपीएस) को सीबीआई ने 16 अक्तूबर, 2025 को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 7 और 7ए के तहत दर्ज एक मामले में गिरफ्तार किया था.

अंत में कहा जा सकता है कि इस गंभीर भ्रष्टाचार के खिलाफ सीबीआई द्वारा की गई काररवाई सख्त, उचित और प्रभावी रही है. पंजाब पुलिस के डीआईजी हरचरण सिंह भुल्लर की गिरफ्तारी और जांच पूरे देश और समाज को यह स्पष्ट संदेश देती है कि कानून के आगे कोई भी सरकार या कोई भी बड़े से बड़ा अधिकारी तक बड़ा नहीं है. सीबीआई की आगे आने वाली जांच में अन्य अवैध लेनदेन और अन्य संपत्तियों के खुलासे की उम्मीद की जा सकती है.

पंजाब के कई आईपीएस अफसर खा चुके हैं जेल की हवा

पंजाब में आज भले ही रोपड़ रेंज के डीआईजी हरचरण सिंह भुल्लर की गिरफ्तारी से पंजाब में खाकी पर एक बदनुमा दाग लगा है, लेकिन पंजाब में इस से पहले भी कई आला से आला अधिकारी तक भ्रष्टाचार के कारण जेल की हवा खा चुके हैं. ताज्जुब की बात तो यह है कि मौजूदा समय में भी 2 आईपीएस अधिकारी, एक आईजी व डीआईजी के खिलाफ भ्रष्टाचार के संगीन केस अदालत में विचाराधीन हैं. इतना ही नहीं, यहां पर तो डीजीपी से ले कर एआईजी तक विवादों के घेरे में रहे हैं. जिन में से कुछ प्रमुख नाम इस प्रकार हैं.

पंजाब के आईजी प्रदीप कुमार यादव पर विजिलेंस ब्यूरो ने करप्शन का केस दर्ज कर अदालत में दाखिल किया हुआ है. आईजी प्रदीप कुमार पर एक केस में 20 लाख रुपए की रिश्वत वसूलने का केस है. इस केस में बाबा दयालदास हत्याकांड में घटना के समय ही मोगा गांव कपूरे के रहने वाले संत जरनैल दास को बतौर मुख्य आरोपी नामजद किया गया था, जिसे पंजाब पुलिस ने जांच के आधार पर क्लीन चिट दे दी थी. उस के बाद शिकायतकर्ता बाबा गगनदास के पैरवी करने पर आईजी (फरीदकोट) रहे प्रदीप कुमार यादव ने एसपी गगनेश कुमार की अध्यक्षता में एसआईटी का गठन किया, जिस में डीएसपी सुशील कुमार व एसआई खेमचंद पाराशर को भी शामिल किया गया था.

तीनों पुलिस अधिकारियों ने हत्याकांड के मुख्य आरोपी जरनैल दास को दोबारा नामजद करवाने के लिए शिकायतकर्ता गगन दास से आईजी के नाम 50 लाख रुपए की रिश्वत मांगी और फिर डराधमका कर 20 लाख रुपए वसूल भी कर लिए थे. दूसरे केस में पंजाब विजिलेंस ने फिरोजपुर के तत्कालीन डीआईजी इंदरबीर सिंह को रिश्वत लेने के केस में नामजद किया है. डीआईजी इंदरबीर सिंह वर्तमान में आम्र्ड पुलिस जालंधर में तैनात हैं. हालांकि विजिलेंस टीम ने फिलहाल उन की गिरफ्तारी नहीं की है. उन के खिलाफ डीएसपी लखबीर सिंह सरकारी गवाह बन चुके हैं. जिन्होंने यह आरोप लगाया है कि डीआईजी ने 10 लाख रुपए की रिश्वत ली थी.

भिखीवंड पुलिस ने 20 जून, 2022 को नशा तस्कर को गिरफ्तार किया था. उस से हुई विस्तृत पूछताछ में कई पुलिस अधिकारियों के नाम सामने आए. उस के बाद भिखीवंड पुलिस ने 6 जुलाई, 2022 को डीएसपी लखबीर संधू को गिरफ्तार किया था. उन से फिर पूछताछ के बाद अब फिरोजपुर के तत्कालीन डीआईजी इंदरबीर सिंह का नाम सामने आने पर अब उन के खिलाफ केस दर्ज किया गया है. तीसरे केस में एआईजी आशीष कुमार पर वर्ष 2018 में जालसाजी और धोखाधड़ी केस में 2 महिलाओं को राहत देने के बदले में उन से चैक साइन करवा कर एक करोड़ रुपए बैंक से निकलवाने के आरोप में केस दर्ज किया गया था.

इस केस में एआईजी आशीष कपूर के अतिरिक्त डीएसपी पवन कुमार और एएसआई हरजिंदर सिंह के ऊपर भी एफआईआर दर्ज की गई थी. विजिलेंस टीम ने 6 अक्तूबर, 2022 को एआईजी आशीष कपूर को गिरफ्तार किया था. आशीष कपूर के ऊपर एक महिला से दुष्कर्म और जबरन उगाही का आरोप भी है. उस महिला ने अपने आरोप में स्पष्ट कहा था कि वह इमिग्रेशन फ्रौड से जुड़े एक केस में जेल में बंद थी. महिला के अनुसार आशीष कुमार उस समय अमृतसर में जेल सुपरिटेंडेंट थे.

आशीष कपूर ने जेल में अपने पद का फायदा उठाते हुए महिला से जबरन शारीरिक संबंध बनाए. उस के बाद आशीष कपूर ने मातारानी की फोटो को साक्षी मानते हुए महिला से शादी भी कर ली थी. दुष्कर्म के बाद जब महिला गर्भवती हो गई तो आशीष कपूर ने उस महिला की जमानत करा दी. उस महिला का आशीष कपूर पर सीधासीधा यह आरोप था कि आशीष कपूर ने ही मई 2018 में उक्त महिला को झूठे इमिग्रेशन केस में फंसाया था. इतना ही नहीं, आशीष कपूर ने उक्त महिला को अपना क्रेडिट कार्ड भी दे कर रखा था और महिला के लिए घर खरीदने की बात भी कही थी. उस महिला ने क्रेडिट और डेबिट कार्ड का यूज करते हुए करीब 44 लाख रुपए की शौपिंग भी की थी.

चौथे केस में पंजाब में अपहरण के मामले में पंजाब पुलिस के आईजी गौतम चीमा सहित 6 अन्य दोषियों को सीबीआई अदालत ने 8 महीने की सजा सुना रखी है. इन सभी आरोपियों पर भगोड़े एक अपराधी ने पुलिस हिरासत में अपहरण के आरोप लगाए थे. अदालत ने आईजी गौतम चीमा को आईपीसी की धारा 225 (किसी आरोपी को गिरफ्तार में बाधा पहुंचाने), 186 (पुलिस के काम में बाधा पहुंचाने) व 120बी (साजिश रचने) के तहत सजा सुनाई है.

पांचवें केस में मोहाली स्थित सीबीआई कोर्ट ने रिटायर्ड आईपीएस बलकार सिंह समेत 3 अन्य पुलिसकर्मियों को 3-3 साल की सजा सुनाई. इन सभी लोगों ने अमृतसर से एक युवक को उठाया था जोकि बाद में गायब हो गया. उस समय 7 मई, 1992 को अमृतसर के गांव पौरसी राजपूत से सुरजीत सिंह नामक युवक को उठाया गया था और उस समय के तत्कालीन डीएसपी रहे बलकार सिंह, एसएचओ उधम सिंह और कांस्टेबल रहे ऊधम सिंह ने इस काररवाई को अंजाम दिया था.

इस के अलावा पंजाब के डीजीपी रह चुके सुमेध सैनी भी काफी विवादों में रहे हैं. उन के ऊपर अपहरण व हत्या का मामला अभी भी अदालत में चल रहा है. 33 साल पुराने आईएएस के बेटे बलवंत सिंह मुल्तानी हत्याकांड में पंजाब पुलिस के पूर्व डीजीपी सुमेध सैनी पर केस दर्ज होने के 5 साल बाद ट्रायल चल रहा है. मामले की जांच कर रही एसआईटी ने दिसंबर, 2020 में पूर्व डीजीपी सुमेध सैनी पर हत्या सहित 7 धाराओं में चार्जशीट दाखिल की थी.

इस के अलावा एक अन्य केस में पंजाब के आईजी परमराज उमरानंगल भी गिरफ्तार हो चुके हैं. पंजाब के फरीदकोट जिले के गांव बरगाड़ी में 12 अक्तूबर, 2015 की श्रीगुरुग्रंथ साहिब की बेअदबी के बाद बहिबल कलां और फरीदकोट में हुए गोली कांड की घटनाओं में आईजी परमराज सिंह उमरानंगल को गिरफ्तार किया गया था और वह भी जेल की हवा खा चुके हैं. Punjab News