Love Crime: गर्लफ्रेंड का इंटरव्यू रोकने की साजिश – प्रेमी ने कंपनी को दी बम से उड़ाने की धमकी

Love Crime: एक ऐसा अनोखा मामला सामने आया, जो आप को भी हैरान कर देगा. जहां एक बौयफ्रेंड ने अपनी गर्लफ्रेंड का इंटरव्यू रुकवाने की ऐसी साजिश रची कि सभी हैरान रह गए. उस ने ईमेल के जरिए कंपनी को एक मैसेज भेजा और कहा कि वह बम से उड़ा देगा. चलिए जानते हैं इस लव और क्राइम की स्टोरी को विस्तार से, जो आप को होने वाले क्राइम से सचेत करेगी.

यह घटना हरियाणा के गुरुग्राम के सेक्टर 43 स्थित वन होराइजन सेंटर में एक निजी कंपनी से सामने आई है. जहां प्रेमी अनिकेत ने सुबह 9 बजे कंपनी को मेल भेज कर धमकी दी. यह मेल कंपनी के औफिशियल मेल आईडी पर भेजा गया था. आसपास इलाके में बम की धमकी से हड़कंप मच गया. पुलिस को सूचना दी गई और पुलिस मौके पर पहुंची. इसके बाद पुलिस ने स्निक डौग और मेटल डिटेक्टर की मदद से कंपनी का पूरा केबिन चेक किया.

पुलिस ने जांच की तो पता चला कि मेल फेक था और बम की सूचना भी फेक थी. एसीपी विकास कौशिक ने बताया कि डीएलएफ थाना साइबर की पूरी टीम ने कंपनी में सभी को खाली करवा कर तलाशी ली. कई घंटों तक जांच चली, लेकिन पुलिस को कोई भी संदिग्ध वस्तु नहीं मिली.

जांच में खुलासा हुआ कि प्रेमी अनिकेत ने यह साजिश अपनी पूर्व गर्लफ्रेंड से रिश्ता सुधारने के लिए रची थी. अनिकेत ने यह वारदात इसलिए की ताकि गर्लफ्रेंड का इंटरव्यू स्थगित हो जाए और वह उस से फिर से संपर्क कर सके. आरोपी अनिकेत के खिलाफ पुलिस ने रिपोर्ट दर्ज कर ली है. Love Crime

True Crime Story: जब सोई मोहब्बत जागी

True Crime Story: शहाना स्कूल के समय से ही सरफराज से मोहब्बत करने  लगी थी. जब उस की शादी  सरफराज से नहीं हो सकी  तो वह सलीम से निकाह  कर के उस की हो गई,  लेकिन बाद में उस ने  सलीम से भी किनारा  कर लिया. इस के बाद  उस का निकाह नवाब से  हुआ लेकिन अपने प्यार के  चक्कर में उस ने नवाब को  ठिकाने लगवा दिया.

8दिसंबर, 2015 की देर रात उत्तराखंड के शहर जसपुर के थाना कुंडा में किसी राहगीर ने फोन द्वारा सूचना दी कि शेर अली बाबा की मजार के पास एक व्यक्ति की लाश पड़ी है. शेरअली बाबा की मजार काशीपुरजसपुर राष्ट्रीय राजमार्ग- 74 के किनारे है. लाश पड़ी होने की सूचना मिलते ही थाना कुंडा के थानाप्रभारी रमेश तनवार तुरंत पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. लाश खून से लथपथ जसपुर की तरफ जाने वाली सड़क के किनारे पड़ी थी. वहीं पर कुछ लोग भी खड़े थे.

थानाप्रभारी ने वहां खड़े लोगों से मरने वाले शख्स की शिनाख्त करानी चाही, लेकिन कोई भी उसे नहीं पहचान सका. पुलिस ने मृतक की जेब की तलाशी ली तो जेब में एक परची मिली. उस पर एक मोबाइल नंबर लिखा था. वह फोन नंबर किस का है, यह जानने के लिए थानाप्रभारी ने अपने फोन से वह नंबर मिलाया  तो दूसरी तरफ से शहाना नाम की औरत ने फोन रिसीव किया. उन्होंने उस महिला से जानकारी ली तो पता चला कि वह जसपुर के मोहल्ला छिपियान के नवाब की पत्नी शहाना परवीन है.

थानाप्रभारी ने शहाना से उन के पति के बारे में पूछा तो उस ने उलटे थाना प्रभारी से ही सवाल किया, ‘‘क्या मैं जान सकती हूं कि आप कौन बोल रहे हैं और आप मेरे पति को क्यों पूछ रहे हैं?’’

‘‘देखिए, मैं थाना कुंडा का थानाप्रभारी बोल रहा हूं. दरअसल हमें शेर अली बाबा की मजार के पास एक आदमी की लाश मिली है. उसी लाश की जेब से यह आप का मोबाइल नंबर मिला है. कहीं यह लाश आप के किसी परिचित की तो नहीं है? आप यहां आ कर लाश को देख लीजिए.’’

थानाप्रभारी ने शहाना को लाश का जो हुलिया बताया था, वह जान कर शहाना रोने लगी, क्योंकि वह हुलिया उस के पति के हुलिए से मिल रहा था. उस का पति नवाब भी घर पर नहीं था. देर रात में अचानक शहाना के रोनेचिल्लाने की आवाज सुन कर उस के परिवार वाले और मोहल्ले के कुछ लोग जमा हो गए. नवाब के साथ अनहोनी की बात सुनते ही वे सभी रात में ही शहाना के साथ अली बाबा की मजार के पास पहुंच गए. घटनास्थल पर पड़ी लाश देखते ही शहाना दहाड़े मार कर रोने लगी, क्योंकि वह लाश उस के पति नवाब की थी. उस जगह को देख कर ऐसा लग रहा था, जैसे नवाब का किसी वाहन से एक्सीडेंट हुआ था, लेकिन उस के घर वाले यह नहीं समझ पा रहे थे कि नवाब वहां तक पहुंचा कैसे?

पुलिस ने नवाब के घर वालों से पूछा तो उन्होंने बताया कि नवाब का हरिद्वार और लक्सर में ट्रांसपोर्ट का काम था. उस के घर आनेजाने का भी कोई नियत समय नहीं था. काम में व्यस्त होने की वजह से वह 2-4 दिनों बाद ही जसपुर आता था. 8 दिसंबर को वह घर जरूर आया था. घर से वह काशीपुर कैसे पहुंचा, इस की किसी को जानकारी नहीं थी. उस समय रात ज्यादा हो चुकी थी, इसलिए घर वालों से कुछ जानकारी लेने के बाद लाश को पोस्टमार्टम के लिए काशीपुर भिजवा दिया गया. अगले दिन से पुलिस इस केस की जांचपड़ताल में जुट गई. सुबहसुबह पुलिस फिर से उस जगह पहुंच गई, जहां लाश मिली थी, ताकि वहां से कोई सबूत वगैरह मिल सके.

घटनास्थल के आसपास पुलिस ने काफी खोजबीन की, लेकिन वहां से ऐसा कोई सबूत नहीं मिला, जिस के आधार पर पुलिस घटना की तह तक पहुंच पाती. मृतक का मोबाइल फोन भी गायब था. पुलिस ने सोचा कि दुर्घटना होने पर नवाब सड़क पर गिर गया होगा और उसे एक्सीडेंट करने वाले ने मजार के पास डाल दिया होगा. पुलिस ने मृतक के घर वालों से एक बार फिर बात की तो उन्होंने बताया कि नवाब एक मिलनसार व्यक्ति था. उस की किसी से कोई दुश्मनी भी नहीं थी. वह उस की दुर्घटना वाली बात को मानने को तैयार नहीं थे. इस पर पुलिस ने उस के मोबाइल नंबर को सर्विलांस पर लगा दिया.

नवाब के मोबाइल की काल डिटेल्स निकलवाई गई तो पता चला कि 8 दिसंबर को उस की कुछ नंबरों पर बातचीत हुई थी. जिनजिन नंबरों पर उस की बातचीत हुई थी, पुलिस उन नंबरों की जांच में जुट गई. उन में 2 नंबर संदिग्ध नजर आए. जांच के दौरान पता चला कि उन में से एक नंबर रामपुर जिले के गांव बैजनी निवासी खालिद का था, जबकि दूसरा नंबर जिला मुरादाबाद के थाना भगतपुर के गांव बहेड़ी के रहने वाले उस्मान का था.

पुलिस इन दोनों ही व्यक्तियों से पूछताछ करना चाहती थी, इसलिए एसएसपी केवल खुराना ने उन की तलाश कि लिए थानाप्रभारी रमेश सिंह के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई, जिस में एसआई अशोक कुमार, कांस्टेबल मनोज कोहली, खेम सिंह, जगत सिंह, शहाना परवीन आदि को शामिल किया गया. यह पुलिस टीम खालिद और उस्मान के घरों पर गई तो वे दोनों ही अपने घरों से गायब मिले. उन के घरों से पुलिस को उन के बारे में यह जानकारी मिल गई कि दोनों काशीपुर में नौकरी कर रहे हैं.

पता चला कि खालिद हमदम अस्पताल में और उस्मान वहीं के सनराईज अस्पताल में कंपाउंडरी कर रहा है. यह जानकारी मिलते ही पुलिस टीम काशीपुर पहुंची. लेकिन वे वहां भी नहीं मिले. अस्पताल वालों ने बताया कि वे कई दिनों से अपनी ड्यूटी पर नहीं आ रहे हैं. इस के बाद पुलिस को इन दोनों पर शक हो गया. लिहाजा पुलिस ने उन की तलाश के लिए मुखबिर लगा दिए. करीब 2 सप्ताह बाद 25 दिसंबर को पुलिस को सुबहसुबह मुखबिर द्वारा सूचना मिली कि खालिद और उस्मान कहीं जाने की फिराक में काशीपुर बसअड्डे पर खड़े हैं. यह खबर मिलते ही पुलिस टीम तुरंत बस अड्डे पर पहुंच गई. दोनों वहां एक बैंच पर बैठे मिल गए.

पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया. दोनों को गिरफ्तार कर पुलिस कुंडा थाने ले आई. वहां उन से सख्ती से पूछताछ की तो दोनों जल्दी ही टूट गए. दोनों ने स्वीकार कर लिया कि नवाब की हत्या उन्होंने नवाब की पत्नी शहाना के प्रेमी सरफराज के कहने पर की थी. सरफराज एक प्रतिष्ठित परिवार से था. पुलिस बिना सबूत के उसे गिरफ्तार करना नहीं चाहती थी. इसलिए पुलिस ने सब से पहले सरफराज के फोन की काल डिटेल्स निकलवाई. उस की काल डिटेल्स में एक नंबर ऐसा मिला, जिस पर वह दिन में करीब 40 बार बात करता था.

जांच में पता चला कि वह नंबर उसी मोहल्ले की रहने वाली शहाना का है. इस से पुलिस को यकीन हो गया कि सरफराज और शहाना के बीच जरूर प्रेमसंबंध रहे होंगे, तभी तो वे फोन पर इतनी ज्यादा बातें करते हैं. यानी खालिद और उस्मान ने पुलिस को जो बात बताई थी, उस में सच्चाई नजर आने लगी. इस से पुलिस को कुछ और ही कहानी नजर आने लगी. सरफराज जसपुर के ही मोहल्ला छिपियान में रहता था. पुलिस उस के घर पहुंची तो वह घर पर ही मिल गया. पुलिस को देखते ही उस के होश उड़ गए. पुलिस पूछताछ के लिए उसे भी थाने ले आई.

पुलिस ने सरफराज से पूछताछ की तो उस ने साफ कह दिया कि उस का इस केस से कोई लेनादेना नहीं है. इस पर पुलिस ने उस के फोन की काल डिटेल्स उस के सामने रखी. जिस में उस की शहाना से एक साल में 12995 बार बातें हुई थीं. अब सच्चाई सरफराज के सामने थी, जिसे वह झुठला नहीं सकता था. फिर भी वह खुद को बचाने के लिए यही कहता रहा कि उस की शहाना से दोस्ती है, इसलिए वह उस के साथ इतनी बातें फोन पर करता था. लेकिन नवाब की हत्या से उस का कोई संबंध नहीं है.

इस के बाद पुलिस टीम मृतक नवाब की पत्नी शहाना को पूछताछ के लिए थाने ले आई. शहाना भी पुलिस को घुमाने की कोशिश में लगी रही. लेकिन पुलिस ने जब उसे बताया कि उस का प्रेमी सरफराज पुलिस हिरासत में है और उस ने सब कुछ साफसाफ बता दिया है तो शहाना को सांप सूंघ गया. पुलिस उसे सरफराज के पास ले आई. दोनों को आमनेसामने बैठा कर बात की गई तो सरफराज टूट गया. उस ने बताया कि शहाना के कहने पर ही उस ने नवाब को ठिकाने लगवाया था. इस के बाद दोनों ने ही अपना गुनाह कबूल कर लिया. इन दोनों के प्यार से ले कर नवाब की हत्या तक की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार निकली—

उत्तराखंड के जसपुर शहर के मोहल्ला छिपियान में हाजी फिदा हुसैन का परिवार रहता था. मुसलिम बाहुल्य इस शहर के अधिकांश मुसलिमों का लकड़ी का व्यापार है. फिदा हुसैन का भी लकड़ी का व्यापार था. उन के परिवार में 7 सदस्य थे. शहाना इन की दूसरे नंबर की बेटी थी. वह शुरू से ही पढ़ाईलिखाई में तेज थी. इसीलिए मदरसे की पढ़ाई के बाद फिदा हुसैन ने उस का दाखिला फैजएआम इंटर कालेज में करा दिया था. सरफराज ने भी उसी कालेज में दाखिला लिया था. इस से पहले भी वह मदरसे में शहाना के साथ ही पढ़ता था.

सरफराज फिदा हुसैन के घर के पास अगले नुक्कड़ पर रहने वाले शब्बीर मास्टर का बेटा था. पड़ोसी होने के नाते दोनों के घर वालों का एकदूसरे के घर आनाजाना लगा रहता था. शब्बीर मास्टर का छोटा परिवार था. शब्बीर प्राइमरी स्कूल में टीचर थे. उन के परिवार में 3 बेटे थे, जिन में सरफराज सब से छोटा था. शब्बीर मास्टर तेजतर्रार व्यक्ति थे. इसलिए मोहल्ले क्या, शहर की पूरी बिरादरी में उन की अच्छी जानपहचान थी.

शब्बीर मास्टर अपने दोनों बेटों की शादी कर चुके थे. सरफराज अभी पढ़ रहा था, इसलिए उन्हें उस की ज्यादा चिंता नहीं थी. सरफराज के इंटरमीडिएट करने के बाद शब्बीर मास्टर ने उस के सामने शादी की बात रखी तो उस ने साफ कह दिया कि जब तक वह कोई कामधंधा नहीं कर लेता, शादी नहीं करेगा. उधर शुरू से साथसाथ पढ़ने के कारण शहाना और सरफराज के बीच नजदीकियां बढ़ गई थीं. उन की दोस्ती प्यार में बदल गई थी. और तो और दोनों ने साथसाथ जीनेमरने की कसमें भी खा ली थीं.

उसी दौरान किसी के माध्यम से शब्बीर मास्टर को पता चला कि सरफराज और शहाना के बीच चक्कर चल रहा है. वह समझ गए कि सरफराज शादी के लिए मना क्यों कर रहा है. उन्होंने इस बारे में सरफराज से बात की तो उस ने कह दिया कि वह शहाना से प्यार करता है और उसी से निकाह करना चाहता है. शब्बीर मास्टर ने बेटे की खुशी के लिए शहाना के अब्बू फिदा हुसैन से बात भी की, पर वह तैयार नहीं हुए.

फिदा हुसैन की समाज में अच्छीखासी इज्जत थी. बेटी वाली बात कहीं समाज में न फैल जाए, इसलिए वह उस के लिए अच्छा लड़का तलाशने लगे, ताकि जल्द से जल्द उस की शादी कर सकें. थोड़ी भागादौड़ी कर के उन्हें उस के योग्य वर मिल भी गया. जसपुर के तत्कालीन चेयरमैन मोहम्मद उमर के बेटे सलीम से उन्होंने शहाना की शादी तय कर दी. अच्छी हैसियत वाले परिवार में शादी तय होने के बाद घर वाले गदगद थे. फिदा हुसैन इस बात से खुश थे कि उन की बेटी इतने संपन्न परिवार में खुश रहेगी.

शादी तो तय हो गई, लेकिन फिदा हुसैन को दुविधा इस बात की थी कि कहीं शहाना शादी करने से मना न कर दे. यदि उस ने ऐसा कर दिया तो बिरादरी में उन की किरकरी हो जाएगी. इसी बात को ध्यान में रखते हुए फिदा हुसैन ने अपने नजदीकी रिश्तेदारों को बुला कर शहाना को समझाने के लिए कहा. रिश्तेदारों के समझाने पर शहाना सलीम से शादी करने के लिए तैयार तो हो गई, लेकिन उस का दिल सरफराज पर ही लगा रहा. इस के बाद फिदा हुसैन ने शादी की तैयारी शुरु कर दी. उधर जब सरफराज को पता चला कि शहाना की शादी किसी और के साथ होने वाली है तो वह परेशान हो गया. उस ने शहाना से बात की तो शहाना ने कह दिया कि घर वालों और रिश्तेदारों की हठ के आगे उसे मजबूर होना पड़ा. शहाना का फैसला सुन कर सरफराज को दुख हुआ.

उधर बड़ी धूमधाम के साथ शहाना और सलीम का निकाह हो गया. यह सन 1997 की बात है. उस के निकाह के बाद सरफराज परेशान रहने लगा. वह शहाना से फोन पर बातें करता रहता था. शहाना भले ही सलीम की पत्नी बन गई थी लेकिन सरफराज के साथ गुजारे पलों की यादें उस के दिल से अभी भी धूमिल नहीं हो पाई थीं.

वह जब कभी मायके आती, उस की निगाहें हर वक्त सरफराज की राहों पर जमी रहतीं. इत्तफाक से कभी दोनों आमनेसामने पड़ जाते तो एकदूसरे के लिए तड़प उठते. मौका मिलने पर दोनों मुलाकात भी कर लेते. यही वजह थी कि शहाना मायके आने के बाद ससुराल नहीं जाना चाहती थी. वह सरफराज के प्यार में पागल सी हो गई थी. यह बात सलीम को पता चली तो वह परेशान हो उठा. सलीम ने शहाना को समझाने की बहुत कोशिश की, लेकिन उस पर कोई फर्क नहीं पड़ा. जब शहाना नहीं मानी तो उस ने उस के साथ रिश्ता तोड़ दिया.

सलीम से रिश्ता टूटने के बाद सरफराज बहुत खुश हुआ. उसे उम्मीद थी कि अब तो उसे उस का खोया प्यार मिल जाएगा. फिदा हुसैन पहले से ही बेटी के कारनामों से तंग आ चुके थे. दोनों के मिलनेजुलने से मोहल्ले वालों ने उन का मोहल्ले में रहना दूभर कर दिया. शहाना अपने अब्बू पर सरफराज से निकाह कराने का दबाव डाल रही थी, लेकिन फिदा हुसैन को सरफराज से इतनी नफरत हो गई थी कि वह किसी भी कीमत पर उस से शहाना का निकाह करने को तैयार नहीं थे.

शहाना फिर से सरफराज की मोहब्बत में पागल हो गई थी. जब कोई उपाय नहीं सूझा तो अंत में फिदा हुसैन ने शब्बीर मास्टर से इस बारे में बात कर के सरफराज की शादी कहीं और करने की बात कही. शब्बीर मास्टर समझदार व्यक्ति थे. वह जानते थे कि समाज में इंसान की इज्जत की क्या कीमत होती है. यही सोच कर उन्होंने जल्दी ही सरफराज के लिए बिजनौर के स्योहारा कस्बे में एक लड़की देखी और उस का निकाह करा दिया.

सरफराज ने पिता के दबाव में शादी तो कर ली, लेकिन वह अपने दिल से शहाना को नहीं निकाल सका. लेकिन सरफराज के शादी करने की बात शहाना को बहुत बुरी लगी. उस ने उस से मिलनाजुलना बिलकुल बंद कर दिया. इस के बाद सरफराज भी अपनी गृहस्थी के चक्कर में फंस गया और कुछ दिनों के लिए शहाना को भूल गया. जवान बेटी के घर बैठने पर फिदा हुसैन भी चिंतित रहने लगे. उन्होंने अपनी पत्नी हुसना से कहा कि वह शहाना को दूसरे निकाह के लिए तैयार करे. शहाना सरफराज की मोहब्बत से टूट चुकी थी. वह यह भी जानती थी कि सारी जिंदगी मांबाप के सीने पर मूंग तो नहीं दली जा सकती.

उस ने अपने घर वालों की परेशानी समझ कर दूसरे निकाह के लिए हामी भर दी. शहाना के शादी के लिए तैयार होते ही उस के अब्बू फिदा हुसैन ने फिर से उस के लिए सही लड़का देखना शुरू कर दिया. उसी दौरान उन के एक करीबी रिश्तेदार ने जसपुर के ही मोहल्ले जटवारा के इमरान चौक में रहने वाले मोहम्मद असलम के बेटे नवाब के बारे बताया. नवाब का ट्रांसपोर्ट का अपना काम था. नवाब के कुल मिला कर 6 भाई और 4 बहनें थीं. भले ही मोहम्मद असलम का परिवार बड़ा था, लेकिन उस के सभी बेटे अपनेअपने काम से लगे हुए थे. शादी की बात पक्की होने के बाद 17 मई, 2000 को बड़ी धूमधाम के साथ नवाब और शहाना का निकाह हो गया.

शहाना नवाब के साथ निकाह कर के खुश थी. वह अपनी पुरानी जिंदगी भूल कर नई जिंदगी जीना चाहती थी. नवाब का अपना अच्छा कारोबार था. आमदनी भी अच्छी थी, इसलिए दोनों हंसीखुशी से रह रहे थे. शहाना परवीन लिखीपढ़ी थी, इसलिए उसे आंगनबाड़ी में सहायिका की नौकरी मिल गई. वह आसपास के बच्चों को पढ़ाने लगी. कहते हैं कि वक्त को बदलते देर नहीं लगती. शहाना के आंगनबाड़ी में लगते ही उस का फिर से घर से बाहर आनाजाना शुरू हो गया. उसी दौरान एक दिन उस का आमनासामना फिर से सरफराज से हो गया. सरफराज को सामने से आते देख शहाना ने उस से बचने की कोशिश की, लेकिन सरफराज उस का रास्ता रोक कर खड़ा हो गया.

उस दिन सरफराज ने उस से केवल हालचाल पूछा और वहां से चला गया. लेकिन इस छोटी सी मुलाकात ने शहाना के दिल में पुरानी मोहब्बत को चिंगारी दिखा दी. शहाना कई दिनों तक उस की यादों में जीती रही. उस ने कई बार उस मुलाकात को भूलने की कोशिश की, लेकिन भुला नहीं सकी. हालांकि शहाना और सरफराज दोनों ही एकएक बच्चे के मांबाप बन चुके थे, लेकिन उन के दिलों में पुरानी मोेहब्बत शायद अभी भी जिंदा थी. दोनों के दिलों में छिपी मोहब्बत फिर से जागी तो वे फिर चोरीछिपे मिलने लगे. आंगनबाड़ी के बहाने शहाना कई घंटों तक घर से बाहर रहती थी. उसी दौरान मौका निकाल कर वह सरफराज के साथ इधरउधर मौजमस्ती करने लगी.

उसी बीच शहाना दूसरी बच्ची की भी मां बन गई. लेकिन अब उस का सरफराज से मिलनाजुलना और भी ज्यादा हो गया था. शहाना नवाब का भी पूरा ख्याल रखती थी. इसलिए वह उस पर पूरा भरोसा करता था. लेकिन उसे पता नहीं था कि पत्नी उस की पीठ पीछे क्या गुल खिला रही है? शहाना अपने मकान की ऊपरी मंजिल पर अकेली ही रहती थी. उस का पति नवाब अपने काम से चला जाता और उस की दोनों बेटियां अभी छोटी थीं.

इसी का लाभ उठा कर वह हर वक्त सरफराज से मोबाइल पर बतियाती रहती थी. जब उस के मोबाइल में बैलेंस खत्म हो जाता तो सरफराज रिचार्ज करा देता. उसी दौरान सरफराज ने नवाब से भी दोस्ती बढ़ा ली, ताकि वह उस के घर बिना किसी झिझक के आजा सके. लेकिन नवाब उस के मंसूबों को समझ नहीं पाया. नवाब के भाई जसपुर में ट्रांसपोर्ट का धंधा चलाते थे. इस धंधे में अच्छी कमाई थी, इसलिए नवाब ने हरिद्वार के लक्सर में एक ट्रांसपोर्ट कंपनी खोल ली. धंधे की वजह से वह अकसर घर से बाहर रहता था. ट्रांसपोर्ट के काम के साथ नवाब ने प्रौपर्टी खरीदनेबेचने का काम भी शुरू कर दिया था. इसी का लाभ उठाते हुए सरफराज और शहाना मौजमस्ती कर रहे थे.

उसी दौरान सरफराज ने भी नवाब के सहयोग से लक्सर में एक ट्रांसपोर्ट कंपनी खोल ली. सरफराज ने कुछ दिनों में नवाब के साथ इतनी गहरी दोस्ती कर ली कि वह हर वक्त उस के लिए कुछ भी करने को तैयार रहता था. सरफराज कभीकभी नवाब के जिम्मे अपना औफिस छोड़ कर जसपुर आ जाता और शहाना के साथ मौजमस्ती करता. नवाब की हत्या से लगभग 5-6 महीने पहले सरफराज ने शहाना से कहा, ‘‘शहाना क्यों न हम आपस में शादी कर लें.’’

‘‘हम दोनों पहले से ही शादीशुदा हैं तो फिर यह आफत मोल लेने से क्या फायदा?’’ शहाना बोली, ‘‘सरफराज, तुम यह बात तो जानते ही हो कि नवाब के जीवित रहते मैं भला तुम्हारे साथ निकाह कैसे कर सकती हूं. यदि तुम यह चाहते हो तुम्हें कुछ करना पड़ेगा.’’

सरफराज अब शहाना के दिल की बात जान गया था. उस ने पक्का मन बना लिया कि शहाना को पाने के लिए वह कुछ भी करेगा. उधर शहाना भी सरफराज की मोहब्बत में पागल सी हो गई थी. वह यह भी भूल गई थी कि नवाब उसे कितना चाहता है. 2 बच्चों की मां होने के बावजूद उस की अच्छाबुरा सोचने की शक्ति पर पानी फिर गया था. इसी पागलपन में वह नवाब को अपने और सरफराज के बीच से हटाने के लिए भी राजी हो गई. अब से लगभग ढाई महीने पहले सरफराज का ड्राइवर मकसूद हादसे में घायल हो गया था. उसे इलाज के लिए काशीपुर के हमदम अस्पताल में भरती कराया गया था. यहीं पर सरफराज की मुलाकात खालिद व उस्मान से हुई. हालांकि खालिद और उस्मान दोनों अलगअलग अस्पतालों में काम करते थे, लेकिन दोनों में अच्छी दोस्ती थी.

खालिद उत्तर प्रदेश के रामपुर जिले के बैजनी गांव का था और उस्मान मुरादाबाद के रोशनपुर बहेड़ी गांव का था. खालिद ओटी टैक्नीशियन था तो उस्मान कंपाउंडर. उसी दौरान बातोंबातों में सरफराज ने उस्मान और खालिद के सामने जिक्र करते हुए पूछा कि कोई ऐसी भी दवा आती है, जिस के प्रयोग से इंसान खत्म हो जाए और किसी को पता भी न चले. इस पर खालिद ने बताया, ‘‘भाई काम सब हो जाते हैं, लेकिन उस के लिए कुछ खर्च करना पड़ता है. यह काम बहुत ही रिस्की होते हैं. आप को अगर किसी का काम कराना है तो पूरे एक लाख रुपए खर्च करने होंगे.’’

सरफराज के लिए एक लाख रुपए कोई मायने नहीं रखते थे. अपने प्यार को पाने के लिए वह कुछ भी खर्च करने को तैयार था. उस ने दोनों को 75 हजार रुपए दे कर नवाब की मौत का सौदा तय कर लिया. बाकी के 25 हजार रुपए उन्होंने काम हो जाने के बाद देने को कह दिया. बातचीत हो जाने के बाद सरफराज ने खालिद और उस्मान को प्रौपर्टी डीलर बताते हुए नवाब से उन की मुलाकात करा दी. उस ने नवाब से कह दिया कि यदि वह किसी प्रौपर्टी का सौदा इन से कराते हैं तो अच्छा कमीशन मिलेगा. नवाब खुश हो गया कि प्रौपर्टी बिकवाने पर उसे अतिरिक्त आमदनी होगी. नवाब शराब पीता ही था, इसलिए उस्मान और खालिद ने नवाब से दोस्ती गांठते हुए उसे शराब भी पिलानी शुरू कर दी.

8 दिसंबर, 2015 को योजना के अनुसार, सरफराज नवाब को साथ ले कर खालिद और उस्मान के पास काशीपुर पहुंचा. नवाब को उन दोनों के पास छोड़ कर वह खुद शहर में कुछ काम होने का बहाना कर के वहां से खिसक लिया. सरफराज के जाने के बाद उस्मान और खालिद ने नवाब को रामनगर रोड पर सड़क के किनारे ही शराब पिलाई. शराब पीने के बाद तीनों सनराइज अस्पताल पहुंचे. उस्मान उसी अस्पताल में कंपाउंडर था. उस ने अस्पताल के मालिक डा. सम्स से जसपुर जाने की बात कह कर उन की नैनो कार मांगी. डा. सम्स ने उसे अपनी कार दे दी. नवाब को उस कार में बिठा कर तीनों जसपुर की ओर चल दिए.

नवाब पर शराब का नशा चढ़ गया था. उसी का लाभ उठाते हुए दोनों ने उसे बेहोशी का इंजेक्शन लगा दिया. इंजेक्शन के लगते ही नवाब बेहोश हो कर सीट पर लुढ़क गया. इस के बाद शेर अली बाबा की मजार के पास कार रोक कर उन्होंने उसे ब्लड प्रेशर बढ़ाने वाला 10 एमएल का पूरा इंजेक्शन लगा दिया और फिर उसे चलती कार से सड़क पर फेंक दिया. बाद में उन्होंने उसी कार से उसे 2-3 बार बेरहमी से कुचल दिया, जिस के बाद नवाब की मौके पर ही मौत हो गई. सरफराज ने घटना वाले दिन ही उस्मान को शहाना का नंबर लिख कर दे दिया था, जो उन्होंने नवाब की जेब में रख दिया था. जिस से पुलिस उस के घर वालों तक आसानी से पहुंच सके. उसी के द्वारा पुलिस ने शहाना को फोन कर के दुर्घटना वाली बात बताई थी.

नवाब को मौत के घाट उतारने के बाद उस्मान और खालिद, दोनों ही काशीपुर वापस चले आए थे. इस घटना को अंजाम देने के बाद ही उस्मान ने मोबाइल से सरफराज को बता दिया था कि उस का काम हो गया है. इस घटना के बाद से खालिद और उस्मान के साथसाथ सरफराज ने भी अपना मोबाइल बंद कर लिया था. सरफराज ने नवाब को मारने की सूचना शहाना परवीन को भी दे दी थी. इस केस का खुलासा होते ही पुलिस ने भादंवि की धारा 302/120 के तहत मुकदमा दर्ज कर अभियुक्तों को कोर्ट में पेश करने के बाद जेल भेज दिया.

एसएसपी केवल खुराना ने इस हत्याकांड का खुलासा करने वाली टीम को 2,500 रुपए का इनाम देने की घोषणा की थी. वहीं मृतक के घर वालों ने भी पुलिस को 5 हजार रुपए बतौर इनाम दिए. True Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

True Crime Story: दगाबाज महबूबा

True Crime Story: औरत अगर चरित्रहीन हो तो   बसेबसाए घर उजड़ जाते हैं. एक नहीं, कई जिंदगियां बरबाद हो जाती हैं. ऐसे में औरत तो परेशान होती ही है, ससुराल के ही नहीं,  मायके वाले भी दुखी होते हैं. मुराद अली से मेरी अच्छी दोस्ती थी. उस दिन वह अपने साथ अपने दोस्त नादिर अली को ले कर मेरे पास आया था. वह बड़ा परेशान था. मेरे पूछने

पर मुराद अली ने बताया, ‘‘वाकया नादिर अली के बड़े भाई कादिर अली के साथ हुआ है. इन दोनों भाइयों की खालिद रोड पर साझे में टायरों की काफी बड़ी दुकान है. कल कादिर अली को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है.’’

‘‘किस जुर्म में गिरफ्तार किया है?’’ मैं ने पूछा तो वह बोले, ‘‘उन्हें उन की एक्स वाइफ के कत्ल के इलजाम में गिरफ्तार किया गया है. फिलहाल वह रिमांड पर पुलिस कस्टडी में हैं.’’

‘‘कादिर अली की एक्स वाइफ के बारे में कुछ बताइए?’’ मैं ने नादिर अली से पूछा.

‘‘उस का नाम लुबना था. उस औरत ने भाईसाहब को जिंदगी भर दुख दिए और मरने के बाद भी उन्हें मुसीबत में डाल गई. तलाक भी एक तरह से उस ने जबरदस्ती लिया. उस ने एक ऐसा नाटक खेला था कि भाई को मजबूरन उसे तलाक देना पड़ा. बाद में तलाक को कानूनी हैसियत भी मिल गई. यह सब एक सोचीसमझी साजिश के तहत हुआ था. बेहद मक्कार और शातिर औरत थी वह.’’ नादिर अली ने नफरत से कहा.

‘‘तलाक वाली बात कितना अरसा पहले की है?’’

‘‘यह मई चल रहा है, तलाक जनवरी में हुआ था. भाई अच्छेखासे अपनी बेटी आरिफा के साथ रह रहे थे कि यह आफत गले पड़ गई.’’

‘‘आरिफा अपनी मरजी से बाप के साथ रह रही थी?’’

‘‘हां, उन की बेटी आरिफा 15 साल की है, वह बेटी की वजह से मजबूर थे. इसलिए अपनी बीवी लुबना की आवारगी और ज्यादती को जहर की तरह गले उतारते रहे. लेकिन जब लुबना ने सारी हदें पार कर दीं, वह भी सिर्फ भाई से जान छुड़ाने के लिए तो उन्होंने भी देर नहीं की और उस शातिर औरत को अपनी जिंदगी से बाहर का रास्ता दिखा दिया. उन की बेटी आरिफा काफी समझदार है, वह मां की चालों और चरित्रहीनता को समझ गई थी. इसलिए उस ने खुद बाप के साथ रहने का फैसला किया था.’’

मुराद अली ने थोड़ा रुक कर कहा, ‘‘वकील साहब, तलाक वाली रात उन के घर में जिस तरह का तमाशा हुआ था, उस ने आरिफा को पूरी तरह मां के खिलाफ कर दिया था. उस ने बड़े सही वक्त पर सही फैसला लिया था.’’

‘‘तलाक का मंसूबा और तलाक वाली रात हुए ड्रामे की बात मैं कुछ समझ नहीं पाया. यह एक नहीं, दो बातें हैं?’’ मैं ने पूछा तो नादिर अली ने हिचकिचाते हुए कहा, ‘‘बताने में शरम आ रही है, पर आप भाई का केस लड़ रहे हैं, इसलिए बताना जरूरी है. ज्यादा डिटेल तो मैं नहीं जानता, पर मुझे जो पता है, बताए देता हूं.’’

उस ने बताया, ‘‘लुबना काफी दिनों से इस कोशिश में थी कि भाई उसे छोड़ दें, ताकि वह मनमाने ढंग से अय्याशी कर सके, पर भाईजी उस की हर ज्यादती सहते रहे. यह देख कर वह नीचता पर उतर आई और उस ने भाई के लिए एक जाल बुना. वह अपनी इंसानी कमजोरी के चलते उस में फंस गए और फिर उन के पास तलाक के सिवा कोई रास्ता नहीं बचा.’’

‘‘जब कोई औरत छुटकारा पाने के लिए साजिश रचती है तो उस के पीछे कोई न कोई मकसद तो होना चाहिए. उस का क्या मकसद था?’’ मैं ने पूछा तो वह उत्तेजित हो कर बोले, ‘‘मकसद था जनाब, बड़ा बेशरमी भरा मकसद था. वह मेरे भाई की बीवी होने के बावजूद एक गैर इंसान से ताल्लुक बनाए हुए थी. उस से शादी करना चाहती थी. उस मरदूर का नाम जमाल बेरी है.

‘‘भाई को जब इस बात का पता चला तो उन्हें बहुत गुस्सा आया. उन्होंने उसे रोकने की कोशिश की तो वह नएनए हथकंडे अपनाने लगी, ताकि भाई तंग आ कर उसे छोड़ दें. जब पानी सिर से गुजर गया तो मजबूरन उन्हें लुबना को तलाक देना पड़ा. तलाक पाने के लिए उस ने घर की मुलजिमा रशना का इस्तेमाल किया था.’’

‘‘यानी लुबना ने भाई से तलाक ले कर जमाल से शादी कर ली. इस तरह उस का मकसद पूरा हो गया?’’

‘‘नहीं, पिछले दिनों उन की मंगनी की खबर सुनी थी, अगर वह जिंदा रहती तो शादी भी हो जाती.’’ नादिर अली ने कहा.

कुछ और बातें पता कर के मै ंने फीस ली और उन्हें तसल्ली दे कर विदा कर दिया. पुलिस ने मुलजिम कादिर अली को अदालत में पेश कर के 7 दिनों का रिमांड लिया था. शाम को मैं थाने पहुंच गया. कादिर अली को देख कर मैं चौंका, क्योंकि उस का चेहरामोहरा नािदर अली से काफी मिलता था, उम्र में वह जरूर 2-4 साल बड़ा रहा होगा. वह उदास और परेशान था. यह जान कर कि मैं उन का वकील हूं, उन्होंने कहा, ‘‘बेग साहब, मैं बैठेबिठाए इस मुसीबत में फंस गया हूं, मेरा कहीं कोई कसूर नहीं है.’’

‘‘आप को पूरा यकीन है कि आप पूरी तरह निर्दोष हैं?’’

‘‘जी हां, वकील साहब, मुझे जानबूझ कर फंसाया गया है, मैं बेकसूर हूं.’’

‘‘अगर आप बेकसूर है तो आप जरूर इस केस से बाइज्जत बरी हो जाएंगे, यकीन रखिए. अगले 20 मिनट तक मैं उन से केस से संबंधित सवालजवाब करता रहा. उन्होंने मुझे कई सनसनीखेज बातें बताईं. वकालतनामे पर साइन ले कर मैं ने उन्हें सारी बातें समझा दीं कि वह पुलिस वालों की कोई पेशकश कबूल न करें और न ही उन की कोई मांग मानें. बस मजबूती से अपने बयान पर टिके रहें.’’

रिमांड खत्म होने के बाद पुलिस ने अदालत में चालान पेश कर दिया. इसी पेशी पर मैं ने अपने वकालतनामे के साथ मुलजिम की जमानत की अरजी पेश कर दी, ‘‘जनाबेआला, मेरा मुवक्किल एक बाइज्जत शहरी है. उस का रिकौर्ड बिलकुल साफ है. उसे इस केस में जबरन फंसाया गया है. उस की जमानत की अरजी मंजूर की जाए.’’

इस्तेगासा के वकील ने कहा, ‘‘वारदात के वक्त मुलजिम को मकतूल के फ्लैट में जाते और आते देखा गया था. इस का एक गवाह भी मौजूद है. साथ ही मौकाएवारदात पर मुलजिम की मौजूदगी के निशान भी पाए गए हैं. जबकि कुछ अरसा पहले मुलजिम के मकतूल के ताल्लुकात खतम हो चुके थे?’’

इसी तरह बहस चलती रही. कत्ल के मुलजिम को जमानत वैसे भी मुश्किल से मिलती है, इसलिए बहुत जोर देने पर भी कादिर अली की जमानत नहीं हो सकी. अदालत ने 15 दिनों बाद की तारीख दे कर मुलजिम को जेल भेज दिया. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, लुबना की मौत 9 मई की रात 8 से 9 बजे के बीच हुई थी. एक तेजधार वाला खंजर उस के सीने में उतार दिया गया था. मौत की वजह वही खंजर था. जब उस पर हमला किया गया था, वह नशे में थी. मारने से पहले उसे कोई ऐसी नशीली दवा दी गई थी, जिस से नींद आती है. मेरे पास 15 दिनों का समय था. मैं ने दौड़भाग कर के सार सबूत जुटा लिए, जो आप को अदालती काररवाही के दौरान पता चलेंगे.

अगली पेशी पर अदालत की काररवाही शुरू हुई तो जज ने जुर्म पढ़ कर सुनाया. मेरे मुवक्किल ने कत्ल के जुर्म से साफ इनकार कर दिया. इस के बाद मुलजिम का बयान दर्ज किया गया. वकील ने जिरह शुरू की, ‘‘मकतूल, जो पहले तुम्हारी बीवी थी और तुम्हारे व्यवहार से बहुत परेशान थी?’’

वह कुछ और पूछता मेरे मुवक्किल ने कहा, ‘‘वह मेरी बीवी जरूर थी, लेकिन मेरे व्यवहार से बिलकुल परेशान नहीं थी.’’

‘‘उस ने तुम से परेशान हो कर ही सहारा ढूंढ़ कर तलाक लिया था?’’

‘‘उस ने मुझ से तलाक जरूर लिया था, पर व्यवहार मेरा नहीं, उस का खराब था. वह मुझ से ठीक से बात तक नहीं करती थी, मेरे जज्बातों और मेरी जरूरतों की उसे जरा भी परवाह नहीं थी. जवान बेटी के सामने मैं उसे कुछ कह भी नहीं सकता था, इसलिए उस की हर ज्यादती चुपचाप बरदाश्त करता रहा. लेकिन जब पानी सिर के ऊपर से गुजर गया तो मुझे अपना रास्ता अलग करना पड़ा. जब तक वह मेरी बीवी थी, मैं ने उस पर अंधा यकीन किया. मैं जमाल को उस का बौस समझता रहा. मुझे तो बाद में पता चला कि उस का जमाल से अफेयर चल रहा था और वह उस से शादी करना चाहती थी.’’

वकील इस्तेगासा ने जख्मों पर नमक छिड़कते हुए कहा, ‘‘इस का मतलब यह सच है कि तुम्हारी बीवी का जमाल से इश्क चल रहा था और वह जल्दी ही उस से शादी करना चाहती थी. उन की मंगनी भी हो गई थी. उस की मौत से तो तुम्हें खुशी हुई होगी?’’

‘‘इस में खुश होने की क्या बात है? जो औरतें अपना घर उजाड़ कर गलत राह पर चलती हैं, उन का यही अंजाम होता है. मुझे बिलकुल नहीं पता कि उस का किस ने, क्यों और कैसे कत्ल किया?’’

‘‘क्या तुम 9 मई यानी कत्ल वाली रात मकतूल के फ्लैट पर उस से मिलने नहीं गए थे?’’

‘‘रात को नहीं, शाम 7 बजे 5 मिनट के लिए मैं उस के फ्लैट पर उस की अमानत लौटाने गया था. वह अमानत क्या थी, यह मैं बताना नहीं चाहता.’’

इस्तेगासा वकील ने 2-4 सवाल और पूछ कर अपनी जिरह खत्म कर दी.

अब मेरी बारी थी. मुझे इस तरह से सवाल करने थे कि कादिर अली की बेगुनाही साबित हो जाए. मैं ने पूछा, ‘‘आप की शादी को कितना अरसा हुआ होगा, क्या आप दोनों में शुरू से ही अनबन थी?’’

‘‘मेरी शादी को 16 साल हो गए हैं. शुरू में तो सब ठीक रहा. इधर 2, ढाई साल से लुबना के व्यवहार में बदलाव आना शुरू हुआ था. वह मुझ से दूर रहने लगी थी और ज्यादा से ज्यादा समय घर से बाहर गुजारने लगी थी. उस ने मेकअप आर्टिस्ट की हैसियत से एक आर्ट एकेडमी जौइन कर ली.’’

‘‘कैसी आर्ट एकेडमी, क्या इस में आप की मरजी शामिल थी?’’

‘‘वह आर्ट एकेडमी ऐक्टिंग, मौडलिंग, संगीत आदि की ट्रेनिंग दे कर शौकीन लोगों को अदाकार बनाती है. उस का नाम है परफौरमैंस. लुबना ‘परफौरमैंस’ में मेकअप आर्टिस्ट के रूप में काम करने लगी थी. जबकि यह मुझे बिलकुल पसंद नहीं था. पर उस की लगातार जिद के आगे मैं मजबूर था.

इस की वजह यह थी कि मै ंने सुन रखा था कि ऐसी जगहों पर बहुत ज्यादा आजादी और बेशरमी होती है, वहां सारे गलत काम होते हैं. काश मैं ने इजाजत न दी होती.’’

‘‘क्या यह वही एकेडमी है, जिस का मालिक जमाल बेरी है?’’

‘‘जी हां, परफौरमैंस का मालिक जमाल ही है.’’

‘‘इस का मतलब यह हुआ कि लुबना का अफेयर अपने बौस से चल रहा था और आप से तलाक के बाद उस ने उस से मंगनी कर ली थी.’’

‘‘जी हां, परफौरमैंस की नौकरी के बाद ही लुबना बदल गई और मेरी जिंदगी में यह तबाही आई.’’

‘‘दोनों शादी करते, उस के पहले ही लुबना का कत्ल हो गया. अब मैं कुछ निजी सवाल पूछना चाहता हूं, जो बहुत जरूरी हैं, आप उन पर माइंड मत कीजिएगा. मकतूल और जमाल के अफेयर के बारे में आप को पता था?’’

‘‘नहीं, यह मुझे बहुत बाद में तब पता चला कि जब वह तलाक के लिए ड्रामा करने लगी यह सारी चाल जमाल के लिए चली गई थी.’’

‘‘क्या लुबना रात को देर से घर आती थी?’’

‘‘वह अकसर एकेडमी से रात को घर आती थी. मैं ने बहुत समझाया, लेकिन उस पर कोई असर नहीं हुआ. मैं ने उसे एकेडमी छोड़ने को कहा तो उस ने साफ मना कर दिया. इधर वह मेरी कोई बात नहीं मानती थी.’’

‘‘इस का मतलब मकतूल आप को शौहर नहीं मानती थी? आप ने उसे सख्ती से नहीं रोका?’’

‘‘कैसे रोकता? उस ने मुझे धमकी दी कि अगर ज्यादा रोकटोक की तो वह आर्ट एकेडमी में ही रहने लगेगी. उस समय मेरी बेटी भी मां की हमदर्द थी.’’

‘‘क्या आप अपनी बीवी की धमकी से डर गए थे?’’

‘‘जी, मैं शरीफ आदमी हूं. ऐसे हथकंडों से डर गया था. वैसे भी हम अजनबियों की तरह एक छत के नीचे रह रहे थे.’’

‘‘क्या आप दोनों के बीच मियांबीवी वाला रिश्ता नहीं रह गया था? जहां तक मुझे जानकारी है कि आप दोनों के बैडरूम अलगअलग थे?’’

‘‘आप ठीक कह रहे हैं. हमारे बीच मियांबीवी वाला रिश्ता खत्म हो चुका था. 2, ढाई साल से हमारे बैडरूम भी अलगअलग थे. लुबना मुझे शौहर नहीं मानती थी. मैं ने कभी उस के करीब जाना चाहा तो उस ने बेरुखी से झिड़क दिया. अब उसे मेरी निकटता की कोई जरूरत नहीं रह गई थी. हमारे बीच प्यारमोहब्बत का कोई रिश्ता नहीं बचा था. उस ने साफ कह दिया था कि वह मुझ से नफरत करती है. गुस्सा तो मुझे बहुत आता था, लेकिन बेटी की वजह से मैं खामोश रहता था. मैं उसे तलाक दे कर आजाद नहीं छोड़ना चाहता था.’’

‘‘फिर ऐसा क्य हुआ कि आप ने उसे तलाक दे दिया?’’

‘‘लुबना ने परफौरमैंस एकेडमी में स्टार बनने आई एक लड़की रशना को हमारे घर में केयरटेकर के रूप में रखवा दिया. रशना काफी खूबसूरत और जवान थी. पर वह उन लोगों में से थी, जो अपनी मंजिल पाने के लिए कुछ भी कर सकते हैं.

‘‘लुबना ने शायद उस से कहा था कि अगर वह कुछ दिनों तक उस के घर पर काम करेगी तो वह उसे स्टार बना देगी. यह मुझे बाद में पता चला कि लुबना उसे अपना ‘खास मकसद’ पूरा करने के लिए योजना बना कर हमारे घर लाई थी.

‘‘यह सब मुझे पता नहीं था. मैं तो उसे केयरटेकर ही समझता रहा. खैर मैं उसे रखने के सख्त खिलाफ था, लेकिन लुबना का कहना था कि वह एकेडमी में बहुत मसरूफ रहती है, इसलिए घर की देखभाल के लिए किसी का होना जरूरी है. उस ने जिद कर के रशना को रखवाया था.’’

मैं ने देखा, जज बड़ी दिलचस्पी से कादिर अली की बरबादी की दास्तान सुन रहे थे. इस्तेगासा वकील भी औब्जेक्शन कहना भूल सा गया था. अदालत में भी खामेशी और उत्सुकता थी.

कादिर अली ने बात आगे बढ़ाई, ‘‘रशना 25 साल की खूबसूरत व स्मार्ट लड़की थी, वह कपड़े भी स्टाइल वाले पहनती थी. लुबना ने उसे मेकअप करने में भी एक्सपर्ट कर दिया था. वह लुबना द्वारा तैयार की गई स्क्रिप्ट के अनुसार कदमदरकदम बढ़ रही थी. उसे आए महीना भी नहीं गुजरा था कि एक दिन वह अपने मकसद में कामयाब हो गई.

‘‘लुबना ने जानबूझ कर आरिफा को अपनी बहन के घर भेज दिया था. उस रात मैं और रशना घर में अकेले थे. लुबना एकेडमी से लौटी नहीं थी. रशना ने आकर्षित करने वाला खुला लिबास पहना था और जानबूझ कर वह बारबार मेरे करीब आने की कोशिश कर रही थी. मैं भी इंसान हूं, कोई फरिश्ता नहीं. बीवी के साथ को तरसा हुआ था. जब एक भूखे इंसान के सामने सजीसजाई थाली रख दी जाए तो वह कहां तक खुद को रोकेगा? उसे लालच आ ही जाएगा.’’

‘‘आप सही कह रहे हैं, एक तो आप अपनी बीवी की बेरुखी के सताए थे, दूसरी तरफ प्यार भरे इसरार पर आप का फिसलना कुदरती था.’’ मैं ने उसे स्पोर्ट किया.

‘‘लुबना ने मुझे बदनाम व रुसवा करने का पूरा मंसूबा बना लिया था. वह हम दोनों को रंगेहाथों पकड़ना चाहती थी. संयोग था कि मैं उस दलदल में फंसने से बच गया. वह मेरे एकदम करीब आ गई थी, लेकिन अचानक मेरा जमीर जाग उठा, मैं ने जैसे ही झटके से उस से अलग हुआ, उसी समय लुबना चुपके से आ कर चीखनेचिल्लाने लगी.

‘‘हम दोनों बुरी तरह से बौखला उठे. बाद में पता चला कि रशना का बौखलाना भी ऐक्टिंग था. वह लुबना के पास जा कर कहने लगी, ‘‘साहब मुझ से जबरदस्ती कर रहे थे. सही वक्त पर आ कर आप ने मुझे बचा लिया?’’

लुबना ने फटाफट फोन कर के 6-7 लोगों को बुला लिया. आने वालों में उस की बहनें, आरिफा, एकेडमी का उस का असिस्टैंट उबेद जामी और रशना का बूढ़ा शराबी बाप भी शामिल था. लुबना चीखचीख कर कह रही थी, ‘‘मैं ऐसे चरित्रहीन आदमी के साथ कतई नहीं रह सकती. मुझे अभी तलाक चाहिए.’’

‘‘उस के साथ अन्य लोग भी मुझे ही बुराभला कहने लगे. मैं लुबना के खेल को समझ गया था, इसलिए मैं ने उसे उसी समय तलाक दे दिया. मेरी बेटी आरिफा भी मां की चाल समझ गई थी, क्योंकि रशना को उस ने जिद कर के घर में रखवाया था, इसलिए आरिफा ने भी मेरे साथ रहने का फैसला किया.’’

‘‘तो यह है आप की दुखभरी कहानी, जिस ने आप की जिंदगी बरबाद कर दी. लुबना को आप ने तलाक दे दिया, आरिफा आप के साथ रहने लगी, लेकिन रशना का क्या हुआ?’’ मैं ने पूछा.

‘‘मैं ने उसे उसी समय घर से निकाल दिया. अब वह कहां है, मुझे मालूम नहीं.’’

मेरे सवालों से सारा मामला अदालत के सामने आ गया था. रशना के उस शर्मनाक ड्रामे में जमाल और लुबना की मिलीभगत थी, जिस की स्क्रिप्ट जमाल ने लिखी थी और डायरेक्शन लुबना का था.

मैं ने जिरह आगे बढ़ाई, ‘‘कादिर अली साहब, आप ने जनवरी में लुबना को तलाक दिया, उस के एक, डेढ़ महीने बाद ही उस ने मंगनी कर ली. मई में उस का कत्ल हो गया. इस से एक बात यह सामने आती है कि कोई ऐसा था, जो लुबना और जमाल की शादी से खुश नहीं था या वह खुद लुबना में रुचि ले रहा था. मंगनी के बाद उस ने नाराज हो कर उस का कत्ल कर दिया. यह सब तलाश करना पुलिस और अदालत का काम है.

‘‘आप ने इस्तेगासा की जिरह में बताया था कि आप कत्ल की शाम लुबना को उस की अमानत लौटाने गए थे. क्या आप उस के फ्लैट पर गए थे, जहां वह आप से अलग होने के बाद रह रही थी? वह फ्लैट जमाल बेरी का है, जहां वह अकसर लुबना से मिलने आया करता था. आप मुझे यह बताइए कि आप उस की कौन सी अमानत लौटाने गए थे?’’

‘‘वकील साहब, आप पूछ रहे हैं तो मुझे बताना ही पड़ेगा. एक दिन मैं सफाई कर रहा था तो मुझे मेज की दराज से एक ब्राउन रंग का लिफाफा मिला, जिस में लुबना के कुछ कागजात थे. साथ ही 20 हजार रुपए का एक क्रौस किया चेक था, जो मैं ने ही लुबना को एक बार दिया था. मै ंने यह बात आरिफा को बताई तो उस ने कहा कि वह ब्राउन लिफाफा चेक समेत लुबना तक पहुंचा देना चाहिए. इसलिए मैं उस शाम आरिफा और उस की दोस्त सबा के साथ लुबना के फ्लैट पर गया और उसे लिफाफा दे कर 5 मिनट में लौट आया.’’

‘‘क्या आरिफा और उस की दोस्त भी तुम्हारे साथ लुबना के फ्लैट पर गई थीं?’’

‘‘नहीं, आरिफा और उस की दोस्त नीचे गाड़ी में बैठी थीं. मैं नहीं चाहता था कि मांबेटी का सामना हो, इसलिए मैं उसे साथ नहीं ले गया था.’’

‘‘क्या आप वहां से सीधे घर आ गए थे?’’

‘‘नहीं, दरअसल उस दिन रौयल होटल में पैंटिंग्स की नुमाइश लगी थी. मेरी बेटी आरिफा और उस की दोस्त सबा फाइन आर्ट की उस एग्जीविशन को देखना चाहती थीं, जिस का टाइम 7 से 10 बजे तक था.

चूंकि समय हो चुका था, इसलिए मैं फटाफट लुबना को लिफाफा दे कर नीचे आ गया और आरिफा तथा सबा को ले कर रौयल होटल चला गया. 7 बज कर 20 मिनट पर मैं होटल पहुंच गया था.’’

‘‘नुमाइश का समय 7 बजे से 10 बजे तक था. आप उन दोनों को छोड़ कर वापस आ गए होंगे?’’

‘‘नहीं साहब, उन की जिद पर मुझे भी उन के साथ पैंटिंग्स की एग्जीविशन देखनी पड़ी थी?’’

‘‘इस का मतलब आप वारदात के दिन शाम सवा सात बजे से 10 बजे तक रौयल होटल में नुमाइश देख रहे थे?’’

‘‘जी जनाब, उस दिन 7 बज कर 20 मिनट से रात 10 बजे तक मैं नुमाइश देखता रहा.’’

इस का मतलब उस दिन आप लुबना के फ्लैट से काफी दूर होटल रौयल में नुमाइश में थे?

‘‘जी जनाब.’’

इस के बाद मैं ने जिरह खत्म कर दी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, लुबना का कत्ल 9 मई को रात 8 से 9 बजे के बीच हुआ था. जबकि उस वक्त मेरा क्लाइंट घटनास्थल से काफी दूर होटल रौयल में था. इसलिए वह कत्ल नहीं कर सकता था. एक हिसाब से केस यहीं खत्म हो जाना चाहिए था, पर अभी कई सवाल बाकी थे. इस्तेगासा का पहला गवाह अमजद था. उस की फ्लैट के सामने दरजी की दुकान थी. उस ने अपने बयान में कहा कि उस ने मुलजिम को मकतूल के फ्लैट में जाते और निकलते देखा था. 1-2 सवाल पूछ कर इस्तेगासा वकील ने अपनी जिरह खत्म कर दी.

अपनी बारी पर मैं ने उस से पूछा, ‘‘आप की दुकान मकतूल के फ्लैट के काफी करीब है, जैसा आप ने कहा है. क्या आप मकतूल और उस के मुलाकातियों को जानते थे?’’

‘‘मकतूल 3-4 महीने पहले ही वहां रहने आई थी. 1-2 बार वह मेरी दुकान पर भी आई थी. उन के मुलाकातियों में जमाल साहब को ही मैं ने देखा था.’’

‘‘क्या आप जमाल को जानते हैं?’’

‘‘जी, क्योंकि उस फ्लैट के मालिक वही हैं.’’

‘‘वारदात के दिन छुट्टी थी. सभी दुकानें बंद थी, फिर आप की दुकान कैसे खुली थी?’’

‘‘मुझे इमरजेंसी में शादी के कपड़े देने थे.’’

‘‘आप ने मुलजिम को बिल्डिंग में जाते देखा था, पर यह कैसे कह सकते हैं कि वह मकतूल के फ्लैट में ही गया था? क्या आप ने उस का पीछा किया था?’’

‘‘नहीं, मैं ने पीछा नहीं किया था. सभी कह रहे हैं कि वह मकतूल के फ्लैट में गया था, इसलिए मैं भी कह रहा हूं.’’

‘‘मैं सब की बात नहीं, आप की बात कर रहा हूं. आप को कैसे पता चला कि वह मकतूल के फ्लैट गया था?’’

‘‘मुझे यह बात जमाल बेरी साहब ने बताई थी कि मुलजिम का नाम कादिर अली है और वह मकतूल से मिलने उस के फ्लैट पर आया था.’’

‘‘यह बात जमाल ने आप को कब बताई थी?’’

‘‘वारदात वाले दिन रात साढ़े 10 बजे. वह आए और फ्लैट में गए. घबरा कर वापस आए और मुझे बताया कि लुबना को किसी ने खंजर घोंप कर मार दिया है. इस के बाद कादिर अली का हुलिया और गाड़ी की पहचान बता कर पूछा कि इस तरह का कोई आदमी तो नहीं आया था? मैं ने ‘हां’ कहा तो उन्होंने कहा कि उसी कादिर अली ने लुबना का कत्ल कर दिया है.’’

उस ने इस बात को माना कि जमाल ने उसे तफ्सील से बताया तो उस ने ‘हां’ कहा था. अगली पेशी पर मामले की जांच करने वाला अफसर फजल शाह था. मैं ने पूछा, ‘‘आप को वारदात की खबर कब और किस ने दी थी?’’

‘‘मुझे जमाल बेरी ने रात 11 बजे वारदात की खबर दी थी. इस के बाद मैं करीब पौने 12 बजे मकतूल के फ्लैट पर पहुंचा था.’’

‘‘उस समय जमाल वेरी फ्लैट पर मौजूद था?’’

‘‘जी हां, जमाल वहां मौजूद था और उस ने टेलर अमजद को भी रोक रखा था.’’

‘‘क्या यह सच है कि जमाल ने ही आप से कहा था कि कादिर अली ने ही यह हत्या की है?’’

‘‘जी हां, जमाल ने ही कादिर अली की तरफ इशारा किया था. फिर मैं ने अमजद का बयान लिया. उस ने भी कहा कि कादिर अली को मकतूल के फ्लैट में जाते उस ने देखा था. टाइम का सही अंदाजा उसे नहीं था.’’

‘‘क्या आप यह बताना चाहेंगे कि जमाल बेरी ने यह कैसे तय कर लिया कि कत्ल कादिर अली ने ही किया था, क्या उस के पास कोई ठोस सबूत था?’’

‘‘जी हां, मकतूल के पास एक ब्राउन लिफाफा रखा मिला था, जिस में कादिर अली का दिया 20 हजार का चेक था.’’

‘‘यह वही लिफाफा तो नहीं, जिस की जिक्र मेरी जिरह में आ गया है?’’

‘‘जी हां, वह वही लिफाफा था.’’

‘‘जब आप वहां पहुंचे तो आप ने क्या देखा?’’

‘‘मकतूल बिस्तर पर मरी पड़ी थी. उस के सीने में खंजर घोंपा हुआ था. लगता था, उस ने बचने के लिए कोई संघर्ष नहीं किया था. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार उस ने नशे की कोई दवा ली थी. सब चीजें अपनी जगह पर सुरक्षित थीं.’’

‘‘खंजर पर फिंगरप्रिंट मिले थे?’’

‘‘नहीं, मुलजिम ने चालाकी से प्रिंट साफ कर दिए थे.’’

‘‘कमरे के किसी हिस्से में भी मुलजिम के फिंगरप्रिंट नहीं मिले?’’

‘‘जी नहीं, कमरे में कहीं अंगुलियों के निशान नहीं मिले.’’

‘‘क्या कमाल की बात है. मुलजिम के पास इतना समय था कि अंगुलियों के निशान साफ कर वह समय पर रौयल होटल भी पहुंच गया.’’

‘‘हो सकता है, आप का क्लाइंट झूठ बोल रहा हो? वह वहां ज्यादा देर रुका हो.’’

‘‘एक बात सोच कर बताइए, आप के सामने मुलजिम ने दुखभरी कहानी सुना दी, सारे हालात बता दिए कि किस वजह से किस परिस्थिति में तलाक हुआ. क्या इस सब के बाद भी आप यह उम्मीद करते हैं कि मकतूल फ्लैट का दरवाजा खोल कर मुलजिम को अपने बैडरूम में ले जाएगी. जिस से वह सख्त नफरत करती थी, कभी नहीं ले जाएगी न? इस का मतलब साफ है कि जिस ने मकतूल का कत्ल किया है, वह उस का भरोसे का आदमी था. वह उसे तनहाई में अपने बैडरूम में ले गई. मेरा मुवक्किल वह आदमी नहीं हो सकता. आप क्या कहते हैं?’’

‘‘तो फिर ऐसा शख्स कौन हो सकता है?’’

‘‘यह पता लगाना आप का काम है, मेरा काम खत्म हुआ.’’

अगली पेशी पर विटनेस बौक्स में मकतूल का मंगेतर आर्ट एकेडमी का मालिक जमाल बेरी था.

इस्तगासा वकील की जिरह में कोई खास बात निकल कर सामने नहीं आई. जमाल बेरी ने जो बातें अपने बयान में कही थीं, वही रिपीट हुईं. उस के बाद मैं ने जिरह शुरू की. पहले मैं ने उस की मंगेतर की मौत पर दुख का इजहार किया. उस के बाद पूछा, ‘‘आप ने परफौरमैंस एकेडमी खोलने से पहले इस का कोई कोर्स किया था?’’

‘‘मैं ने कोई कोर्स तो नहीं किया, पर मैं स्टेज करता था और इस का तजुर्बा रखता हूं.’’

‘‘यानी आप के पास अच्छी तालीम है, क्या आप दीन, खुदा और रसूल पर भी यकीन रखते हैं?’’

‘‘हां खुदा रसूल पर पूरा यकीन रखता हूं.’’

‘‘इस के बावजूद आप ने मुलजिम की अच्छीभली शादीशुदा जिंदगी में दरार पैदा कर दी और उस की बीवी से ऐसी मोहब्बत बढ़ाई कि उन के बीच लड़ाईझगड़े करवा कर रशना वाली साजिश रच कर लुबना का तलाक करवा दिया. यही नहीं, एक बेगुनाह इंसान पर झूठे इलजाम लगवा दिए. ये बातें खुदा को सख्त नापसंद है. आप ने किसी का घर उजाड़ कर गुनाह नहीं किया?’’

‘‘मैं क्या कर सकता था. लुबना मुझ से बहुत ज्यादा मोहब्बत करती थी. मैं भी उसे चाहने लगा था. मोहब्बत में अंधे हो कर यह सब होता गया. वह मुझ से जल्द शादी करना चाहती थी और मकतूल की मुजरिम से जान छुड़ाने के लिए यह सब करना जरूरी था.’’

परेशानी और शर्मिंदगी उस के चेहरे पर साफ झलक रही थी. वह काफी स्मार्ट और शानदार पर्सनाल्टी का मालिक था. मैं ने जिरह आगे बढ़ाई, ‘‘जमाल साहब, वारदात के दिन आप मकतूल के पास कब पहुंचे थे?’’

‘‘रात के करीब साढ़े 10 बजे मैं वहां पहुंचा था.’’

‘‘जब आप मकतूल के फ्लैट पर पहुंचे तो क्या हुआ था, क्या आप ने डोरबैल बजाई थी?’’

‘‘मैं ने डोरबैल बजाई, पर कोई नतीजा नहीं निकला. उस के बाद मैं ने हैंडल घुमाया तो दरवाजा खुल गया.’’

‘‘आप ने अंदर दाखिल हो कर आवाज दी होगी, जवाब न मिलने पर आप परेशान हो कर बैडरूम में गए होंगे, जहां वह अपने बैड पर मरी पड़ी थी, ऐसा ही हुआ था न?’’

‘‘जी हां, ऐसा ही हुआ था.’’

‘‘जब आप वहां पहुंचे थे तो आप की मंगेतर को मरे डेढ़, 2 घंटे हो चुके थे. इस का मतलब साफ है कि आप कातिल नहीं हैं? अब मैं मुलजिम की बेगुनाही की तरफ आता हूं. वारदात वाले दिन शाम 7 बजे मुलजिम मकतूल के फ्लैट पर ब्राउन लिफाफा देने गया था, जिस में एक चैक भी था. यह ब्राउन लिफाफा वही है, जिस की वजह से मुलाजिम पर कातिल होने का शक किया जा रहा है? आप ने टेलर अमजद से पूछताछ की और पुलिस के आने पर आप ने कादिर अली को कातिल की तरह पेश कर दिया. मैं गलत तो नहीं कह रहा?’’

‘‘नहीं, आप ठीक कह रहे हैं, हालात ऐसे ही पेश आए थे. मुझे यही लगा था.’’

‘‘आप एक आर्ट एकेडमी चला रहे हैं तो आप को रौयल होटल में होने वाली आर्ट एग्जीबिशन के बारे में पता ही रहा होगा?’’

‘‘जी हां, मुझे इन्वीटेशन भी मिला था, पर मेरा डिनर मकतूल के साथ तय था, इसलिए मैं वहां नहीं जा सका.’’

‘‘मुलजिम अपनी बेटी आरिफा और उस की दोस्त सबा के साथ शाम साढ़े 7 बजे से साढ़े 10 बजे तक एग्जीबिशन में था. एक मशहूर आर्टिस्ट शाहिद निजामी पूरे वक्त उस के साथ थे. वह उस की वहां मौजूदगी के गवाह हैं. जरूरत पड़ने पर उन्हें गवाही के लिए बुलाया जा सकता है. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के मुताबिक मकतूल का कत्ल 8 बजे और 9 बजे के बीच हुआ था. इस अरसे मेरा मुवक्किल नुमाइश में था, इसलिए यह कहना बेवकूफी है कि उस ने मकतूल का कत्ल किया है.’’

‘‘अगर उस ने कत्ल नहीं किया तो कातिल कौन हो सकता है?’’ जमाल ने उलझ कर पूछा.

‘‘आप का जवाब देने से पहले मैं इस केस के इंक्वायरी अफसर से सवाल करना चाहूंगा.’’

जज ने फौरन इजाजत दे दी. मैं ने आईओ से पूछा, ‘‘आप ने वारदात की जगह से जो फिंगरप्रिंट्स उठाए हैं, उस का रिकौर्ड आप के पास होगा? आप यह बताएं कि वहां किनकिन लोगों के निशान आप को मिले हैं?’’

‘‘हम ने 3 लोगों के फिंगरप्रिंट्स उठाए हैं. एक मकतूल लुबना, दूसरे उस के मंगेतर जमाल और तीसरे के बारे में कुछ पता नहीं चल सका है.’’ उस ने शर्मिंदगी से कहा.

‘‘मैं दावे से कह सकता हूं कि तीसरे नंबर के फिंगरप्रिंट्स जिन का पता नहीं चल सका, वह कातिल के हैं और कातिल तक मि. जमाल पहुंचाएंगे.’’

‘‘मैं… मैं कैसे?’’ वह हकलाया.

मैं ने जमाल से पूछा, ‘‘मि. जमाल, क्या आप किसी ऐसी लड़की या औरत के बारे में जानते हैं, जो आप से शादी करना चाहती है?’’

‘‘मेरी नजर में ऐसी कोई लड़की नहीं है.’’

‘‘कोई ऐसा शख्स है, जो मकतूल को बहुत पसंद करता था और उस से शादी करना चाहता था? एकेडमी में कोई ऐसा है, जिस की मकतूल से दोस्ती थी?’’

‘‘मेरी जानकारी में बस उबेद ऐसा शख्स है, जिस की लुबना से अच्छी बनती थी. उस वक्त लुबना से मेरी मंगनी नहीं हुई थी. मैं कैसे ऐतराज कर सकता था?’’

‘‘आप की मंगनी पर उस का क्या रिएक्शन था?’’

‘‘मेरी मंगनी के बाद वह एकदम बुझ सा गया था.’’

‘‘इस का मतलब मंगनी से उसे दुख पहुंचा था?’’

‘‘हो सकता है.’’

‘‘क्या यह वही उबेद है, जिसे लुबना ने रशना वाले ड्रामे के दिन फोन कर के घर बुलाया था?’’

‘‘जी हां, वही है. लौट कर उस ने मुझे बताया था कि काम हो गया.’’

‘‘यानी मुलजिम ने मकतूल को तलाक दे दिया?’’

‘‘जी हां, उस का यही मतलब था.’’

मैं ने अपना रुख जज की तरफ कर के कहा, ‘‘जनाब, अब तक की अदालती काररवाही मेरे मुवक्किल को बेगुनाह साबित करने को काफी है. फिर भी अदालत को निर्णय लेने में आसानी हो, मैं अगली पेशी पर मुलजिम की बेटी आरिफा उस की दोस्त सबा और आर्टिस्ट शाहिद निजामी को गवाही में पेश करूगा. आईओ साहब से रिक्वेस्ट है कि वह उबेद जामी के फिंगरप्रिंट्स जल्द हासिल कर के तीसरे नामालूम फिंगरप्रिंट्स से मिलाएं तो दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा?’’

जज ने आईओ और पुलिस को हिदायत दी कि उबेद को शामिल तफतीश किया जाए और अगली पेशी पर उसे हाजिर किया जाए. पुलिस ने बड़ी मुस्तैदी से उसी दिन उबेद को शामिल तफतीश कर के उस के फिंगरप्रिंट्स तीसरे नंबर के नामालूम फिंगरप्रिंट्स से मिलाए तो सारा मामला साफ हो गया. फिंगरप्रिंट्स के नमूने से उबेद के फिंगरप्रिंट्स मैच हो गए. पहले तो उबेद पुलिस को इधरउधर घुमाता रहा, जुर्म से इनकार करता रहा, पर जब पुलिस ने हाथ कड़े किए तो उस ने सच उगल दिया.

उबेद ने इकरारे जुर्म कर लिया कि लुबना को उसी ने सीने में खंजर घोंप कर मौत की नींद सुलाया था. यह कत्ल उस ने दास्ताने पहन कर किया था, इसलिए खंजर पर फिंगरप्रिंट नहीं आए थे. दूसरी जगहों पर फिंगर प्रिंट्स पाए गए थे. उबेद के बयान के मुताबिक, लुबना डबल गेम खेल रही थी. पहले तो वह उबेद से हंसतीबोलती रही, उस से दोस्ती बढ़ाती रही. जब उबेद उस की मोहब्बत में डूब गया तो जमाल को अपनी ओर आकर्षित देख कर वह उस की तरफ मुड़ गई. वह एकेडमी का मालिक था और उबेद से ज्यादा स्मार्ट था. मगर वह उबेद का सब्जबाग दिखाती रही. दोनों अपनीअपनी जगह पर लुबना को माशूका पा कर खुश थे. वह बारीबारी दोनों को खुश करती रही. दोनों यही समझते रहे कि वह बस उस के साथ सीरियस है.

अपने शौहर यानी कादिर अली से तलाक हासिल करने के बाद उस ने खुल्लमखुल्ला अपना फैसला जमाल के हक में दे दिया और उस के दिए हुए फ्लैट में रहने लगी. बाद में उस से मंगनी भी कर ली. उबेद को दुख भी हुआ और गुस्सा भी आया कि वह उसे इतने दिनों तक उल्लू बनाती रही. उस ने पुलिस को बयान देते हुए कहा, ‘‘मैं मोहब्बत में अपनी यह हार बिलकुल बरदाश्त नहीं कर पाया. वह मुझ से बड़ा प्यार जताती थी. मैं ने उल्लू बन कर उसे महंगेमहंगे तोहफे दिए थे. उस का धोखा मेरे दिल को लग गया. मैं ने तय कर लिया कि मैं बदला जरूर लूंगा.

‘‘मैं ने उसे बुझे दिल से मंगनी की मुबारकबाद दी. फिर कुछ दिन गुजरने के बाद मैं ने लुबना से रिक्वैस्ट की कि अपनी मोहब्बत मैं भूल जाऊंगा, बस वह एक घंटा तनहाई में मेरे साथ गुजारे. इस के बाद मैं उन की जिंदगी से दूर हो जाऊंगा. उसे पुरानी मोहब्बत का वास्ता दिया तो वह मान गई. हम ने जिंदगी के बहुत सारे रंगीन लम्हे साथ बिताए थे. उन्हीं की यादों को ताजा करते हुए उस ने मेरी बात मान ली.’’

आईओ ने पूछा, ‘‘तो तुम ने एक खास मकसद के लिए उस से मुलाकात की और चुपचाप वापस चले आए. यह नशे का क्या मामला था?’’

‘‘वारदात वाले दिन लुबना ने 8 बजे बुलाया था. और यह जता दिया था कि 9 बजे के पहले चले जाना होगा. मैं पूरी तैयारी के साथ उस के फ्लैट पर ठीक 8 बजे पहुंच गया. उस ने मेरे लिए चाय बनाई. मैं ने नजर बचा कर उस की चाय में नींद की गोलियां डाल दीं. चाय पी कर वह सिरदर्द की शिकायत करने लगी. मैं ने उसे सहारा दे कर उस के बैडरूम में ले जा कर बैड पर लिटा दिया. मेरी दी हुई दवा ने असर दिखाना शुरू कर दिया था. वह अपने होश में नहीं रही तो मैं ने अपने लिबास में छिपाया खंजर निकाला और दास्ताने पहन कर खंजर का घातक वार उस दगाबाज औरत के सीने पर कर दिया.’’

उबेद अपने जुर्म, अपने बदले की दास्तान सुना रहा था. उस के एकएक लफ्ज में नफरत की चिनगारियां निकल रही थीं, ‘‘वह बेवफा औरत इसी लायक थी. ऐसी दगाबाज औरतें ऐसे ही अंजाम की हकदार होती हैं. मुझे अपने किए पर कोई दुख, कोई पछतावा नहीं है. बस दुख इस बात का है कि मैं पकड़ा गया. हालांकि चाय के खाली कप मैं अपने साथ ले गया था, ताकि पुलिस को मुझ तक पहुंचने का कोई सुराग न मिले. लेकिन मेरी बदनसीबी की मैं पकड़ा गया.’’

उबेद के इकबाले जुर्म के बाद मेरे मुवक्किल की बेगुनाही पक्की हो गई और अगली पेशी पर आरिफा, सबा व शाहिद निजामी की गवाही के बाद कादिर अली बाइज्जत बरी हो गया. True Crime Story

 

Hindi Crime Story: जो सिर्फ दिमाग चलाते हैं

Hindi Crime Story: एक एनजीओ संचालक ने प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की टीम बना कर बौलीवुड फिल्म ‘स्पैशल 26’ की तरह एक बिल्डर के यहां छापा मार कर 21 लाख रुपए और गहने जिस तरह ठगे, हैरान करने वाली बात है. लेकिन क्या वे पुलिस से बच पाए?

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून की सड़कों पर रोज की तरह उस दिन भी वाहनों की आवाजाही लगी थी. रात के लगभग 9 बजे दिल्ली नंबर की एक चमचमाती सफेद रंग की एलैंट्रा कार नंबर- डीएल 3सी एक्यू 0504 सहारनपुर चौक से राजपुर की ओर चली जा रही थी. कार में 4 आदमी और 2 औरतें सवार थीं. सभी ने सफेद रंग की पैंट और कमीज पहन रखी थी.

कार कारगी चौक पहुंच एक किनारे खड़ी हो गई. कार के रुकते ही वहां पहले से खड़े 2 लोग उस के नजदीक आए तो कार की ड्राइविंग सीट पर बैठा युवक उन से मुखातिब हुआ, ‘‘सब ठीक है न?’’

‘‘यस, लाइन क्लियर है. बस आप लोगों का ही इंतजार था.’’ कह कर वे दोनों भी कार में सवार हो गए. इस के बाद कार फिर चल पड़ी तो कुछ देर में वह पौश इलाके सरकुलर रोड पर कोठी नंबर 92 के सामने जा कर रुकी.

यह कोठी बिल्डर यशपाल टंडन की थी. यशपाल प्रौपर्टी का काम करते थे. इस के अलावा बड़ीबड़ी कमेटियां भी डालते थे, जिस में लाखों रुपए का लेनदेन होता था.

यशपाल का अपना औफिस भी था, जिस में वह सुबह से शाम तक बैठते थे. कोई नहीं जानता था कि उस दिन यशपाल का वास्ता एक बड़ी मुसीबत से पड़ने वाला था. कार में बाद में सवार हुए दोनों लोगों को छोड़ कर बाकी सभी कार से नीचे उतरे. उन में से एक के हाथ में ब्रीफकेस था. कार से उतरे लोग कोठी के गेट पर जा कर खड़े हो गए. उन्होंने डोरबैल बजाई तो कुछ सेकैंड बाद दरवाजे पर यशपाल टंडन खुद आए. उन के दरवाजा खोलते सब से आगे खड़े एक आदमी ने पूछा, ‘‘आप यशपाल टंडन?’’

‘‘जी हां, लेकिन आप कौन?’’ उन्होंने पूछा तो उसी आदमी ने रौब जमाते हुए सख्त लहजे में कहा, ‘‘हम लोग प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) से हैं. आइए अंदर बैठ कर बातें करते हैं.’’

टंडन सकपका गए. एकाएक उन की कुछ समझ में नहीं आया. आने वालों के तेवर उन्हें ठीक नहीं लग रहे थे. उन्होंने हकलाते हुए कहा, ‘‘ल…ल…लेकिन इस तरह.’’

‘‘कहा न, चलो अंदर चल कर बात करते हैं.’’ कहने के साथ ही टीम का नेतृत्व कर रहे उस आदमी ने साथियों से कहा, ‘‘दरवाजा बंद कर के इन्हें अंदर ले आइए और बाहर खड़े लोगोें से कहिए कि बिना इजाजत कोई अंदर न आने पाए.’’

हालात अचानक बदल गए थे. टंडन चुपचाप उन के साथ अंदर आ गए. ड्राइंगरूम में आते ही उन्होंने टंडन को सोफे पर बैठा कर कहा, ‘‘मि. टंडन, हमें तुम्हारे घर की तलाशी लेनी है. हमें शिकायत मिली है कि तुम्हारे पास बहुत ब्लैकमनी है.’’

‘‘ऐसा तो कुछ भी नहीं है सर, जरूर आप को किसी ने गलत सूचना दी है.’’ टंडन ने सफाई देनी चाही तो टीम का नेतृत्व कर रहा आदमी बड़े ही आत्मविश्वास से बोला, ‘‘हमारी इन्फौरमेशन गलत नहीं है. हम तुम पर तभी से नजर रख रहे हैं, जब तुम्हारे दोस्त विजय मनचंदा के यहां आयकर का छापा पड़ा था, उस समय तुम खुद भी तो वहां मौजूद थे.’’

उस की इस बात पर यशपाल चौंके, क्योंकि उस अधिकारी ने जो कहा था, वह एकदम सही था. दरअसल 4 महीने पहले उन के दोस्त विजय मनचंदा के यहां जब आयकर विभाग ने छापा मारा था, तब वह भी वहां मौजूद थे. इतना ही नहीं, आयकर विभाग ने उन का पहचान पत्र ले कर उन्हें गवाह भी बना लिया था. वह घबरा गए. यह सब उन की पत्नी भी देखसुन रही थीं. वह भी घबरा गईं. टंडन और उन की पत्नी को सोफे पर एक तरह से बंधक बना कर बैठा दिया गया.

‘‘मि. टंडन, हमें कोऔपरेट कीजिए.’’ सामने बैठे आदमी ने कहा तो टीम में शामिल युवा लड़कियां टंडन दंपति के इर्दगिर्द खड़ी हो गईं, जबकि बाकी लोग कोठी की तलाशी लेने लगे. करीब आधा घंटे तक जब कुछ हाथ नहीं लगा तो उन्होंने सेफ की चाबी ले कर सारा सामान उलटपलट दिया. इस जांचपड़ताल में उन के हाथ संपत्ति के कुछ कागजात, नकदी और गहने लगे.

उन्हें जो भी मिला, वह सब एक स्थान पर रखते गए. उन के बारे में तरहतरह के सवाल भी करते रहे. टीम का नेतृत्व कर रहे अधिकारी ने यशपाल को गहरी नजरों से घूरते हुए कहा, ‘‘इन सब का हिसाब देने तुम्हें कल औफिस आना होगा. तुम्हारे खिलाफ एफआईआर तो होगी ही, जरूरत पड़ी तो गिरफ्तारी भी हो सकती है.’’

यशपाल के तो होश उड़ गए. उन्हें परेशान देख कर अधिकारी ने कहा, ‘‘हमारे पास एक बीच का रास्ता है.’’

‘‘क्या?’’ डरेसहमे यशपाल टंडन ने पूछा तो राजदाराना अंदाज में वह बोला, ‘‘अगर हमें 50 लाख रुपए मिल जाएं तो तुम आगे की काररवाई से बच सकते हो.’’

इस काररवाई से दहशत में आए यशपाल सोच में पड़ गए. गिड़गिड़ाने वाले अंदाज में उन्होंने कहा, ‘‘सर, मेरे पास इतनी बड़ी रकम नहीं है. कुछ कम हो जाए तो मैं कोशिश कर सकता हूं.’’

‘‘ठीक है, रकम कम करेंगे तो हम इन्हें अपने साथ ले जाएंगे.’’ उस ने गहनों की ओर इशारा कर के कहा.

यशपाल इजाजत ले कर सोफे से उठे और घर में रखे 6 लाख रुपए निकाल कर उन्हें दे दिए.

लेकिन छापा मारने वाली टीम ने उन्हें लेने से मना कर दिया. उन्होंने कहा कि इतने में बात नहीं बनेगी. इस के बाद टंडन ने फोन कर के अपने किसी परिचित व्यापारी से 10 लाख रुपए मंगा कर लिए. यह रकम लेने टंडन खुद दरवाजे तक गए थे. इतने पर भी बात नहीं बनी तो उन्होंने अपने किसी अन्य परिचित से 5 लाख रुपए और मंगा कर दिए.

टीम का मुखिया इतने पर भी संतुष्ट नजर नहीं आया. उस ने सारी नकदी और आभूषण एक बैग में रख लिए. इस के बाद चलने लगा तो कहा, ‘‘थोड़ी देर के लिए अपनी स्कूटी देना.’’

टंडन ने मना किया तो उस ने कहा, ‘‘आप चिंता न करें, हमारा कर्मचारी आ कर उसे दे जाएगा.’’

करीब सवा 2 घंटे की काररवाई के बाद पूरी टीम चली गई.

यशपाल टंडन के यहां ईडी का यह छापा 2 नवंबर, 2015 की रात पड़ा था. इस छापे से वह काफी परेशान थे. उन्होंने अपने परिचितों को फोन कर के इस छापे की जानकारी दी तो बिना पुलिस के रात में छापा मारना और स्कूटी मांग कर ले जाने वाली बात से उन लोगों को यह सब संदिग्ध लगा. जब यह साफ हो गया कि आयकर विभाग या प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) रात में छापा नहीं मारता तो लगा कि उन के साथ कोई बड़ी गड़बड़ हुई है. परिचितों से सलाहमशविरा कर के यशपाल टंडन ने इस की सूचना पुलिस कंट्रौल रूम को दे दी.

फरजी ईडी टीम द्वारा छापे के बहाने लाखों रुपए ले जाने की घटना की सूचना पा कर थाना कोतवाली के प्रभारी एस.एस. बिष्ट और लक्खीबाग चौकीप्रभारी राकेश शाह पुलिस बल के साथ टंडन की कोठी पर पहुंच गए. अधिकारियों को भी सूचित कर दिया गया था. इस घटना से जिला पुलिस में हड़कंप मच गया था. एसपी (सिटी) अजय सिंह और सीओ मनोज कत्याल भी मौके पर पहुंच गए थे. सभी ने यशपाल से पूछताछ की तो उन्होंने पूरी घटना सिलसिलेवार बता दी. पुलिस को समझते देर नहीं लगी कि यशपाल टंडन को छापे के बहाने शातिराना अंदाज में ठगा गया है. प्रवर्तन निदेशालय के क्षेत्रीय प्रमुख पी.के. चौधरी ने भी स्पष्ट कर दिया कि उन की किसी टीम ने छापा नहीं डाला है.

यशपाल बुरी तरह हताश हो गए. ठग पूरी तैयारी के साथ आए थे और बड़ी चालाकी से उन्हें ठग कर चले गए थे. मामला बेहद गंभीर था. थाना कोतवाली में यशपाल द्वारा दी गई तहरीर के आधार पर अज्ञात लोगों के खिलाफ अपराध संख्या- 304/2015 पर भादंवि की धारा 595, 419, 420, 120 बी, 406 व 506 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया गया. एसएसपी डा. सदानंद दाते को भी इस घटना की सूचना मिल गई थी. वह काफी हैरान थे. इस की वजह यह थी कि यह फिल्मी स्टाइल में किया गया अपनी तरह का एक अलग अपराध था. उन्होंने एसपी (सिटी) अजय सिंह से सलाह कर के इस मामले के खुलासे के लिए एक टीम का गठन करने का आदेश दिया.

इस स्पैशल औपरेशन ग्रुप की संयुक्त टीम में थानाप्रभारी एस.एस. बिष्ट, लक्खीबाग चौकीप्रभारी राकेश शाह, एसआई दिलबर सिंह, एएसआई सर्वेश कुमार, कांस्टेबल अरविंद भट्ट, मनमोहन सिंह, कुलवीर, सत्येंद्र नेगी, प्रमोद, गंभीर सिंह और महिला कांस्टेबल रजनी कोहली तथा सुमन को शामिल किया गया. इस का नेतृत्व खुद एसपी (सिटी) अजय सिंह कर रहे थे. पुलिस टीम तुरंत अपने काम में लग गई. यशपाल टंडन से हुई पूछताछ के आधार पर पुलिस ने एक्सपर्ट से एक आरोपी का स्कैच भी बनवा कर जारी कर दिया.

यशपाल ने कार का जो नंबर बताया था, पुलिस ने अगले दिन उस की जांच की तो वह पंजाब प्रांत की किसी मोटरसाइकिल का निकला. 2 बातें स्पष्ट होती थीं, एक तो यह कि यशपाल को ठीक से नंबर याद नहीं था या फिर कार में फरजी नंबर प्लेट का इस्तेमाल किया गया था. यशपाल की स्कूटी पुलिस ने उसी दिन कारगी चौक से लावारिस अवस्था में खड़ी बरामद कर ली थी. उन की कोठी के बाहर बाईं ओर एसजीआरआर स्कूल था. उस के बाहर सीसीटीवी कैमरे लगे थे. पुलिस ने उस की रिकौर्डिंग चैक की, लेकिन उस से कार का नंबर पकड़ में नहीं आ सका.

राजधानी के मुख्य चौराहों पर भी सुरक्षा की दृष्टि से हाई डैफिनेशन कैमरे लगे हैं. पुलिस ने रात 9 से साढ़े 11 बजे तक की उन की फुटेज बारीकी से चैक की तो आशारोड़ी क्षेत्र के कैमरे में वह कार दिख गई, जिस में सवार हो कर कथित ईडी टीम के सदस्य आए थे. इस में कार का नंबर स्पष्ट नजर आ रहा था. इस तरह पुलिस को नंबर मिल गया. अब तक कई दिन बीत चुके थे. चूंकि नंबर दिल्ली का था, इसलिए एसआई राकेश शाह के नेतृत्व में एक टीम दिल्ली भेज दी गई.

दिल्ली पहुंची पुलिस टीम ने आरटीओ औफिस से कार के मालिक के बारे पता किया. पुलिस आरटीओ औफिस से मिले पते पर पहुंची तो वहां जो मिला, पता चला उस ने कार बेच दी थी. जिस व्यक्ति को उस ने कार बेची थी, पुलिस उस के पास पहुंची तो वहां भी निराश होना पड़ा, क्योंकि उस ने भी किसी अन्य को कार बेच दी थी. पुलिस टीम दिल्ली में ही डेरा डाले थी. कार आदर्शनगर निवासी पुष्पा को बेची गई थी. पुलिस खोजबीन करते हुए पुष्पा के यहां पहुंची तो उस ने बताया कि उस की कार को एक एनजीओ संचालक प्रदीप सिंह मांग कर ले गया था.

प्रदीप के बारे में पूछताछ की गई तो पता चला कि वह अपने भाई बबलू और कुछ अन्य साथियों के साथ जहांगीरपुरी में एक औफिस खोल कर एनजीओ चलाता है. उस के यहां स्टाफ भी था. पुलिस ने पूछताछ कर के उस के बारे में जानकारी इकट्ठा कर ली. पुलिस को कार पुष्पा के यहां मिल गई थी. पुलिस को जो सुराग मिले थे, वे काम के थे. 25 नवंबर को पुलिस टीम जहांगीरपुरी स्थित फ्लैट नंबर डी 268 पर पहुंची. फ्लैट में औफिस चल रहा था. पुलिस को वहां प्रदीप तो नहीं मिला, उस के यहां काम करने वाली 2 लड़कियां मिल गईं.

ईडी के छापे में चूंकि 2 लड़कियां भी शामिल थीं, इसलिए पुलिस ने उन्हें शक के दायरे में रख कर पूछताछ शुरू कर दी. उन लड़कियों में एक श्रद्धानंद कालोनी निवासी बेबी पुत्री वीरेंद्र और दूसरी राखी पुत्री कल्लू थीं. दोनों बेहद साधारण परिवारों से थीं. वे दोनों कई महीने से इस एनजीओ में काम कर रही थीं. पुलिस ने उन से घुमाफिरा कर सवाल किए तो वे जवाब देने में उलझ गईं. उन्होंने जो सच बताया, उसे सुन कर पुलिस भी हैरान रह गई. इस फरजी छापे की योजना किस ने तैयार की थी, यह तो वे नहीं जानती थीं, लेकिन प्रदीप के साथ छापे में वे भी गई थीं. पुलिस दोनों को हिरासत में ले कर देहरादून आ गई. पुलिस प्रदीप के जहांगीरपुरी स्थित एमसीडी में फ्लैट नंबर 306 पर भी गई थी, लेकिन वहां ताला लगा था.

पुलिस ने दोनों लड़कियों से पूछताछ की तो उन्होंने बताया कि 2 नवंबर को प्रदीप छापा मारने की बात कह कर उन्हें अपने साथ ले गया था. उस के साथ उस का भाई बबलू और 2 दोस्त भी थे, जबकि 2 लोग उन्हें देहरादून में मिले थे. बेबी और राखी प्रदीप एवं बबलू के अलावा किसी और को नहीं पहचानती थीं. पुलिस ने यशपाल टंडन से लड़कियों का आमनासामना कराया तो उन्होंने उन्हें पहचान लिया. लड़कियों ने हैरान करने वाली बात यह बताई कि प्रदीप ने यह छापा फिल्म ‘स्पैशल-26’ की स्टाइल में मारा था. इस के लिए उस ने खुद तो रिहर्सल किया ही था, उन्हें भी रिहर्सल कराया था. उन्हें कई बार फिल्म भी दिखाई थी.

टीम असली लगे, इस के लिए उन्होंने सफेद रंग के कपड़े सिलवाए थे. अपनी बनाई योजना के अनुसार वे छापा मार कर चले गए थे. प्रदीप के पास ही पूरी रकम थी. छापा मारने के पहले जो 2 लोग देहरादून में मिले थे, वे देहरादून में ही रह गए थे. लड़कियों ने बताया था कि यशपाल टंडन ने टीम को पूरा सहयोग दिया था. उन्होंने खुद ही बताया था कि अमुकअमुक स्थान पर तलाशी लें. इस से यशपाल की भूमिका भी संदिग्ध हो गई थी.

यशपाल कमेटी डलवाते थे. हो सकता था कि घाटा दिखाने के लिए उन्होंने ही यह योजना बनाई हो. इस मुद्दे पर उन से भी पूछताछ की गई, लेकिन इस में उन का कोई हाथ नहीं निकला. अलबत्ता लड़कियों और उन के बयानों में थोड़ा विरोधाभास जरूर बना रहा. अभी मामले का खुलासा पूरी तरह नहीं हो सका था. एसएसपी डा. सदानंद दाते ने 26 नवंबर को अपने औफिस में प्रेसवार्ता कर के इस फरजी छापे का खुलासा किया. इस के बाद पुलिस ने दोनों लड़कियों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

लड़कियों की गिरफ्तारी के बाद पुलिस को विश्वास हो गया कि वारदात में स्थानीय लोगों का भी हाथ जरूर था. पुलिस टीम प्रदीप की तलाश में जुटी थी, लेकिन अगले कई दिनों तक वह हाथ नहीं आया. पुलिस प्रदीप और उस के भाई के मोबाइल नंबरों की जांच कर रही थी. लेकिन वे बंद हो चुके थे. पुलिस हर सूरत में पूरे मामले का परदाफाश करना चाहती थी. एसपी (सिटी) अजय सिंह समयसमय पर टीम के काम की समीक्षा करते रहते थे. देखते ही देखते घटना को घटे डेढ़ महीने से ज्यादा का समय बीत गया, लेकिन आरोपियों का कोई सुराग नहीं मिला. कोई महत्त्वपूर्ण सुराग हाथ लग जाए, इस के लिए पुलिस ने जेल में बंद राखी और बेबी से दोबारा पूछताछ की.

पुलिस आरोपियों के मोबाइल नंबरों की काल डिटेल्स पर भी काम कर रही थी. इस से कडि़यां जुड़ती चली गईं. इस कड़ी में एक नाम धर्मपाल भाटिया का सामने आया. धर्मपाल हरियाणा के जिला करनाल के हांसी रोड पर रहता था. पुलिस उसे गिरफ्तार कर के देहरादून ले आई और उस से पूछताछ के आधार पर देहरादून के थाना क्लेमन टाउन के गोकुल एन्कलैव में रहने वाले दीपक मनचंदा को भी 4 जनवरी, 2016 को गिरफ्तार कर लिया.

पुलिस ने दोनों से पूछताछ की. इन से पूछताछ में पुलिस को पता चला कि यह पूरी योजना एक महिला द्वारा तैयार की गई थी तो हैरानी बढ़ गई. सभी लोगों ने योजना बना कर जिस तरह फिल्मी अंदाज में छापा मारा था, पुलिस उलझ कर रह गई थी. ठगी का शिकार हुए यशपाल टंडन का उन का अपना कलैक्शन एजेंट ही उन्हें दगा दे गया था. दरअसल, दीपक मनचंदा यशपाल के दोस्त विजय मनचंदा का भतीजा था. इसी नाते उन्होंने भरोसा कर के उसे अपने यहां कमेटी का पैसा जुटाने और अन्य कामों के लिए रख लिया था. दीपक ने खूब मेहनत कर के काम किया, जिस से यशपाल टंडन को उस पर पूरा भरोसा हो गया. वह उस के साथ परिवार के सदस्य की तरह व्यवहार करने लगे.

जरूरी नहीं कि इंसान जैसा दिखता है, ठीक वैसा हो ही. दीपक के साथ भी ऐसा ही था. वह बुरी आदतों का शिकार था. उन में एक आदत अनापशनाप खर्च करना भी थी. यशपाल के लिए वह मोटी रकम इकट्ठा करता था. धीरेधीरे उस ने उन से 5 लाख रुपए उधार ले लिए. जब रुपए लौटाने की बात आई तो वह परेशान रहने लगा. दीपक मूलरूप से करनाल का ही रहने वाला था और कुछ सालों पहले ही देहरादून आया था. उस की जानपहचान धर्मपाल भाटिया और उस की पत्नी निशा उर्फ रेखा से थी. निशा तेजतर्रार महिला थी. एक दिन बातोंबातों में उस ने अपनी परेशानी दोनों को बताने के साथ यह भी बताया कि उस का मालिक काफी दौलतमंद आदमी है.

‘‘तुम उसी से पैसा क्यों नहीं कमाते?’’ निशा ने रहस्यमय अंदाज में कहा.

‘‘वह कैसे?’’ दीपक ने हैरानी से पूछा.

‘‘इस की तरकीब मैं तुम्हें बताऊंगी.’’ निशा ने कहा.

आश्वासन मिलने पर दीपक को थोड़ी राहत मिल गई. जहांगीरपुरी में रहने वाले प्रदीप और बबलू निशा के भाई थे. दोनों काफी शातिर थे. वे एनजीओ की आड़ में ब्लैकमेलिंग का धंधा करते थे. निशा और धर्मपाल ने इस मुद्दे पर उन से बात की तो काफी सोचविचार कर उन्होंने फिल्म ‘स्पैशल 26’ की स्टाइल में यशपाल टंडन को लूटने की सोची.

इस के बाद उन्होंने दीपक से बात की तो उस ने यशपाल के बारे में सब कुछ बता दिया. उस ने यह भी बताया कि यशपाल चूंकि कमेटी के साथ ब्याज पर भी रुपए देने का काम करते हैं, इसलिए उन के पास बिना हिसाबकिताब की मोटी रकम होती है. प्रदीप और निशा को वह सौफ्ट टारगेट लगे. प्रदीप स्मार्ट युवक था और अधिकारियों वाले अंदाज में रहता था.

सभी ने मिल कर यशपाल को प्रवर्तन निदेशालय के फरजी छापे के जरिए अपना शिकार बनाने का फैसला किया. प्रदीप ने इस योजना  में अपने एक दोस्त पंकज तिवारी, भांजे रमन और एनजीओ में काम करने वाली बेबी और राखी को भी लालच दे कर शामिल कर लिया. प्रदीप, उस का भाई, दोस्त, भांजा और दोनों लड़कियों ने कई बार ‘स्पैशल 26’ फिल्म देखी. प्रदीप को अधिकारी की भूमिका में रहना था, जबकि बाकी को टीम के सदस्य के रूप में. योजना बन गई तो तय दिन 2 नवंबर के एक दिन पहले ही धर्मपाल दीपक के पास देहरादून पहुंच गया.

अगले दिन प्रदीप ने बहाने से पुष्पा की कार मांगी और बबलू, पंकज, रमन, बेबी और राखी के साथ शाम को दिल्ली से चल कर करीब 8 बजे देहरादून पहुंच गया. यशपाल और दीपक तय योजना के तहत उन्हें रास्ते में मिल गए. सभी लोग यशपाल की कोठी पर पहुंचे. चूंकि यशपाल दीपक को पहचानते थे, इसलिए वह धर्मपाल के साथ बाहर कार ही में रुक गया. यशपाल को उन के फरजी ईडी होने का शक न हो, इस के लिए प्रदीप ने उन्हें उन के दोस्त के यहां पूर्व में पड़े आयकर विभाग के छापे का जिक्र किया. यह बात दीपक उसे पहले ही बता चुका था. उन्होंने बेहद शातिराना अंदाज में 21 लाख कैश और गहने ठग लिए. जातेजाते वे स्कूटी भी ले गए, जिसे उन्होंने कारगी चौक पर छोड़ दिया.

इस के बाद दीपक अपने घर चला गया. धर्मपाल करनाल और बाकी लोग दिल्ली. प्रदीप ने कहा कि वह माल का बंटवारा बाद में करेगा. लेकिन वह सभी से शातिर निकला और अपने भाई के साथ पूरी रकम ले कर फरार हो गया. उस ने सिर्फ बेबी और राखी को 6 हजार रुपए खर्च के लिए दिए थे. पूछताछ के बाद पुलिस ने आरोपियों का सामना यशपाल टंडन से कराया. वह अपने दोस्त के भतीजे द्वारा दी गई दगा से आहत थे. एसएसपी डा. सदानंद दाते ने 5 जनवरी, 2016 को आरोपियों को मीडिया के सामने पेश कर के केस का खुलासा किया और पुलिस टीम को ढाई हजार रुपए इनाम देने की घोषणा की.

पुलिस ने बाद में गिरफ्तार किए गए दोनों आरोपियों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक जेल गए आरोपियों की जमानत नहीं हो सकी थी. बाकी अन्य आरोपी निशा उर्फ रेखा, प्रदीप, बबलू, पंकज और रमन की तलाश जारी थी. Hindi Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Crime Story Hindi: शिल्पा शेट्टी के – परिवार को ठगने वाला बाबा

Crime Story Hindi: योगगुरु बाबा रामदेव के तथाकथित शिष्य देवेंद्र ने मशहूर अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी के परिवार के अलावा भी कई लोगों को ठगा था. लेकिन जब उस के कारनामों की पोल खुली तो हर कोई दंग रह गया. चेहरे पर दाढ़ी और सिर पर लंबे बाल रखने वाला वह लंबातगड़ा शख्स खुद को पहुंचा हुआ बाबा बताता था. मैडिकल साइंस को चुनौती देने वाले रोगों को भी वह ठीक करने का दावा करता था. सिर्फ इतना ही नहीं, बल्कि वह खुद को करोड़ों का कारोबार करने वाले ट्रस्ट पतंजलि के योगगुरु बाबा रामदेव का शिष्य भी बताता था, साथ ही वह बौलीवुड की मशहूर अदाकारा शिल्पा शेट्टी के साथसाथ कई और विख्यात हीरोइनों से अपने खास ताल्लुकात बताया करता था.

उस के कई नाम थे और उस का सब से बड़ा हथियार था धर्म. यही वजह थी कि तमाम लोग उस के मुरीद थे, लेकिन जब उस की करतूतों का खुलासा हुआ तो उस की हकीकत जान कर हर कोई दंग रह गया. वास्तव में वह महाठग था. उस ने न सिर्फ शिल्पा शेट्टी के परिवार से एक करोड़ रुपए से ज्यादा ठग लिए थे, बल्कि अन्य कई लोगों को भी चूना लगाया था. इस शख्स का नाम था देवेंद्र कुमार योगी उर्फ देवेंद्र कुमार आचार्य उर्फ योगी महाराज उर्फ स्वामी कृष्णदेव योगी. इस तथाकथित योगी का उत्तर प्रदेश के मेरठ जनपद स्थित हस्तिनापुर इलाके में आश्रम था. गेरुआ व सफेद वस्त्र धारण करने वाला यह बाबा धर्म के नाम पर लोगों को अपना मुरीद बनाता था.

लोगों को धर्म के नाम पर किस तरह बहलाफुसला कर काबू में लाया जाता है, यह हुनर वह बखूबी जानता था. इस के लिए वह सोशल नेटवर्किंग साइट का भी सहारा लेता था. वैसे भी समाज में ऐसे अंधविश्वासियों की कोई कमी नहीं है, जो अपना सब कुछ न्यौछावर करने को तैयार रहते हैं. देवेंद्र के कई चेलेचपाटे गांवगांव जा कर उस का प्रचार किया करते थे. वह लोगों को योग सिखाने के साथसाथ खुद को कैंसर स्पैशलिस्ट भी बताता था. वैसे तो उस के पास कोई डिग्री नहीं थी, लेकिन वह दावा करता था कि जिस मर्ज का इलाज डाक्टर नहीं कर सकते, उस का इलाज वह कर देगा.

वह जिन मर्जों को दूर करने की बात करता था, उन में गुप्तरोग, दमा, अस्थमा, हृदय रोग, थायराइड, एनीमिया, साइनस, किडनी स्टोन, शुगर, प्रोस्टेट, पाइल्स, कोरोनरी आर्टरीज, मोटापा, कब्ज, आर्थराइटिस, ब्लड प्रेशर व जोड़ों का दर्द आदि रोग शामिल थे.

धनी भक्तों के घर जा कर वह योगा क्लास चलाता था. वह अपनी फीस भक्तों की हैसियत के हिसाब से निर्धारित करता था. आश्रम में आने वाले भक्तों को वह अपनी कामयाबियों के मनगढ़ंत किस्से सुना कर प्रभावित करता था. उस ने खुद को कारोबारी बाबा के रूप में पहचान बना चुके बाबा रामदेव का खास शिष्य घोषित किया हुआ था. उस के अनुसार, वह पिछले 10 सालों से बाबा से जुड़ा हुआ था. अपने इस दावे को सच साबित करने के लिए उस ने बाबा रामदेव के साथ वाली अपनी कई तसवीरें आश्रम की दीवारों पर टांग रखी थीं.

रौबरुतबे के लिए इतना ही काफी नहीं था. वह फिल्म हीरोइन शिल्पा शेट्टी समेत उन के पूरे परिवार को अपना भक्त बताता था. शिल्पा शेट्टी और उन के परिवार के साथ भी उस ने कई तसवीरों को दीवार पर सजा रखा था. वह अपने भक्तों को बताता था कि जब वह मुंबई जाता है तो प्रियंका चोपड़ा, दीपिका पादुकोण, करिश्मा कपूर, बिपाशा बसु, सोनाक्षी सिन्हा, अनिल कपूर, रितिक रोशन जैसे कई हीरोहीरोइन उस से मिलने आते हैं. वे लोग अपने कई काम उस के कहे अनुसार करते हैं और टेलीफोन पर बराबर संपर्क में रहते हैं.

साधारण लोग सोचते थे कि जब इतने बड़ेबड़े स्टार बाबा के भक्त हैं तो फिर वे क्यों पीछे रहें. भक्तों की बढ़ती कतार के साथ उस के चेहरे की रौनक बढ़ जाती थी. उस के भक्त बाबा को खुशीखुशी रुपयापैसा भी देते थे. देवेंद्र की दुकान ठीक जमी हुई थी कि 20 नवंबर, 2015 को मुंबई के वरसोवा थाने के सबइंसपेक्टर भारत शिवाजी के नेतृत्व में पुलिस टीम की छापेमारी से खलबली मच गई. दरअसल मुंबई में बाबा के खिलाफ धोखाधड़ी व गबन का मामला दर्ज था. पुलिस ने बाबा देवेंद्र को गिरफ्तार कर लिया.

इस के साथ ही उस की कलई खुली तो उस के भक्त भी सिर थाम कर बैठ गए, क्योंकि हकीकत हैरान करने वाली थी. बाबा कोई छुटभैया नहीं, बल्कि महाठग निकला. उस ने हीरोइन शिल्पा शेट्टी के मातापिता से 1 करोड़ 20 लाख रुपए की रकम ठगी थी. कानून का फंदा कसते ही देवेंद्र हक्काबक्का रह गया. वजह यह कि शायद उसे इस की कतई उम्मीद नहीं थी.

दरअसल, देवेंद्र ने जनवरी, 2014 में एक कारोबारी के माध्यम से शिल्पा के पिता सुरेंद्र शेट्टी व मां सुनंदा शेट्टी से जानपहचान बढ़ाई. बाबा के लिबास और धर्म की बड़ीबड़ी बातों से वह उस के झांसे में आ गए. इस के बाद वह अकसर उन के घर आनेजाने लगा. उस ने उन से खुद को रामदेव का खास शिष्य व आयुर्वेदिक औषधियों का बड़ा जानकार बताया था. उस ने उन्हें सपना दिखाया कि औषधियों का बड़ा कारोबार किया जा सकता है. उस के झांसे में आए सुरेंद्र शेट्टी ने उसे मोटी रकम दे दी. दिखावे के लिए देवेंद्र ने मुंबई में औफिस भी खोल लिया था.

देवेंद्र जब शिल्पा के घर जाता था तो प्रभाव जमाने के लिए श्वेत वस्त्रों के साथ ही लकड़ी की खड़ाऊ पहन कर जाता था. जबकि हकीकत में वह फैशनपरस्त था. वह जींस टीशर्ट पहन कर डांस बारों से ले कर सिनेमाघरों तक में मौजमस्ती करता था. शिल्पा का परिवार उस की इस हकीकत से अनजान था. दवा सप्लाई के नाम पर जब उस ने धीरेधीरे एक करोड़ से ज्यादा की रकम झटक ली तो एक दिन वह चुपके से बोरियाबिस्तर समेट कर अपने मूल ठिकाने पर आ गया. शिल्पा शेट्टी के परिवार की एक लग्जरी कार भी वह अपने साथ ले आया था. ठगी का अहसास होने पर शिल्पा के पिता ने वरसोवा थाने में बाबा के खिलाफ मुकदमा दर्ज करा दिया था.

आश्रम आ कर देवेंद्र ने अपना काम ठीक से जमा लिया था. उस ने योग के नाम से एक फेसबुक पेज भी बनाया, जिस पर विदेशी मौडल्स की कई उत्तेजक तसवीरें लगाईं. फेसबुक पेज पर उस ने खुद को योग अध्यापक घोषित कर रखा था. देवेंद्र की गिरफ्तारी के साथ ही उस की ठगी के कारनामे खुलने लगे. उस ने कई लोगों को चूना लगाया था. अजय ठाकुर नामक एक युवक से उस ने पीसीएस परीक्षा में चयन करवाने के नाम पर 10 लाख रुपए मांगे थे. उन्होंने उसे पेशगी के तौर पर 4 लाख रुपए दे भी दिए थे. लेकिन चयन के नाम पर बाबा टरकाने का काम करता रहा. इस के अलावा कई बड़े व्यापारियों को भी उस ने यह कह कर चूना लगाया था कि वह उन के किसी प्रोग्राम में शिल्पा शेट्टी को बुलवा देगा.

चूंकि शिल्पा और उन के परिवार के साथ उस के फोटोग्राफ थे, इसलिए लोग भरोसा कर लेते थे. पुलिस का कहना है कि देवेंद्र ने कई और लोगों को ठगने की प्लानिंग कर रखी थी. पुलिस इस बाबा को जेल भेज चुकी है. पुलिस कस्टडी में उस ने दावा किया कि वह रामदेव के ट्रस्ट पतंजलि से जुड़ा है. देवेंद्र कोई अकेला ठग नहीं है. समाज में ऐसे लोगों की भरमार है, जो धर्म के नाम पर लोगों को बहका कर अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं. जरूरत है ऐसे ठगों को पहचान कर उन से सावधान रहने की. Crime Story Hindi

 

UP Crime: रिश्तों पर लगा खून का दाग – बुआ ने भतीजी को टैंक में डुबोया

UP Crime: एक दिल दहला देने वाली वारदात ने रिश्तों की मर्यादा को चकनाचूर कर दिया. प्रेम संबंध के चलते एक महिला ने अपनी ही भतीजी की हत्या कर दी और भाभी पर जानलेवा हमला कर डाला. सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि बुआ का रिश्ता इतनी बेरहमी में बदल गया? आइए इस हत्याकांड की पूरी कहानी विस्तार से जानते हैं, जो आप को झकझोर कर रख देगी.

यह सनसनीखेज मामला उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के बसीकलां गांव से सामने आया है. यहां एक माना नाम की एक युवती ने पहले अपनी 4 साल की भतीजी को पानी के टैंक में डाल कर मौत के घाट उतार दिया. इस के बाद सो रही भाभी फिरदौस पर चाकू से कई वार किए. इस हमले में भाभी के बच्चे भी घायल हो गए.

बताया जा रहा है कि घटना से 2 दिन पहले आरोपी युवती माना ने अपनी भाभी को रास्ते से हटाने की योजना बनाई. उस ने रात के खाने में परिवार को नींद की गोलियां दे दीं, ताकि सभी गहरी नींद में सो जाएं. जब सब बेखबर थे, तब उस ने अपनी मासूम भतीजी इशारा को पानी के टैंक में डाल दिया, जहां दम घुटने से उस की मौत हो गई. इस के बाद उस ने गहरी नींद में सो रही भाभी फिरदौस पर चाकू से ताबड़तोड़ वार कर उसे गंभीर रूप से घायल कर दिया.

हमले के दौरान घर में मौजूद फिरदौस के 3 छोटे बच्चे भी चाकू लगने से जख्मी हो गए. चीखपुकार सुनकर ग्रामीण मौके पर पहुंचे तो उन्होंने देखा कि फिरदौस खून से लथपथ पड़ी है और उस की बेटी लापता है. तुरंत पुलिस को सूचना दी गई. पुलिस टीम, डाग स्क्वायड और फोरैंसिक टीम घटनास्थल पर पहुंची और घायलों को अस्पताल भेजा गया. हालत गंभीर होने पर महिला को मेरठ रेफर किया गया.

जब पुलिस ने घर की तलाशी ली तो पानी के टैंक से बच्ची का शव बरामद हुआ. इस के बाद शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया. इस के बाद पुलिस ने शक के आधार पर बुआ माना को हिरासत में लिया और सख्ती से पूछताछ की, जिस में उस ने अपना जुर्म कुबूल कर लिया.

पूछताछ में माना ने बताया कि गांव के एक युवक से उस का लंबे समय से प्रेम संबंध था. परिवार को जानकारी मिलने पर उस का रिश्ता कहीं और तय कर दिया गया. इसी बीच उस का प्रेमी नौकरी के सिलसिले में चेन्नई चला गया. जब भी वह चोरीछिपे उस से फोन पर बात करती, तो भाभी उसे टोकती थी. इसी रंजिश में उस ने यह खौफनाक साजिश रची. फिलहाल पुलिस ने आरोपी माना को गिरफ्तार कर लिया है और मामले की गहन जांच जारी है. UP Crime

Crime Story: कपूत की करतूत

Crime Story: करोड़पति बाप का बेटा अशोक अगर सीधी राह चलता तो ऐशोआराम की जिंदगी गुजार सकता था. लेकिन अपनी गलत आदतों के चलते पैसे की चाहत में उस ने अपने पिता की ही हत्या की सुपारी दे दी.

बासठ वर्षीय मामन जमींदार परिवार से थे, इसलिए इलाके के लोग उन का काफी सम्मान करते थे. इस उम्र में भी वह पूरी तरह स्वस्थ थे. इस की वजह यह थी कि वह बहुत ही अनुशासित जीवन जीते थे. वह हर रोज सुबह घर से काफी दूर स्थित पार्क में टहलने जाते थे और अपने हर मिलने वाले का कुशलक्षेम पूछते हुए 7, साढ़े 7 बजे तक घर लौटते थे.

2 नवंबर, 2014 की सुबह जब वह पार्क में टहल कर सवा 7 बजे घर लौट रहे थे तो गली में एक पल्सर मोटरसाइकिल उन के सामने आ कर इस तरह रुकी कि वह उस से टकरातेटकराते बचे. मोटरसाइकिल पर 2 युवक सवार थे. उन के चेहरों पर रूमाल बंधे थे. युवकों की यह हरकत मामन को नागवार गुजरी तो उन्होंने युवकों को डांटने वाले अंदाज में कहा, ‘‘यह कैसी बदतमीजी है, तुम्हारे मांबाप ने तुम्हें यह नहीं सिखाया कि बुजुर्गों से किस तरह पेश आना चाहिए?’’

‘‘सिखाया तो था, लेकिन हम ने सीखा ही नहीं,’’ मोटरसाइकिल चला रहे युवक ने हंसते हुए कहा, ‘‘ताऊ, हम ने तो एक ही बात सीखी है, पैसा लो और खेल खत्म कर दो.’’

‘‘क्या मतलब?’’ मामन ने हकबका कर पूछा.

मोटरसाइकिल पर पीछे बैठे युवक ने उतरते हुए कहा, ‘‘ताऊ मतलब बताने से अच्छा है, कर के ही दिखा दूं.’’

इसी के साथ उस ने हाथ में थामी गुप्ती निकाल कर मामन के पेट में घुसेड़ दी. चीख कर मामन जमीन पर बैठ गए. उस वक्त वह इस तरह घिरे थे कि भाग भी नहीं सकते थे. उन की चीख सुन कर कुछ लोग घरों से निकल आए. तभी मोटरसाइकिल पर सवार युवक ने पिस्तौल लहराते हुए धमकी दी, ‘‘अगर कोई भी नजदीक आया तो गोली मार दूंगा.’’

उस की इस धमकी से किसी की आगे आने की हिम्मत नहीं पड़ी. इस बीच वह युवक मामन पर गुप्ती से लगातार वार करता रहा. वह चीखते रहे, छटपटाते रहे. लेकिन वह उन्हें गुप्ती से तब तक गोदता रहा, जब तक उन की मौत नहीं हो गई. जब उसे लगा कि मामन मर चुके हैं तो वह कूद कर मोटरसाइकिल पर बैठ गया. उस के बाद मोटरसाइकिल पर सवार युवक तेजी से मोटरसाइकिल चलाता हुआ चला गया. मामन इलाके के जानेमाने और सम्मानित व्यक्ति थे. उन की हत्या की खबर पलभर में पूरे इलाके में फैल गई. जहां हत्या हुई थी, थोड़ी ही देर में वहां भारी भीड़ जमा हो गई. किसी ने इस घटना की सूचना फोन से थाना नरेला को दे दी.

इलाके के एक सम्मानित व्यक्ति की हत्या होने की सूचना से थाना नरेला की पुलिस तुरंत हरकत में आ गई. थाने से एएसआई राजेंद्र सिंह, महिला सिपाही मधुबाला, अभिमन्यु एवं बीट के सिपाहियों को तुरंत घटनास्थल पर भेजा गया. राजेंद्र सिंह ने घटनास्थल एवं शव का निरीक्षण कर के वहां एकत्र लोगों से पूछताछ की. इस के बाद औपचारिक काररवाई निपटा कर उन्होंने लाश को पोस्टमार्टम के लिए राजा हरिश्चंद्र अस्पताल भिजवा दिया.

थाना नरेला पुलिस की जांच का सिलसिला काफी लंबा चला. इस के बावजूद पुलिस न हत्या की वजह जान सकी और न हत्यारों का सुराग लगा सकी. मामन की हत्या जिन 2 युवकों ने की थी, उन्होंने चेहरों पर रूमाल बांध रखे थे, इसलिए हत्या के समय घटनास्थल पर मौजूद प्रत्यक्षदर्शी पुलिस को उन के बारे में कुछ भी नहीं बता सके थे. हां, किसी ने उस पल्सर मोटरसाइकिल का नंबर जरूर बता दिया था, जिस से दोनों हत्यारे भागे थे. पुलिस ने उस नंबर की मोटरसाइकिल के बारे में पता किया तो पता चला कि वह उत्तर प्रदेश के जिला बिजनौर की थी. उस के मालिक ने स्थानीय थाने में 1 नवंबर, 2014 को मोटरसाइकिल की चोरी की रिपोर्ट दर्ज करा रखी थी. बाद में 13 नवंबर, 2014 को वह नरेला के जंगल से बरामद हो गई थी.

दिल्ली के नरेला स्थित गांव बांकनेर के ममनीरपुर रोड पर मामन का आलीशान मकान था. उस इलाके में मामन के 5 अन्य मकान थे, जिन में तमाम किराएदार रहते थे. हर महीने किराए के रूप में उन्हें करीब 3 लाख रुपए मिलते थे. इस के अलावा उन के पास सैकड़ों एकड़ खेती की जमीन थी. साथ ही वह ब्याज पर पैसा देने का काम भी करते थे. ब्याज के भी उन्हें लाखों रुपए मिलते थे. मामन के परिवार में एक बेटा अशोक उर्फ चौटाला और एक बेटी सोनम थी. उन की पत्नी की मौत तब हो गई थी, जब बेटी 11 साल की और बेटा 14 साल का था. सयानी होने पर सोनम की शादी उन्होंने हरियाणा के सोनीपत निवासी सत्येंद्र से कर दी थी.

अशोक का विवाह उन्होंने दिल्ली के बसंतकुंज के रहने वाले हरिप्रसाद की बेटी रोशनी से किया था. लेकिन अशोक से रोशनी की पटरी नहीं बैठी. वह तलाक ले कर मायके में रहने लगी. अदालत के आदेश पर उसे हर महीने 20 हजार रुपए गुजाराभत्ता मिलता था, जिसे अशोक हर माह अदालत में जमा करता था. अशोक राजा हरिशचंद्र अस्पताल में सिक्युरिटी गार्ड की नौकरी करता था. मतभेदों के चलते मामन ने उसे घर से निकाल दिया था. वह मामन के बनवाए दूसरे मकान में अकेला रहता था.

मामन काफी मिलनसार थे. उन की किसी से कोई दुश्मनी नहीं थी. दुश्मनी होती भी कैसे, वह हर किसी के सुखदुख में खड़े रहते थे. किसी बीमार को इलाज के लिए पैसों की जरूरत होती अथवा किसी की बेटी की शादी होती तो वह बिना ब्याज के पैसा देते थे. जितनी हो सकती थी, मदद भी करते थे. इसी वजह से इलाके के लोग उन की इज्जत करते थे. ऐसे आदमी की किसी से ऐसी क्या दुश्मनी हो सकती थी, यह बात पुलिस समझ नहीं पा रही थी. थाना नरेला पुलिस ने अपने स्तर से काफी छानबीन की, लेकिन वह हत्यारों का सुराग नहीं लगा सकी. जब थाना पुलिस इस मामले में कुछ नहीं कर सकी तो 13 फरवरी, 2015 को यह मामला दिल्ली की अपराध शाखा को सौंप दिया गया.

अपराध शाखा के जौइंट कमिश्नर रविंद्र कुमार ने थाना नरेला पुलिस द्वारा की गई जांच का अध्ययन करने के बाद यह केस क्राइम ब्रांच के एडिशनल कमिश्नर अजय कुमार को सौंप दिया. अजय कुमार ने इस मामले की जांच के लिए क्राइम ब्रांच के डीसीपी राजीव कुमार के नेतृत्व में एक टीम बनाई, जिस में क्राइम ब्रांच के एसीपी जितेंद्र सिंह, इंसपेक्टर अशोक कुमार आदि को शामिल किया गया.

थाना नरेला पुलिस ने अपनी जांच की जो फाइल तैयार की थी, इंसपेक्टर अशोक कुमार ने उसे ध्यान से पढ़ा. उन्हें इस बात पर हैरानी हुई कि थाना पुलिस ने मामन , उन के बेटे अशोक, बेटी सोनम व सोनम के पति के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स निकलवा कर जांच करने की जहमत नहीं उठाई थी, जबकि आजकल तमाम केसों का खुलासा मोबाइल फोन से ही हो जाता है. अशोक कुमार ने तुरंत मृतक मामन, उन के बेटे अशोक उर्फ चौटाला, बेटी सोनम और उस के पति सत्येंद्र के मोबाइल नंबरों को सर्विलांस पर लगवाने के साथ उन के नंबरों की 1 नवंबर से 15 नवंबर, 2014 तक की काल डिटेल्स निकलवाई. उन्होंने तीनों की काल डिटेल्स को ध्यान से देखी तो मामन के बेटे अशोक उर्फ चौटाला की काल डिटेल्स में एक नंबर ऐसा मिला, जिस पर उन्हें संदेह हुआ.

अशोक उर्फ चौटाला ने उस नंबर पर 1 नवंबर, 2014 की सुबह, दोपहर, शाम और रात में फोन कर के काफी देर तक बातें की थीं. इस के अलावा इसी नंबर पर उस ने 2 नवंबर की सुबह 5 बजे, 11 बजे और शाम 6 बजे बातें की थीं. उसी दिन सुबह सवा 7 बजे मामन की हत्या हुई थी. इस के बाद अशोक उर्फ चौटाला की उसी नंबर पर 25 दिसंबर से ले कर 28 दिसंबर, 2014 तक कुल 13 बार बातें हुईं थीं. इस के बाद 13 जनवरी से ले कर 17 जनवरी, 2015 तक 8 बार बातें हुई थीं.

जिस नंबर पर बातें हुई थीं, वह नंबर रिलायंस का था. अशोक कुमार ने रिलायंस से इस नंबर के बारे में पता किया तो बताया गया कि वह नंबर उत्तर प्रदेश के जिला बिजनौर के रहने वाले नीतू उर्फ काला का है. हत्या में जिस मोटरसाइकिल का उपयोग हुआ था, वह भी बिजनौर की थी, इसलिए अशोक कुमार को लगा कि हत्या नीतू उर्फ काला ने ही की है. उन्होंने बिजनौर पुलिस से संपर्क कर के नीतू उर्फ काला के बारे में जानकारी मांगी तो पता चला कि 26 वर्षीय नीतू उर्फ काला पेशेवर अपराधी है. उस के खिलाफ उत्तर प्रदेश और हरियाणा के अनेक थानों में लूट, हत्या, हत्या की कोशिश और रंगदारी के कई मुकदमे दर्ज थे. काला कई बार जेल भी जा चुका था. उस समय वह जमानत पर छूटा हुआ था. बिजनौर पुलिस ने उसे जिला बदर कर रखा था.

जब अशोक उर्फ चौटाला पूरी तरह संदेह के घेरे में आ गया तो अशोक कुमार ने अपने कुछ मुखबिर मामन के बेटे अशोक के पीछे लगा दिए. आखिर एक दिन उन्हें किसी मुखबिर से पता चला कि अशोक की शराब के ठेके पर 2 लोगों से झड़प हो रही थी. वे लोग उस से अपने पैसे मांग रहे थे, जो अशोक ने हत्या के एवज में देने का वादा किया था. इस के बाद अशोक कुमार ने उन दोनों लोगों के बारे में पता किया तो जानकारी मिली कि वे दोनों नीतू उर्फ काला और हरियाणा के सोनीपत का रहने वाला सुपारी किलर जितेंद्र उर्फ टिंकू थे. यह भी जानकारी मिली कि जितेंद्र काला का जिगरी दोस्त है. उस पर भी हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश में कई संगीन अपराधों के मुकदमे दर्ज हैं. ये दोनों मिल कर अपराध करते हैं.

इस के बाद अशोक कुमार ने अपनी टीम के साथ हर उस जगह छापा मारा, जहां काला और टिंकू मिल सकते थे. लेकिन वे कहीं नहीं मिले. अलबत्ता इस काररवाई में यह जरूर पता चला कि टिंकू दिल्ली के छावला स्थित गांव ख्याला खुर्द में किराए का मकान ले कर रहता है, जबकि काला दिल्ली के नरेला के सैक्टर ए-6 के पौकेट 1 में मकान नंबर 167 में किराए पर रहता है. लेकिन दोनों वहां भी नहीं मिले. इसी बीच पुलिस को पता चला कि मृतक मामन के बेटे अशोक ने 90 लाख में 2 एकड़ जमीन बेची है.

मामन का बेटा शक के दायरे में आया था तो अशोक कुमार ने उन की बेटी सोनम के सोनीपत स्थित घर जा कर पूछताछ की थी. इस पूछताछ में उन्होंने जरा भी यह जाहिर नहीं होने दिया था कि उन्हें उस के भाई पर शक है. उन का पहला सवाल था, ‘‘तुम्हारे पिता की किसी से ऐसी कोई दुश्मनी तो नहीं थी, जिस की वजह से उन की हत्या की गई हो?’’

‘‘पापा बहुत अच्छे इंसान थे,’’ सोनम ने कहा, ‘‘वह हर किसी के दुखसुख में खड़े रहते थे. भला ऐसे आदमी की किसी से क्या दुश्मनी हो सकती थी?’’

‘‘फिर भी उन की हत्या हो गई. हत्या की कोई तो वजह होगी? तुम्हारे ख्याल से क्या वजह हो सकती है?’’ अशोक कुमार ने पूछा.

सोनम कुछ क्षण सिर नीचा किए बैठी रही. उस के बाद गहरी सांस ले कर बोली, ‘‘क्या कहूं सर, मेरे ख्याल से पापा की हत्या संपत्ति की वजह से हुई है. मेरा भाई बहुत ज्यादा लाड़प्यार की वजह से बिगड़ गया था. वह अय्याश और नशेबाज है. जुआ भी खेलता है. उस की इन गलत आदतों की वजह से पापा ने उसे और उस की पत्नी को अलग मकान दे कर घर से निकाल दिया था. कोई कारोबार करने के लिए उसे 6-7 लाख रुपए भी दिए थे. भाई ने कारोबार करने के बजाय वे रुपए अपने गलत शौकों में उड़ा दिए. उस के बाद वह लोगों से कर्ज ले कर खर्च करता रहा. पता चला है कि इस समय एक करोड़ के करीब कर्ज है. कर्ज देने वाले उसे परेशान कर रहे थे.’’

‘‘तुम्हारे कहने का मतलब है कि तुम्हारे भाई ने पिता की हत्या कराई है?’’

‘‘मुझे तो ऐसा ही लगता है.’’

‘‘तुम्हारे पिता के पास कितनी संपत्ति होगी?’’

‘‘कई मकान, सैकड़ों एकड़ जमीन, करोड़ों का बैंक बैलेंस. कुल मिला कर सौ करोड़ से ज्यादा की संपत्ति होगी.’’

‘‘इतनी संपत्ति के लिए तो तुम भी पिता की हत्या करवा सकती हो?’’

‘‘मैं पापा की हत्या क्यों कराऊंगी. सारी संपत्ति तो वैसे ही वह मेरे नाम करने जा रहे थे.’’

‘‘यह बात तुम्हारे भाई को पता थी?’’

‘‘जी पता थी. इस बात को ले कर वह अकसर पापा और मुझ से झगड़ा भी करता रहता था. पापा ने उस से कह भी दिया था कि वह उसे एक पैसा नहीं देंगे.’’

इस के बाद उन्होंने अशोक उर्फ चौटाला की तलाकशुदा पत्नी रोशनी के घर जा कर पूछताछ की थी. रोशनी ने बताया था कि अशोक शराबी, जुआरी, बाजारू औरतों के पास जा कर मुंह काला करने वाला बदतमीज इंसान है. ऐसे आदमी के साथ कौन औरत गुजारा कर सकती है. परेशान हो कर उस ने भी तलाक ले लिया. उस के ससुर बहुत अच्छे आदमी थे. अपने गलत शौक पूरे करने के लिए अशोक उन से पैसे मांगता था. पैसे न मिलने पर वह उन के साथ गालीगलौज करता था. कई बार उस ने उन्हें जान से मरवाने की धमकी भी दी थी. जरूर उसी ने उन की हत्या कराई होगी.

अशोक कुमार ने ये सारी बातें एसीपी जितेंद्र सिंह को बताईं तो उन्होंने तुरंत अशोक उर्फ चौटाला को हिरासत में लेने का आदेश दे दिया. इस के बाद 22 सितंबर, 2015 को अशोक कुमार की टीम अशोक उर्फ चौटाला को हिरासत में ले कर नेहरू प्लेस स्थित थाना क्राइम ब्रांच ले आई, जहां उस से मनोवैज्ञानिक तरीके से पूछताछ की जाने लगी. पुलिस के पास उस के खिलाफ सारे सबूत थे ही, मजबूरन उसे अपना अपराध स्वीकार कर के सच बताना पड़ा.

इस के बाद पुलिस टीम ने अशोक उर्फ चौटाला की निशानदेही पर जितेंद्र उर्फ टिंकू और नीतू उर्फ काला को भी दिल्ली के छावला इलाके से गिरफ्तार कर लिया. पुलिस ने 23 सितंबर, 2015 को तीनों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर के अदालत में पेश किया, जहां से पूछताछ के लिए तीनों को एक दिन के पुलिस रिमांड पर लिया गया. रिमांड के दौरान पुलिस ने नीतू और टिंकू की निशानदेही पर गांव ख्याला खुर्द के एक बाग से हत्या में प्रयुक्त गुप्ती बरामद कर ली. रिमांड खत्म होने पर तीनों को 24 सितंबर, 2015 को पुन: अदालत में पेश किया गया, जहां से सभी को जेल भेज दिया गया.

हत्याभियुक्तों के बयान के आधार पर मामन की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह कुछ इस तरह थी: मामन पुश्तैनी रईस थे, लेकिन वह उन रईसों में नहीं थे, जो विरासत में मिली धनसंपत्ति से ऐश करते हैं. उन्होंने पुरखों से मिली धनसंपत्ति का सदुपयोग करते हुए उस में इजाफा ही किया था. उन की पत्नी की मौत तभी हो गई थी जब बेटा अशोक 14 साल का और बेटी सोनम 11 साल की थी. लोगों के कहने पर भी उन्होंने दूसरी शादी नहीं की थी और बच्चों को खुद ही पालने लगे थे. अधिक लाड़प्यार की वजह से बेटा अशोक बिगड़ गया था.

गलत संगत की वजह से वह किशोरावस्था से ही गंदी आदतों का शिकार हो गया. पिता से उसे मनचाहा जेब खर्च मिलता ही था, इसलिए उस के तमाम दोस्त भी थे. उन के साथ वह नशा करता, जुआ खेलता और बाजारू लड़कियों के साथ अय्याशी करता. इन बातों की जानकारी जब मामन को हुई तो उन्होंने अशोक को जेब खर्च देना बंद कर दिया. लेकिन अब तक अशोक पूरी तरह बिगड़ चुका था. पैसे न मिलने पर वह घर में चोरी करने लगा. अब तक वह 24 साल का हो चुका था. मामन ने सोचा कि अगर उस का विवाह कर दें तो जिम्मेदारी पड़ने पर शायद वह सुधर ही जाए.

उन्होंने अशोक का विवाह रोशनी से कर दिया. लेकिन वह नहीं सुधरा. वह पहले की ही तरह शराब पीता और बाजारू औरतों के पास जाता. पत्नी उसे रोकती तो वह उस के साथ मारपीट करता. तंग आ कर मामन ने अशोक को घर से निकाल दिया. उसे और उस की पत्नी के रहने के लिए दूसरा मकान दे दिया. वह कोई कामधंधा कर सके, इस के लिए उसे 7 लाख रुपए भी दिए. अशोक चाहता तो इतने से अपनी गृहस्थी चला सकता था. लेकिन उस ने कामधंधा करने के बजाय सारे रुपए अपनी गंदी आदतों में उड़ा दिए.

पति की गलत आदतों और रोजरोज की मारपीट से तंग आ कर रोशनी पति का साथ छोड़ कर मायके में रहने लगी थी. साथ ही उस ने तलाक का मुकदमा भी दायर कर दिया. उन दिनों अशोक राजा हरिश्चंद्र अस्पताल में गार्ड की नौकरी करता था. अदालत में तलाक का मुकदमा चला और सन् 2010 में अदालत ने निर्णय दिया कि अशोक रोशनी को हर महीने 20 हजार रुपए गुजाराभत्ता देगा. अशोक को जो वेतन मिलता था, उस से उस का ही खर्च पूरा नहीं होता था. इसलिए वह लोगों से रुपए उधार ले कर अपने शौक पूरा करता था. धीरेधीरे उस पर 70 लाख रुपए का कर्ज हो गया था.

जब काफी दिन हो गए तो कर्ज देने वाले उस से अपना रुपया मांगने लगे. इसी बीच अशोक को अस्पताल की एक नर्स से प्यार हो गया. पैसे न होने की वजह से वह उस की फरमाइशें पूरी नहीं कर पा रहा था. वह उस नर्स से शादी करना चाहता था. कर्ज चुकाने और शादी के लिए उसे पैसे चाहिए थे. इस के लिए वह पिता से मिला और उन से 2 करोड़ रुपए मांगे. मामन ने उसे लताड़ते हुए कहा, ‘‘2 करोड़ तो क्या, मैं तुम्हें 2 पैसे भी नहीं दूंगा. मैं ने सोच लिया है कि मेरा बेटा मर चुका है. तुम से अब मेरा कोई संबंध नहीं है. आइंदा तुम मुझ से मिलने भी मत आना.’’

अक्टूबर, 2014 में अशोक को एक वकील के जरिए पता चला कि मामन उसे अपनी संपत्ति से बेदखल कर के सारी संपत्ति सोनम के नाम करवा रहे हैं. यह जान कर अशोक क्रोध में पागल हो उठा और शराब पी कर मामन के पास पहुंच गया. जब वह उन से गालीगलौज करने लगा तो मामन ने उसे दुत्कारते हुए कहा, ‘‘मैं ने तो पहले ही कहा था कि मेरा कोई बेटा नहीं है. था भी तो मैं ने उसे मरा मान लिया है. मेरी संपत्ति में अब तुम्हारा कोई हक नहीं है.’’

‘‘मैं तुम्हें सारी प्रौपर्टी सोनम के नाम नहीं करने दूंगा.’’

‘‘क्या करेगा तू…?’’ मामन चीखे.

‘‘तुम्हें जिंदा नहीं रहने दूंगा.’’

‘‘धमकी देता है मुझे.’’

‘‘धमकी नहीं, सच कह रहा हूं. अगर तुम ने आधी संपत्ति मेरे नाम नहीं की तो मैं तुम्हें मरवा दूंगा. मेरी समझ में यह नहीं आता कि तुम वक्त से पहले क्यों मरना चाहते हो?’’

‘‘निकल जा यहां से.’’

‘‘इस का मतलब तुम नहीं मानोगे. तो ठीक है, मरने की तैयारी कर लो. लेकिन एक बार और सोच लेना. मरने के बाद क्या ले जा सकोगे यहां से. तुम्हारी मौत के बाद सबकुछ मेरा और सोनम का ही होगा.’’

‘‘जीतेजी मैं तुझे एक पैसा नहीं दूंगा.’’

‘‘यानी तुम ने मरने का फैसला कर लिया है. चलता हूं, अब हम जीते जी कभी नहीं मिलेंगे.’’ हंसता हुआ अशोक चला गया.

अशोक नरेला सैक्टर ए-6 में रहने वाले नीतू उर्फ काला को जानता था. उसे पता था कि काला सुपारी किलर है. वह काला से मिला और उसे 20 लाख रुपए में पिता के कत्ल की सुपारी दे दी. उस ने कर्ज ले कर एडवांस के रूप में उसे 14 लाख रुपए दे भी दे दिए. बाकी रकम उस ने काम होने के 2-3 महीने बाद जमीन बेच कर देने को कहा. नीतू उर्फ काला ने अपने आपराधिक सहयोगी जितेंद्र उर्फ टिंकू के साथ मिल कर मामन के कत्ल की योजना बनाई. दोनों ने कई दिनों तक मामन की गतिविधियों पर नजर रखी. मामन को ठिकाने लगाने के लिए उसे सुबह का समय ठीक लगा. दोनों ने बिजनौर से एक मोटरसाइकिल चोरी की और हत्या के लिए एक गुप्ती भी वहीं से खरीदी.

योजना के अनुसार, 2 नवंबर, 2014 की सुबह दोनों ने चोरी की मोटरसाइकिल से मामन का पीछा किया और गुप्ती से गोद कर उन की हत्या कर दी. उन्होंने मोटरसाइकिल वहीं जंगल में छोड़ दी और हरियाणा चले गए. इस के बाद वे जबतब अशोक से फोन पर बात करते रहे. जब दोनों को पता चला कि अशोक ने 2 एकड़ जमीन 90 लाख रुपए में बेची है तो उन्होंने फोन कर के अपनी बकाया रकम मांगी. लेकिन अशोक ने 70 लाख रुपए का कर्ज अदा करने के बाद जो पैसे बचे थे, उन्हें अय्याशी में खर्च कर दिए थे.

बकाया रकम के लिए दोनों की अशोक से अकसर झड़प होती रहती थी. नीतू और टिंकू को जब पता चला कि अशोक के नाम पिता की आधी संपत्ति होने वाली है और वह करोड़ों की है तो वे उस से 4 करोड़ रुपए मांगने लगे. रकम न देने पर वे उसे पुलिस से सच्चाई बताने की धमकी दे रहे थे. एक दिन जब नरेला स्थित शराब के ठेके पर नीतू और टिंकू की अशोक से झड़प हो रही थी, तभी वहां मौजूद मुखबिर ने उन की बातें सुन ली थीं. उस के बाद उस ने सारी बातें अशोक कुमार को बता दी थीं. इस तरह मामन की हत्या का राज खुल गया और हत्यारे पकड़े गए. Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित है.

Cyber Crime: एमबीए ठगों का जाल

Cyber Crime: रेहान के पास एमबीए की डिग्री थी. वह कोई अच्छी नौकरी या काम कर सकता था, लेकिन उस के फितरती दिमाग में इंटरनेट के जरिए लोगों को ठगने का ऐसा आइडिया आया, जिस ने उसे साथियों के साथ जेल पहुंचा दिया. समाज में ऐसे युवाओं की कमी नहीं है, जो आधुनिकता की चकाचौंध से प्रभावित हो कर बहुत कम समय में सफलताओं की इमारत खड़ी करने के सपने देखते हैं. वे सोचते हैं कि उन के पास सभी भौतिक सुविधाएं और ढेर सारी दौलत हो. महत्त्वाकांक्षाओं की हवाएं जब उन के दिलोदिमाग में सनसनाती हैं तो सोच खुदबखुद इस की गुलाम हो जाती है. सोच की यह गुलामी उन्हें इसलिए बुरी भी नहीं लगती, क्योंकि इस से उन्हें ख्वाबों में कल्पनाओं के खूबसूरत महल नजर आने लगते हैं. रिहान भी कुछ ऐसी ही सोच का शिकार था.

एमबीए पास कंप्यूटर एक्सपर्ट रिहान का ख्वाब था कि किसी भी तरह उस के पास इतनी दौलत आ जाए कि जिंदगी ऐशोआराम से बीते. यह कैसे हो, इस के लिए वक्त के दरिया में तैराकी करते हुए वह दिनरात अपने दिमाग को दौड़ाता रहता था. कुछ विचार उसे सही नजर आए, मगर उन विचारों को क्रियान्वित करने के लिए पैसों की जरूरत थी, जो उस के पास नहीं थे. क्योंकि वह बेरोजगारी की गर्दिश झेल रहा था. लिहाजा उन विचारों का उस के लिए कोई महत्त्व नहीं रहा.

फिलहाल उस के सामने सब से बड़ी समस्या पैसों की थी, इसलिए वह अपने लिए सही नौकरी तलाशने लगा. इस के लिए उस ने कई जगह हाथपैर मारे, लेकिन जब उसे मन मुताबिक नौकरी नहीं मिली तो उस ने सन 2014 में एक फाइनैंस कंपनी में नौकरी कर ली. यह कंपनी लोगों को विभिन्न बैंकों से लोन दिलाने का काम करती थी. इस के बदले वह लोन लेने वालों से तयशुदा कमीशन लेती थी.

रिहान उत्तर प्रदेश के मेरठ शहर स्थित कोतवाली क्षेत्र की पुरानी तहसील मोहल्ले का रहने वाला था. उस के पिता अख्तर नवाज का कई सालों पहले इंतकाल हो गया था. पति की मौत के सदमे में मां का साया भी उस के सिर से उठ गया. रिहान उन का एकलौता बेटा था. बाद में उस के चाचा मजहर ने न सिर्फ उस की परवरिश की, बल्कि उन्होंने उसे बेहतर तालीम भी दिलाई. रिहान लंबातगड़ा, आकर्षक कदकाठी का युवक था. उस का लाइफस्टाइल भी आधुनिक था. वह जितना कमाता था, उस से उस के महंगे शौक भी मुश्किल से पूरे होते थे. महत्त्वाकांक्षी होने के साथसाथ वह तेजतर्रार भी था.

जिस फाइनैंस कंपनी में वह नौकरी कर रहा था, वहां काम करतेकरते उसे यह बात समझ में आ गई थी कि यह कंपनी पाकसाफ काम नहीं करती, बल्कि लोगों को सपनों में उलझा कर उन के साथ ठगी करती है. एक दिन औफिस में उस के सामने जो वाकया पेश आया, उस से इस बात की पुष्टि तो हो ही गई, साथ ही उसे भी कुछ ऐसा ही काम करने की प्रेरणा मिल गई.

दरअसल, एक दिन औफिस में एक ग्राहक आ कर झगड़ने लगा. लोन पास कराने के लिए उस ने कंपनी को 25 हजार रुपए फाइल खर्च व अन्य खर्चों के नाम पर जमा कर दिए थे. इस के बावजूद भी कंपनी वाले उसे लोन नहीं दिला रहे थे. इस के लिए वह पहले भी कई बार औफिस के चक्कर लगा चुका था, लेकिन उस दिन वह गुस्से में दिखाई पड़ रहा था. औफिस में आते ही वह रिसैप्शनिस्ट के सामने पड़ी कुरसी पर बैठ गया. फिर उस से मुखातिब होते हुए बोला, ‘‘आज तो मैं कुछ फैसला कर के ही जाऊंगा. पैसे लेने के बावजूद भी मुझे लोन नहीं दिलाया जा रहा, मेरा काम नहीं हो रहा है तो मेरे पैसे वापस करो.’’

उस के तीखे तेवर देख कर रिसैप्शनिस्ट ने उसे समझाने की नाकाम कोशिश की, ‘‘सर, हम कोशिश कर रहे हैं.’’

इस पर वह और भी भड़क गया, ‘‘कोशिश तो आप कई महीनों से कर रहे हैं. बताओ उस का क्या नतीजा निकला? आप को पता है मैं पंजाब से यहां आताजाता हूं. कितने पैसे तो मैं किराए में ही खर्च कर चुका हूं, लेकिन आप लोग मेरी बात को समझ ही नहीं रहे.’’

शोर सुन कर रिहान भी वहीं आ कर खड़ा हो गया था. ग्राहक को समझाते हुए रिसैप्शनिस्ट बोली, ‘‘सौरी सर, आज तो बौस यहां नहीं हैं.’’

यह सुन रिहान को झटका लगा, क्योंकि कंपनी का बौस तो उस समय औफिस में बने अपनी केबिन में ही था.

रिसैप्शनिस्ट की बात से नाराज ग्राहक सख्ती से बोला, ‘‘मैं आज यहां से जाने वाला नहीं हूं. आप उन्हें अभी फोन मिलाइए और पूछिए कि मेरे पैसे कब मिलेंगे?’’

‘‘ओके सर,’’ उस के अडि़यल रुख को देखते हुए रिसैप्शनिस्ट ने तुरंत ही टेबल पर रखे टेलीफोन का स्पीकर औन कर के एक नंबर डायल कर दिया. तभी दूसरी तरफ से आवाज आई, ‘उपभोक्ता का मोबाइल अभी स्विच औफ है. कृपया थोड़ी देर बाद डायल करें.’ इस के बाद रिसैप्शनिस्ट उस ग्राहक से शांत लहजे में बोली, ‘‘सर, आप फिर कभी आइए, अभी तो सर से बात नहीं हो पा रही है. मैं आप के सामने ही नंबर मिला रही हूं. उन का मोबाइल अभी बंद है.’’

‘‘ओजी ठीक है. मैं फिर आऊंगा और अब की बार अपने पैसे ले कर ही जाऊंगा.’’ खड़े होते हुए वह पंजाबी लहजे में बोला और गुस्से से पैर पटकता हुआ औफिस से निकल गया.

यह सब देख कर रिहान सोच में पड़ गया. इस की वजह भी थी क्योंकि कंपनी के बौस उस समय औफिस में ही थे और दूसरे उन का मोबाइल कभी बंद ही नहीं रहता था. इस बात को भी वह अच्छी तरह से जानता था. जिज्ञासावश उस ने रिसैप्शनिस्ट से पूछा, ‘‘मैडम, बौस का मोबाइल तो कभी बंद नहीं रहता, फिर यह सब…’’

उस की बात पर पहले वह खिलखिला कर हंसी, फिर रहस्यमय अंदाज में बोली, ‘‘रिहान अभी तुम नहीं समझोगे ये सब बातें.’’

‘‘मतलब… अब तो मैडम आप को बताना ही होगा.’’ रिहान ने जिद की.

उस की जिद पर रिसैप्शनिस्ट ने टेबल पर रखे फोन की तरफ इशारा करते हुए बताया, ‘‘रिहान, जब हम इस से बौस का नंबर डायल करते हैं तो हमेशा यही संदेश सुनने को मिलेगा. दरअसल बौस ने अपने मोबाइल में औटोमैटिक सौफ्टवेयर डाला हुआ है. ऐसे ग्राहकों से पीछा छुड़ाने के लिए यही तरीका अपनाना पड़ता है.’’

इन सब बातों से रिहान का दिमाग घूम गया. वह तुरंत एक फाइल के बहाने बौस के केबिन में दाखिल हुआ. उस समय बौस फोन से किसी से बातें कर रहे थे. अब उसे पक्का विश्वास हो गया कि रिसैप्शनिस्ट जो कह रही थी, बिलकुल सच था. उस दिन के बाद रिहान ने कंपनी के काम को और भी जिज्ञासा से समझना शुरू कर दिया. कुछ ही दिनों में पूरी तरह उस की समझ में आ गया कि कंपनी वास्तव में लोगों को लोन दिलाने का ख्वाब दिखा कर ठगी का धंधा करती है. उस के दिमाग में विचार आया कि जिस तरह से यह कंपनी लोगों को बेवकूफ बना कर पैसे ठग रही है, इसी तरह से वह भी लाखों रुपए कमा सकता है.

कंपनी जिस तरह से लोगों को झांसे में लेती थी, उस तरीके को वह यहां काम करते हुए अच्छी तरह से जान गया था. वह इस काम की बारीकियों को भी समझ चुका था. इस कंपनी में सैयद बिलाल उर्फ समी मलिक व अब्दुल बारी भी नौकरी करते थे. ये दोनों युवक भी मेरठ के ही रहने वाले थे. सैयद बिलाल तो उसी की तरह एमबीए पास था. रिहान के पास भी ऊंची तालीम थी. वह चाहता तो कोई अच्छी नौकरी या व्यवसाय कर सकता था, लेकिन उस का दिमाग गलत दिशा में दौड़ने लगा. उस ने मन ही मन सोच लिया कि वह भी अपनी खुद की ऐसी कंपनी खड़ी कर के करोड़ों रुपए कमाएगा.

इस मुद्दे पर रिहान अपने साथियों सैयद बिलाल और अब्दुल बारी से बात की तो वे भी उस का साथ देने के लिए तैयार हो गए. जल्दी ही ज्यादा पैसे कमाने के लालच में तीनों ने एक साथ उस फाइनैंस कंपनी से नौकरी छोड़ दी. लोगों को कंपनी के जाल में उलझाया जा सके, इस के लिए इंटरनेट वेबसाइट का रजिस्ट्रेशन जरूरी था. कंपनी को चूंकि धंधा ही ठगी का करना था, इसलिए वे रजिस्ट्रेशन अपने असली नाम से नहीं कराना चाहते थे.

रिहान ने आकाश शिंदे के नाम से फरजी प्रमाणपत्र बनवाए और उन के माध्यम से एडिशन कारपोरेशन फाइनैंस डौट काम नाम की वेबसाइट बनवाई. इस के बाद उन्होंने शहर के वैस्टर्न कचहरी मार्ग पर कंपनी का एक औफिस भी खोल लिया. औफिस में उन्होंने जरूरी स्टाफ भी रख लिया. यह जनवरी, 2015 की बात थी. उन्होंने वेबसाइट पर दावा किया कि कंपनी विभिन्न बैंकों से हर तरह के लोन दिलाती है. कंपनी का सब से आकर्षक औफर न्यूनतम 4 प्रतिशत ब्याज दर पर लोन दिलाने का था. समाज में ऐसे जरूरतमंद लोगों की कमी नहीं, जिन्हें लोन की जरूरत रहती है. कंपनी की वेबसाइट पर फरजी नामों से लिए गए मोबाइल नंबर भी दिए गए थे.

उन्होंने वेबसाइट पर योजनाबद्ध तरीके से प्रचार किया था. इस का नतीजा यह हुआ कि कुछ ही दिनों में उन के पास लोगों के फोन आने शुरू हो गए. फोनकर्त्ताओं से बेहद लुभावनी बातें की जातीं. उन से कहा जाता कि उन की कंपनी खुद भी लोन देती है और बैंकों से भी दिलाती है. चूंकि बैंकों के साथ उन का करार है, इसलिए उन के माध्यम से बैंक सस्ती ब्याज दरों पर लोन पास कर देती हैं. इन्हीं चिकनीचुपड़ी बातों में लोग फंसते गए. वे लोगों से फाइल चार्ज के नाम पर 5 से 25 हजार रुपए वसूलने लगे. लोगों को चूंकि बिना सख्त नियमों और आधेअधूरे कागजों के साथ मनचाहा लोन मिल जाने की उम्मीद होती थी, लिहाजा वह खुशीखुशी पैसे दे देते थे.

सपनों को बेचने का रिहान का यह धंधा ऐसा चमका कि उस की दुनिया ही बदल गई. फाइल चार्ज के नाम पर ही उन्होंने लाखों रुपए कमा लिए. इस के बाद उन्होंने धीरेधीरे कंपनी का नेटवर्क दूसरे राज्यों में फैलाना शुरू कर दिया. रिहान ने फरजी पहचानपत्रों के आधार पर बैंकों में भी खाते खुलवा लिए थे. उन्हीं खातों में वे लोगों से रकम जमा करवाते थे. उन्होंने जो वेबसाइट बनवाई थी, उस पर कंपनी का पता नहीं दिया था. वे फोन पर ही लोगों से बातें करते थे. उन की पूरी कोशिश यही होती थी कि पूरी काररवाई इंटरनेट के जरिए ही हो.

वे नजदीकी राज्यों के लोगों के बजाय उड़ीसा, राजस्थान, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गुजरात, पंजाब, छत्तीसगढ़, आसाम, पश्चिमी बंगाल, आंध्र प्रदेश, बिहार आदि प्रदेशों के लोगों को ही अपने झांसे में लेने की कोशिश करते थे, ताकि ठगे जाने के बाद वे उन के औफिस के ज्यादा चक्कर न लगा सकें. जिस शख्स के ये पैसे ठगते, वह शख्स बारबार इन के पास फोन करता तो वे अपने फोन नंबर बदल देते थे. ठगी का अहसास होने के बावजूद कोई चाहते हुए भी इन के औफिस नहीं आ पाता था, क्योंकि औफिस उन के यहां से काफी दूर था और जो कोई इन के औफिस में कभी आ भी जाता तो उसे कोई न कोई बहाना बना कर चलता कर दिया जाता था. जो लोग इन के ऊपर ज्यादा दबाव बनाते थे, उन में से जिन लोगों के बैंक में दिए जाने वाले कागजात पूरे होते थे, उन का लोन पास करा देते थे.

धंधे में चमक आई तो उन्होंने समाचार पत्रों में भी विज्ञापन देने शुरू कर दिए. इस का भी उन्हें फायदा मिला. कंपनी का धंधा बढ़ने पर उन्होंने कई बैंकों में फरजी नामपतों पर एक दरजन से ज्यादा खाते खुलवा लिए. वे अलगअलग राज्यों के लोगों को पैसा जमा करने के लिए अलगअलग खाता नंबर देते थे. पैसे जमा होते ही वे तुरंत एटीएम कार्ड से निकाल लेते थे. ग्राहकों को उन के काम पर भरोसा रहे, इसलिए दिखावे के लिए वे अलगअलग राज्यों के स्टांप पेपर और बैंकों के फरजी चैक टेबल रखते थे. जिन्हें दिखा कर वे ग्राहकों को आश्वस्त करते थे कि कई ग्राहकों के चेक उन के यहां तैयार रखे हैं.

औफिस को उन्होंने इस ढंग से सुसज्जित किया था, जिस से लगे कि यह कोई बड़ी लोन कंपनी का औफिस है.

इस बीच उन्होंने एक टेलीफोन कंपनी से सिम कार्ड बिक्री के लिए भी अनुबंध कर लिया. स्टाफ रखने में वे अधिकांश लड़कियों को प्राथमिकता देते थे, ताकि कोई ग्राहक उन से ज्यादा लड़ेझगड़े नहीं.

एक दिन 3 लोग कंपनी के औफिस पहुंचे. देखने और पहनावे से वे गुजराती लग रहे थे. रिसैप्शनिस्ट के पास पहुंचते ही एक ने कहा, ‘‘हमें प्रौपर्टी के लिए लोन चाहिए. हम लोग बहुत दूर से आए हैं.’’

‘‘आप लोग कहां से आए हैं?’’ रिसैप्शनिस्ट बोली.

‘‘जी गुजरात से.’’ उन में से एक आदमी बोला.

‘‘कितना लोन चाहिए आप को?’’ रिसैप्शनिस्ट ने पूछा.

‘‘5 करोड़.’’ उस शख्स ने कहा तो रिसैप्शनिस्ट थोड़ा चकरा गई.

‘‘इतना बड़ा लोन. इस का फाइल चार्ज भी काफी लगेगा.’’ वह बोली.

‘‘कोई बात नहीं मैडम, जो भी चार्ज होगा हम देने को तैयार हैं.’’ कहने के साथ ही उस शख्स ने जेब में हाथ डाल कर 50 हजार रुपए की गड्डी निकाल कर रिसैप्शनिस्ट के सामने रख दी.

तभी रिसैप्शनिस्ट बोली, ‘‘नहींनहीं, अभी रहने दीजिए, यह तो बाद में जमा करना होगा. आप रुकिए, मैं आप को बौस से मिलवाती हूं.’’ कह कर वह केबिन में चली गई. इस के बाद उन तीनों गुजरातियों को भी बौस के औफिस में ले गई. उस केबिन में रिहान और बिलाल बैठे थे. उन दोनों को जब पता चला कि मोटे लोन के लिए वे लोग गुजरात से उन के पास आए हैं तो वे बहुत खुश हुए. लोन लेने के लिए जो लोग आए थे, उन्होंने यह भी बता दिया था कि उन के कुछ पेपर कम पड़ सकते हैं.

बिलाल को जब विश्वास हो गया कि पार्टी पक्की है तो वह बोला, ‘‘पेपरों की आप फिक्र न करें, उन्हें हम पूरे करा देंगे. लेकिन पेपर तैयार करने से पहले आप को फाइल चार्ज वगैरह के पैसे पहले जमा कराने होंगे.’’

‘‘ठीक है, आप जितना बोलेंगे हम कर जमा कर देंगे.’’ उन में से एक ने कहा.

बिलाल ने उन्हें एक सप्ताह के बाद अपने पेपरों के साथ आने को कहा. इस के बाद वे चले गए.

इसी बीच 2 नवंबर, 2015 को उन की कंपनी की वेबसाइट अचानक बंद हो गई. रिहान ने पहले इसे इंटरनेट व कंप्यूटर का कोई टैक्निकल फौल्ट समझा. कई घंटे बाद भी जब वह नहीं चली तो वे समझ गए कि यह वेब निर्माता कंपनी के स्तर से बंद हुई है. तब रिहान ने वेब निर्माता कंपनी के औफिस फोन किया. उन्होंने भी इसे टैक्निकल दिक्कत बताया.

वेबसाइट चल पाती, उस से पहले ही 3 नवंबर को पुलिस वहां दनदनाती हुई पहुंच गई. पुलिस को देख कर औफिस में बैठे सभी लोगों के होश फाख्ता हो गए. पुलिस टीम में वे लोग भी शरीक थे, जो गुजराती क्लाइंट बन कर उन के पास आए थे. रिहान समझ गया कि उस का खेल खत्म हो चुका है. पुलिस ने मौके से रिहान, बिलाल व अब्दुल बारी को गिरफ्तार कर लिया. औफिस की तलाशी ली गई तो वहां से 3 लैपटौप, 6 मोबाइल फोन, 2 लैंडलाइन फोन, 18 एटीएम कार्ड, 2 शौपिंग कार्ड, 6 पैन कार्ड, आधार कार्ड, 15 चैकबुक, विभिन्न राज्यों के लोगों के भरे हुए करीब साढ़े तीन सौ फार्म, 21 छोटीबड़ी मोहरें, कई राज्यों के स्टांप पेपर व अन्य कागजी सामग्री मिली.

पुलिस आरोपियों को बरामद सामान के साथ थाना सिविल लाइंस ले आई और उन से पूछताछ की. पूछताछ के दौरान उन्होंने इंटरनेट के जरिए ठगी का अपना सारा खेल पुलिस को बता दिया. पुलिस ने बेहद चतुराई से उन पर शिकंजा कसा था. दरअसल, भारतीय रिजर्व बैंक के एक पत्र के आधार पर उत्तर प्रदेश पुलिस मुख्यालय में तैनात पुलिस महानिरीक्षक (अपराध) मनोज कुमार झा ने मेरठ पुलिस को सितंबर महीने में इस संबंध में काररवाई करने के निर्देश दिए थे. एसएसपी डी.सी. दुबे ने मामले की जांच थाना सिविल लाइंस पुलिस को करने के निर्देश दिए, साथ ही उन्होंने साइबर यूनिट के प्रभारी कर्मवीर सिंह को भी इस काम में लगा दिया.

जांच में पता चला कि यह कंपनी वास्तव में लोगों के साथ ठगी का धंधा कर रही है. जो मोबाइल नंबर वेबसाइट पर दिए गए थे, जांच में वह भी फरजी आईडी प्रूफ पर लिए हुए पाए गए. जांचपड़ताल में वेबसाइट निर्माता कंपनी का पता भी लग गया. वह कंपनी मेरठ की ही थी. वेबसाइट रजिस्ट्रेशन के समय जो कागजात जमा किए थे, उन की जांच की तो वह भी फरजी पाए गए. वह कागजात आकाश शिंदे के नाम पर थे.

पुलिस को पता चल गया कि कंपनी का संचालन वैस्टर्न कचहरी रोड के एक कार्यालय से किया जा रहा है. जब साइबर युनिट प्रभारी कर्मवीर सिंह को विश्वास हो गया कि कंपनी की बुनियाद फरजीवाड़े पर टिकी है तो उन्होंने अपनी जांच से पुलिस अधीक्षक (अपराध) टी.एस. सिंह, पुलिस उपाधीक्षक एस. वीर कुमार को अवगत करा दिया. पुख्ता जानकारी मिलने के बाद एसएसपी डी.सी. दुबे ने ठगों की गिरफ्तारी के लिए एक पुलिस टीम का गठन किया. इस टीम में थाना सिविल लाइंस प्रभारी इकबाल अहमद कलीम, सबइंसपेक्टर महेश कुमार शर्मा, कर्मवीर सिंह, कांस्टेबल अरविंद कुमार, विजय कुमार, आनंद कुमार व उमेश वर्मा को शामिल किया गया.

एक दिन पुलिस टीम के 3 सदस्य छद्म गुजराती क्लाइंट बन कर उन के औफिस पहुंचे. सदस्यों ने औफिस में जो बात की, उस से पूरा विश्वास हो गया कि ये लोग लोन दिलाने के नाम पर बहुत बड़ी ठगी कर रहे हैं. इस के बाद पुलिस ने उन ठगों की वेबसाइट ब्लौक करा दी और अगले दिन उन के औफिस में छापा मार दिया. विस्तार से की गई पूछताछ में पता चला कि रिहान और उस के साथी लाखों रुपए की ठगी कर चुके हैं. अगले दिन पुलिस ने तीनों आरोपियों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया.

अच्छी डिग्री होने के बावजूद रिहान और उस के साथियों ने लोगों को ठगने की फितरती सोच बनाई थी, उसी सोच ने उन के भविष्य को चौपट कर दिया. कथा लिखे जाने तक किसी भी आरोपी की जमानत नहीं हो सकी थी. Cyber Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Pune Crime News: रासिला ने ऐसा सोचा भी न था

Pune Crime News: आईटी क्षेत्र में बंगलुरु की इंफोसिस सौफ्टवेयर कंपनी का एक बड़ा नाम है. केरल की रहने वाली रासिला ओ.पी. इसी कंपनी के पुणे फेज-2 स्थित कंपनी में नौकरी करती थी. वह सौफ्टवेयर इंजीनियर थी. इस कंपनी के प्रोजेक्ट इतने महत्त्वपूर्ण होते हैं कि उन्हें पूरा करने के लिए कर्मचारियों और अधिकारियों को कभीकभी 24-24 घंटे तक काम करना पड़ता है. 29 जनवरी को रविवार था.

शहर के अधिकांश औफिस और प्रतिष्ठान बंद थे. लेकिन इंफोसिस कंपनी का एक प्रोजेक्ट इतना अर्जेंट था कि उसे पूरा करने के लिए कर्मचारियों को रविवार को भी औफिस आना पड़ा था. इस प्रोजेक्ट को पूरा करने की जिम्मेदारी पुणे और बंगलुरु टीम को सौंपी गई थी. रासिला भी उस दिन इसी प्रोजेक्ट की वजह से औफिस आई थी. बंगलुरु में कुछ कर्मचारी अपनेअपने घरों में बैठ कर उस की मदद कर रहे थे.

कंपनी का प्रोजेक्ट लगभग पूरा हो गया था. केवल कुछ ही औपचारिकताएं बाकी रह गई थीं कि शाम 7 बजे अचानक रासिला और बंगलुरु टीम के बीच फोन और ईमेल से होने वाली बातचीत बंद हो गई. बंगलुरु के कर्मचारी समझ नहीं पाए कि अचानक यह क्या हो गया.

तमाम कोशिशों के बाद भी रासिला और बंगलुरु के कर्मचारियों के बीच जब संपर्क नहीं हो पाया तो उन के मन में तरहतरह की आशंकाएं जन्म लेने लगीं. उन्होंने पुणे के बड़गांव में रहने वाले इंफोसिस सौफ्टवेयर के सीनियर एसोसिएट कंसलटेंट और रासिला के प्रोजेक्ट रिपोर्टिंग मैनेजर अभिजीत कोठारी को फोन किया.

उन्हें सारी बातें बता कर रासिला के विषय में पता लगाने के लिए कहा. अभिजीत ने उसी वक्त रासिला को फोन लगाया. उस के फोन की घंटी तो बज रही थी, पर वह फोन नहीं उठा रही थी. इस के बाद उन्होंने पुणे फेज-2 स्थित कंपनी के औफिस के लैंडलाइन पर फोन किया.

फोन एक सिक्योरिटी गार्ड ने उठाया. उस ने अभिजीत को बताया कि वह ड्यूटी पर अभीअभी आया है. उस के पहले ड्यूटी पर सिक्योरिटी गार्ड भावेन सैकिया था. वह अपनी ड्यूटी पूरी कर के अपना चार्ज उसे दे कर चला गया है. अभिजीत कोठारी ने जब ड्यूटी पर मौजूद गार्ड से रासिला के बारे में पूछा तो गार्ड रासिला की केबिन में गया. इस के बाद उस गार्ड ने जो जानकारी दी, उसे सुन कर उन के पैरों तले से जमीन खिसक गई.

फिर क्या था, कुछ ही देर में अभिजीत कोठारी इंफोसिस के औफिस पहुंच गए. उन्होंने देखा कि औफिस के अंदर रासिला की खून से लथपथ लाश पड़ी थी. शव के आसपास काफी खून फैला था. चेहरा पूरी तरह किसी भारी और ठोस वस्तु से कुचला गया था. अभिजीत कोठारी ने मामले की जानकारी कंपनी के प्रमुख अधिकारियों और रासिला के परिवार वालों को देने के बाद थाना हिंजवाली पुलिस को दे दी थी.

थाना हिंजवाली के थानाप्रभारी अरुण वायकर अपने सहायकों के साथ तुरंत घटनास्थल पर पहुंच गए. हत्या की जानकारी अपने वरिष्ठ अधिकारियों को दे कर वह मामले की जांच में जुट गए. वह घटनास्थल का निरीक्षण कर रहे थे कि पुणे शहर के डीसीपी गणेश शिंदे, एसीपी वैशाली जाधव भी घटनास्थल पर आ गईं.

उन के साथ डौग स्क्वायड और फिंगरप्रिंट ब्यूरो के अधिकारी भी आए थे. सभी ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया तो पाया कि रासिला की हत्या की बड़ी बेरहमी से की गई थी. उस के गले में एक पीले रंग का तार लपेटा हुआ था. वह कंप्यूटर का तार था. पुलिस यह जानने की कोशिश करने लगी कि ऐसा कौन व्यक्ति हो सकता है, जिस ने इस की हत्या के बाद चेहरा तक कुचल दिया.

घटनास्थल की काररवाई पूरी कर के पुलिस ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए पुणे के मसन अस्पताल भिजवा दिया. इस के बाद कंपनी के प्रोजेक्ट मैनेजर अभिजीत कोठारी की ओर से रासिला की हत्या का मुकदमा दर्ज कर मामले की जांच शुरू कर दी. शुरुआती जांच में पुलिस को पता चला कि रासिला जिस केबिन में बैठती थी, वह बेहद सुरक्षित थी.

उस का दरवाजा एक विशेष कार्ड के टच होने पर ही खुलता था. इस से पुलिस को यही लगा कि उस की हत्या में किसी ऐसे आदमी का हाथ है, जिस का उस केबिन में आनाजाना था. इस संबंध में पुलिस ने कंपनी के कर्मचारियों से पूछताछ की तो कंपनी का सिक्योरिटी गार्ड भावेन सैकिया पुलिस के शक के दायरे में आ गया. इस के बाद कंपनी के सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखी गई तो स्पष्ट हो गया कि सिक्योरिटी गार्ड भावेन ने ही रासिला की हत्या की थी.

एसीपी वैशाली जाधव के निर्देशन में जब पुलिस टीम सिक्योरिटी गार्ड भावेन के घर पर पहुंची तो वह घर पर नहीं मिला. उस के घर के दरवाजे पर ताला लगा था. पड़ोसियों ने बताया कि भावेन की मां की तबीयत अचानक खराब हो गई थी, इसलिए वह अपने गांव चला गया है. जिस सिक्योरिटी एजेंसी में उस की नियुक्ति थी, उस से संपर्क कर पुलिस ने भावेन के बारे में सारी जानकारी ले ली.

जहांजहां से भावेन के गांव जाने के साधन मिलते थे, उन सभी रास्तों पर नाकेबंदी करवा दी गई. इस के अलावा जांच टीम को 7 भागों में विभाजित कर उन्हें महानगर मुंबई और पुणे के विभिन्न इलाकों के लिए रवाना कर दिया गया. रासिला की हत्या पुणे पुलिस के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बन चुकी थी. क्योंकि पिछले साल आईटी प्रोफेशनल महिला ज्योति कुमारी, नयना पुजारी, दर्शना टोगारी और अंतरा दास की कंपनी के सिक्योरिटी गार्डों द्वारा जिस तरह हत्याएं की गई थीं, उसे देख कर आईटी कंपनियों में काम करने वाली महिलाओं के भीतर डर का माहौल बन गया था.

इसलिए इस मामले का खुलासा करने के लिए वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों पर दबाव बढ़ गया था. यही वजह थी कि एसीपी वैशाली जाधव ने इस मामले की जांच अपने हाथों में ले ली थी. आखिरकार एसीपी वैशाली जाधव और उन की टीम की मेहनत रंग लाई और 8 घंटे की कोशिश के बाद सौफ्टवेयर इंजीनियर रासिला के हत्यारे भावेन सैकिया को महानगर मुंबई के छत्रपति शिवाजी रेलवे स्टेशन से गिरफ्तार कर लिया गया.

पुलिस टीम जिस समय छत्रपति शिवाजी रेलवे स्टेशन पहुंची थी, उस समय रात के लगभग 3 बज रहे थे. भावेन सैकिया अपना पूरा चेहरा कंबल के नीचे ढक कर टिकट खिड़की के पास बैठा खिड़की के खुलने का इंतजार कर रहा था. मुखबिर के इशारे पर पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया था.

सिक्योरिटी गार्ड भावेन सैकिया को ले कर पुलिस पुणे आ गई. उस से थोड़ी पूछताछ कर के उसे पुणे के प्रथम श्रेणी दंडाधिकारी ए.एस. वारूलकर के सामने पेश कर 4 फरवरी, 2017 तक की रिमांड पर ले लिया. पूछताछ में उस ने अपना जुर्म स्वीकार कर लिया. उस ने इस हत्याकांड की जो कहानी बताई, इस प्रकार निकली.

27 वर्षीय भावेन सैकिया मूलरूप से असम के गांव ताती विहार का रहने वाला था. उस के पिता ने 3 शादियां की थीं. भावेन सैकिया उन की तीसरी पत्नी का बेटा था. भावेन महत्त्वाकांक्षी के साथ पढ़ाईलिखाई में भी होशियार था.

उस का स्वभाव उग्र था. इस वजह से उस की अपने सौतेले भाइयों से नहीं पटती थी. 12वीं कक्षा में अच्छे अंक पाने के बाद उस ने स्नातक की पढ़ाई करनी चाही पर उस के सौतेले भाई नहीं चाहते थे कि वह पढ़े. किसी न किसी बात को ले कर वह उस से झगड़ने लगते थे. फिर एक दिन झगड़ा इतना बढ़ गया कि सन 2013 में उस ने अपने सौतेले भाई की हत्या कर दी. हत्या के बाद वह घर से फरार हुआ तो वापस गांव नहीं लौटा.

सन 2014 में वह पुणे पहुंच गया और वहां की एक सिक्योरिटी एजेंसी में सिक्योरिटी गार्ड के पद पर उस की नौकरी लग गई. कंपनी की तरफ से भावेन की तैनाती इंफोसिस सौफ्टवेयर कंपनी के औफिस में हो गई. उस ने औफिस के पास ही हिजवाड़ी जयरामनगर के फेज-3 में एक कमरा किराए पर ले लिया.

नौकरी के दौरान उस में काफी परिवर्तन आ गया था. औफिस में काम करने वाली लड़कियों को वह चाहत की निगाहों से देखता. खूबसूरत लड़कियां उस की कमजोरी बन गई थीं. किसी न किसी बहाने वह उन से बातें करता और उन्हें छूने की कोशिश करता था. इसी प्रकार की कोशिश जब उस ने रासिला ओ.पी. के साथ की तो उस ने भावेन की बात अनदेखी नहीं की, बल्कि उस से अपनी नाराजगी भी जता दी.

घटना के 2 दिन पहले रासिला ने भावेन सैकिया को अपने केबिन में बुला कर काफी डांटाफटकारा और उस की हरकतों की शिकायत ईमेल द्वारा उस की सिक्योरिटी कंपनी के वरिष्ठ अधिकारियों से करने की भी धमकी दी. इस धमकी से भावेन काफी डर गया था. उसे लग रहा था कि रासिला उस की शिकायत जरूर कर देगी. उस की शिकायत पर उसे अपनी नौकरी जाने का डर था.

24 वर्षीय रासिला ओझम पोईल पुराईत उर्फ रासिला ओ.पी. मूलरूप से केरल राज्य के कालीकट जिले के गांव कुदमंगलम की रहने वाली थी. उस के पिता ओझम पोईल पुराईत उर्फ राजू ओ.पी. होमगार्ड में एक तृतीय श्रेणी कर्मचारी थे. परिवार में उस के और पिता के अलावा एक बड़ा भाई तेजस कुमार ओ.पी. था. मां पुष्पलता का देहांत उस समय हो गया, जब छोटी थी. दोनों भाईबहन का बचपन बहुत ही गरीबी में बीता था. पिता से ही दोनों को मां का प्यार मिला था. घर की परिस्थतियों को देखते हुए दोनों बच्चों ने मन लगा कर पढ़ाई की.

रासिला और तेजस कुमार दोनों ने 98 प्रतिशत अंकों से 12वीं की परीक्षा पास की. इंजीनियरिंग की परीक्षाएं भी दोनों ने प्रथम श्रेणी से पास की थीं. इंजीनियरिंग के बाद तेजस कुमार को आबूधाबी की एयरलाइंस कंपनी में और रासिला की बंगलुरु की इंफोसिस सौफ्टवेयर कंपनी में असिस्टैंट इंजीनियर के पद पर नौकरी लग गई. अपने बच्चों को अच्छी जगह और अच्छे पद पर देख कर राजू ओ.पी. की सारी चिंताएं दूर हो गईं. रासिला की अच्छी पोस्ट देख कर तो उस की शादी के रिश्ते भी आने शुरू हो गए थे.

रासिला खूबसूरत तो थी ही, साथ ही वह कंपनी की जिस पोस्ट पर काम करती थी, उस की जिम्मेदारी भी अच्छी तरह निभा रही थी. अपने काम और व्यवहार से उस ने कंपनी के कई वरिष्ठ अधिकारियों के दिल में एक खास जगह बना ली थी. इस श्रेणी में एक बड़ा अधिकारी ऐसा था जो रासिला को अपने दिल में एक खास जगह देना चाहता था, पर रासिला को वह पसंद नहीं था. जिस के कारण वह अधिकारी रासिला से चिढ़ गया और उसे किसी न किसी बहाने परेशान करने लगा.

उस अधिकारी से परेशान हो कर रासिला ने कुछ वरिष्ठ अधिकारियों से उस की शिकायत कर दी. साथ ही अपना इस्तीफा भी दे दिया. लेकिन कंपनी ने उस का इस्तीफा स्वीकार नहीं किया. बल्कि कंपनी ने रासिला का ट्रांसफर इंफोसिस कंपनी की पुणे ब्रांच में कर दिया और पुणे के हिजवाड़ी के जयरामनगर फेज-1 में उस के रहने की व्यवस्था भी कर दी. पुणे ब्रांच में रासिला को आए अभी 5 महीने ही हुए थे कि उसे औफिस के सिक्योरिटी गार्ड भावेन सैकिया से दोचार होना पड़ा.

घटना के दिन सारा औफिस बंद होने के बावजूद भी कंपनी द्वारा सौंपे गए प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए रासिला को अपने औफिस आना पड़ा था. दिन के 2 बजे जब वह अपने औफिस में पहुंची तो काफी खुश थी. उस समय सिक्योरिटी गार्ड भावेन अपनी ड्यूटी पर तैनात था. रासिला ने अपने एक्सेस कार्ड से केबिन का लौक खोला और केबिन के अंदर जा कर अपने बंगलुरु ब्रांच के कुछ साथियों के साथ औनलाइन जुड़ कर अपने प्रोजेक्ट की तैयारी में जुट गई थी.

इधर रासिला की धमकी और अपनी नौकरी को ले कर भावेन काफी परेशान था. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे क्या न करे. शिकायत को अपने वरिष्ठ अधिकारियों तक जाने से कैसे रोके इसी बारे में वह सोचने लगा. सोचविचार करने के बाद उस ने खतरनाक फैसला ले लिया.

उस समय रासिला औफिस में अकेली थी. बातचीत करने के लिए मौका अच्छा था. अपनी हरकतों की माफी मांगने के बहाने वह रासिला के केबिन में जाने में कामयाब हो गया. केबिन के अंदर पहुंचते ही उस ने रासिला से कहा, ‘‘मैडम, आप मेरी शिकायत मेरे अधिकारियों से नहीं करना वरना मेरी नौकरी चली जाएगी और मैं बेकार हो जाऊंगा.’’ वह गिड़गिड़ाया.

रासिला ने एक बार गार्ड के चेहरे को देखा. जिस पर मिलेजुले खौफ का असर स्पष्ट दिखाई पड़ रहा था. हालांकि रासिला ने उस की हरकतों को नजरअंदाज कर दिया था. लेकिन वह उसे थोड़ा और सबक सिखाना चाहती थी, जिस से वह सुधर जाए. इसलिए वह गंभीर होते हुए बोली, ‘‘नौकरी चली जाएगी, बेकार हो जाओगे तो मैं क्या करूं. तुम्हें  लड़कियों को परेशान करने का बड़ा शौक है न, अब भुगतो, मैं ने तो तुम्हारी शिकायत तुम्हारी कंपनी के सीनियर अधिकारियों को ईमेल से कर दी है. अब जाओ गांव में ही बैठना.’’

यह सुन कर भावेन का चेहरा क्रोध से तमतमा उठा. अपने आपे से बाहर होते हुए उस ने इंटरनेट का वायर खींच कर रासिला के गले में डालते हुए कहा, ‘‘मैडम, यह तुम ने अच्छा नहीं किया. अब तुम्हें इस की सजा तो भुगतनी ही पड़ेगी.’’

रासिला उस का इरादा जान कर अपने बचाव के लिए काफी चीखीचिल्लाई. पर उस वक्त उस की मदद के लिए वहां कोई नहीं था. उस ने उस इंटरनेट वायर से रासिला का गला घोंट दिया. उस की हत्या करने के बाद उस ने अपने बूटों से ठोकरें मारमार कर उस का चेहरा लहूलुहान कर दिया.

रासिला की हत्या करने के बाद जब भावेन का गुस्सा शांत हुआ तो वह बाहर आ कर आराम से अपनी जगह बैठ गया. उसे पुलिस और कानून का डर लगने लगा. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह अब कहां जाए. गांव जा नहीं सकता था, क्योंकि उस पर सौतेले भाई की  हत्या का आरोप था. पुणे और गांव की पुलिस से बचने के लिए उस के पास कोई रास्ता नहीं था. ऐसे में उसे बस आत्महत्या के अलावा और कोई चारा नहीं दिखा.

उस की ड्यूटी का टाइम भी पूरा हो चुका था. जैसे ही दूसरा सिक्योरिटी गार्ड शिफ्ट बदलने आया तो उसे जिम्मेदारी सौंप कर भावेन औफिस से निकल गया. आत्महत्या करने के लिए वह पुणे रेलवे स्टेशन पर पहुंचा ताकि किसी टे्रेन के सामने कूद कर जीवनलीला खत्म कर ले लेकिन ऐसा करने की उस की हिम्मत नहीं हुई.

फिर उस ने आत्महत्या करने के बजाय किसी दूसरे शहर में जाने का इरादा बनाया. अपने कमरे से उसे कुछ जरूरी सामान भी साथ लेना था. इसलिए कमरे पर पहुंच कर उस ने पड़ोसियों से झूठ कह दिया कि उस की मां की तबीयत खराब है. बैग में कपड़े आदि भर कर वह महानगर मुंबई के छत्रपति शिवाजी रेलवे स्टेशन पहुंचा. वहां से टिकिट ले कर उसे अपनी किसी मंजिल की ओर रवाना होना था. पर इस के पहले ही वह पुलिस के हत्थे चढ़ गया. भावेन मराली सैकिया से विस्तार से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने न्यायालय में पेश कर उसे जेल भेज दिया.

पुलिस ने रासिला ओ.पी. के शव को पोस्टमार्टम के बाद उस के पिता राजू ओ.पी. और परिजनों को सौंप दिया. पिता और परिवार वालों का कहना था कि रासिला की हत्या एक साजिश के तहत इंफोसिस कंपनी के ही एक बड़े अधिकारी ने कराई है, जिस की शिकायत उन्होंने हिजवाड़ी पुलिस थाने में दर्ज करवा दी.

पुलिस ने उन्हें भरोसा दिया कि रासिला की हत्या के मामले में जो भी दोषी होगा, उस के खिलाफ सख्त काररवाई की जाएगी. मामले की जांच थानाप्रभारी अरुण वायकर कर रहे थे. कथा लिखे जाने तक भावेन सैकिया की जमानत नहीं हो सकी थी. Pune Crime News

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Haryana Crime News: दोस्त बना जीजा, खतरनाक नतीजा

सुबह का उजाला अभी फैलना शुरू हुआ था कि ‘बचाओ बचाओ’ की मर्मभेदी चीख ने वहां मौजूद लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया था. चीखने वाले पर तेजधार हथियार से एक युवक ने हमला किया था, जिस से गंभीर रूप से घायल हो कर वह चीखा था. चीखने के साथ ही वह सड़क पर गिर पड़ा था और गिरते ही बेहोश हो गया था.

उस युवक के गिरते ही उस पर हमला करने वाला युवक लंबे फल का खून सना चाकू हाथ में लिए भागा था. सुबह का समय होने की वजह से वहां बहुत कम लोग थे, लेकिन जो भी थे, वे उस का पीछा करने या पकड़ने की हिम्मत नहीं कर सके थे.

पर उन लोगों ने इतना जरूर किया कि हमलावर के भागने के बाद सड़क पर घायल पड़े युवक को पंचकूला के सैक्टर-6 स्थित जनरल अस्पताल पहुंचा दिया था. उसे देखते ही डाक्टरों ने मृत घोषित करने के साथ इस की सूचना पुलिस को दे दी थी.

सूचना मिलते ही थाना मौलीजागरां के एएसआई गुरमीत सिंह सुबह 7 बजे के करीब अस्पताल पहुंच गए थे. घटना की जानकारी ले कर उन्होंने थानाप्रभारी इंसपेक्टर बलदेव कुमार को सूचित किया तो सिपाही अमित कुमार के साथ वह भी अस्पताल पहुंच गए थे.

जरूरी काररवाई कर के बलदेव कुमार ने उन लोगों से बात की, जो मृतक को अस्पताल ले कर आए थे. वे 2 लोग थे, जिन में एक 19 साल का मोहम्मद चांद था और दूसरा था ड्राइवर अशोक कुमार. पूछताछ में चांद ने बताया था कि वह पंचकूला के सैक्टर-16 की इंदिरा कालोनी के मकान नंबर 1821 में रहता था और सैक्टर-17 की राजीव कालोनी स्थित शरीफ हलाल मीट शौप पर नौकरी करता था.

सुबह जल्दी जा कर चांद ही दुकान खोलता था. मृतक को ही नहीं, उस पर हमला करने वाले को भी वह अच्छी तरह से पहचानता था. वह सुबह 5 बजे दुकान पर पहुंचा तो मुर्गा सप्लाई करने वाली गाड़ी आ गई. गाड़ी के ड्राइवर अशोक कुमार ने मोहम्मद चांद को आवाज दे कर गाड़ी से मुर्गे उतारने को कहा.

मोहम्मद चांद गाड़ी के पीछे पहुंचा तो गाड़ी में बैठा ड्राइवर का सहायक इरफान उतर कर उस के पास आ गया. जैसे ही वह जाली वाला दरवाजा खोल कर मुर्गे निकालने के लिए आगे बढ़ा, शाहबाज हाथ में चाकू लिए वहां आया और इरफान के सिर पर उसी चाकू से वार कर दिया.

वार होते ही इरफान पीछे की ओर घूमा तो शाहबाज ने कहा, ‘तुम ने मेरी भोलीभाली बहन को अपनी मीठीमीठी बातों में फंसा कर मेरी मरजी के खिलाफ उस से शादी की है न? तो आज मैं तुझे उसी का सबक सिखा रहा हूं. आज मैं तुझे जिंदा नहीं छोड़ूंगा.’

society

इस के बाद शाहबाज ने इरफान की छाती, आंख के नीचे और कमर तथा पेट पर लगातार कई वार किए. इरफान ‘बचाओ…बचाओ’ की गुहार लगाते हुए नीचे गिर गया. शाहबाज का गुस्सा और उस के हाथ में चाकू देख कर कोई भी उस के पास जाने की हिम्मत नहीं कर सका.

लेकिन जैसे ही शाहबाज चला गया, मोहम्मद चांद और अशोक कुमार ने किसी तरह इरफान को अस्पताल पहुंचाया, जहां डाक्टरों ने उसे देखते ही मरा हुआ बताया. ऐसा ही कुछ अशोक कुमार ने भी बताया था, लेकिन उस का कहना था कि वह आगे था. शोर सुन कर पीछे आया. तब तक शाहबाज अपना काम कर के जा चुका था.

इंसपेक्टर बलदेव कुमार ने हत्याकांड के चश्मदीद मोहम्मद चांद के बयान के आधार पर शाहबाज के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज करने की अनुशंसा कर के तहरीर थाना भेज दी, जहां एफआईआर नंबर 101 पर भादंवि की धारा 302 के तहत यह केस दर्ज कर लिया गया. यह घटना 4 जून, 2016 की है.

उसी दिन पुलिस की एक टीम शाहबाज की तलाश में जुट गई. उस के बारे में पता करने के लिए विश्वस्त मुखबिर भी सक्रिय कर दिए गए थे. मुखबिर की ही सूचना पर शाहबाज को उसी दिन रात में गांव मक्खनमाजरा से गिरफ्तार कर लिया गया.

अदालत से कस्टडी रिमांड ले कर सब से पहले शाहबाज से उस चाकू के बारे में पूछा गया, जिस से उस ने इरफान का कत्ल किया था. 6 जून को उस की निशानदेही पर वह चाकू मौलीजागरां की एक कब्रगाह से बरामद कर लिया गया. उस ने वहां चाकू को पत्थरों के नीचे दबा कर रखा था. लेकिन उस पर लगा खून उस ने साफ कर दिया था.

इस के बाद शाहबाज से इरफान की हत्या के बारे में पूछताछ की गई तो उस ने जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी—

मूलरूप से उत्तर प्रदेश के जिला बिजनौर के रहने वाले शाहबाज और इरफान एक ही गांव के रहने वाले थे, इसलिए वे एक साथ खेलकूद कर बड़े हुए थे. कुछ दिनों पहले कामधंधे की तलाश में दोनों चंडीगढ़ आ गए. इरफान जहां अपने बड़े भाई के साथ आया था, वहीं शाहबाज अपने पूरे परिवार के साथ आया था. उस के परिवार में अब्बूअम्मी के अलावा एक छोटी बहन साहिबा थी.

चंडीगढ़ में दोनों पंचकूला की सीमा पर बसे गांव मौलीजागरां में थोड़ी दूरी पर अलगअलग किराए के मकान ले कर रहने लगे थे. मौलीजागरां जहां चंडीगढ़ में पड़ता है, वहीं मुख्य सड़क के उस पार की दुकानें हरियाणा के जिला पंचकूला के सैक्टर-17 की राजीव कालोनी के अंतर्गत आती हैं. उन्हीं में से एक दुकान पर शाहबाज जहां मुर्गे काटने का काम करने लगा था, वहीं इरफान को मुर्गे सप्लाई करने वाली गाड़ी पर सहायक की नौकरी मिल गई थी.

अपने हिसाब से दोनों का काम ठीकठाक चल रहा था. शाहबाज के अब्बू को भी नौकरी मिल गई थी. इरफान और शाहबाज हमउम्र थे. दोनों इतने गहरे दोस्त थे कि उन में सगे भाइयों जैसा प्यार था. एक दिन भी दोनों एकदूसरे से मिले बिना नहीं रह पाते थे. एकदूसरे के यहां आनाजाना, खाना खा लेना या फिर कभीकभार सो जाना आम बात थी.

साहिबा भी दोनों के साथ बचपन से खेलतीकूदती आई थी. मगर अब वह जवान हो चुकी थी. घर वाले उस के निकाह के बारे में सोचने लगे थे. देखनेदिखाने की बात चली तो साहिबा ने हिम्मत कर के शरमाते हुए घर वालों से कहा कि वह इरफान से प्यार करती है और उसी से निकाह करना चाहती है.

साहिबा की इस बात से शाहबाज के घर में तूफान सा आ गया. घर का कोई भी आदमी इस रिश्ते के लिए तैयार नहीं था. शाहबाज ने साफ कहा, ‘‘इस से बड़ी जिल्लत मेरे लिए और क्या होगी कि लोग यह कह कर मेरा मजाक उड़ाएंगे कि अपनी बहन का निकाह करने के लिए ही मैं ने इरफान से दोस्ती की थी. क्या निकाह के लिए सिर्फ वही रह गया है? दुनिया में और कोई लड़का नहीं है? मैं यह निकाह किसी भी कीमत पर नहीं होने दूंगा.’’

शाहबाज ने साहिबा को तो लताड़ा ही, इरफान से भी झगड़ा किया. इरफान ने उसे समझाने की कोशिश करते हुए कहा कि जो भी होगा, घर वालों की रजामंदी से होगा. लेकिन शाहबाज ने साफ कह दिया कि वह साहिबा को भूल जाए और किसी अन्य लड़की से निकाह कर ले, वरना उस के लिए ठीक नहीं होगा.

शाहबाज की इस धमकी का नतीजा यह हुआ कि कुछ दिनों बाद इरफान साहिबा को भगा ले गया और एक धार्मिक स्थल पर दोनों ने निकाह कर लिया. वह वापस आया तो साहिबा को शरीकेहयात बना कर आया. शाहबाज को इस मामले में सारी गलती इरफान की नजर आ रही थी. उस ने अपने दिलोदिमाग में बैठा लिया कि इरफान ने साहिबा के भोलेपन का फायदा उठा कर उसे अपनी बातों में फंसा लिया है.

शाहबाज इरफान से पहले से ही नाराज था, जलती पर घी का काम किया उस ने साहिबा को भगा कर. उस के अब्बू ने इस से बहुत ज्यादा शर्मिंदगी महसूस की. इसी की वजह उन्होंने 2 दिनों बाद ही मौलीजागरां का अपना निवास छोड़ दिया था और वहां से 20 किलोमीटर दूर जा कर कस्बा डेराबस्सी में किराए का मकान ले कर रहने लगे थे. उन्होंने उधर जाना ही छोड़ दिया था. शाहबाज को नौकरी की वजह से उधर जाना पड़ता था.

society

जिस मीट की दुकान पर शाहबाज काम करता था, इरफान रोजाना उधर मुर्गे की सप्लाई करने आता था. लेकिन निकाह के बाद वह उधर दिखाई नहीं दिया था. पता चला कि निकाह के दिन से ही उस ने छुट्टी ले रखी है.

4 जून, 2016 की बात है. साहिबा से इरफान को निकाह किए 5 दिन हो गए थे. सुबह के 5 बजे शाहबाज दुकान पर पहुंच कर मुर्गा काटने वाला चाकू तेज कर रहा था. तभी मुर्गेवाली गाड़ी आ कर उस की दुकान से थोड़ी दूरी पर सड़क के किनारे रुकी. इरफान उतर कर गाड़ी के पीछे की ओर आया.

शाहबाज ने उसे आते देखा तो उसे देख कर उस की आंखों में खून उतर आया. उस के पास सोचनेविचारने का वक्त नहीं था. वह मीट काटने वाला चाकू ले कर तेजी से भागता हुआ इरफान के पास पहुंचा और जरा सी देर में उसे मौत के घाट उतार कर भाग गया.

पहले तो उस ने कब्रिस्तान के पास एक जगह चाकू को साफ कर के पत्थरों के नीचे छिपा दिया. उस के बाद बचने के लिए इधरउधर छिपता रहा. लेकिन पुलिस ने उसे पकड़ लिया. उस ने कहा कि इरफान ने काम ही ऐसा किया था, जिस से उसे मारने का कोई अफसोस नहीं है. इरफान ने जो किया था, उस की उसे यही सजा मिलनी चाहिए थी.

पूछताछ के बाद पुलिस ने शाहबाज को फिर से अदालत में पेश किया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में बुड़ैल जेल भेज दिया गया.

बलदेव कुमार ने उस के खिलाफ आरोपपत्र तैयार कर समय से निचली अदालत में दाखिल कर दिया, जहां से सैशन कमिट हो कर 13 सितंबर, 2016 से मामले की सुनवाई चंडीगढ़ के अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश अतुल कसाना की अदालत में शुरू हुई.

6 अक्तूबर को अदालत ने शाहबाज के खिलाफ धारा 302 का चार्ज फ्रेम कर दिया. उस ने अदालत में खुद को बेकसूर बताते हुए दरख्वास्त की थी कि पुलिस ने एक झूठी कहानी गढ़ कर इस केस में उसे बिना मतलब फंसा दिया है. वह अपने उन बयानों से भी मुकर गया, जो उस ने कस्टडी रिमांड के दौरान पुलिस को दिए थे.

मामले की विधिवत सुनवाई शुरू होते ही अभियोजन पक्ष ने डा. अमनदीप सिंह, डा. गौरव, मोहम्मद चांद, इंतजाम अली, अशोक कुमार, इंसपेक्टर बलदेव कुमार, फोटोग्राफर फूला सिंह, हवलदार सतनाम सिंह, रमेशचंद, धर्मपाल एवं यशपाल के अलावा सीनियर कांस्टेबल कृष्णकुमार, एसआई गुरमीत सिंह, एसआई गुरनाम सिंह और डा. मनदीप सिंह के रूप में 15 गवाह अदालत में पेश किए.

इस के बाद अतिरिक्त पब्लिक प्रौसीक्यूटर ने अभियोजन पक्ष की गवाहियों के पूरी होने के बाद सीआरपीसी की धारा 293 के तहत फोरैंसिक साइंस लैबोरेटरी की रिपोर्ट के अलावा विसरा रिपोर्ट भी पेश की.

अभियोजन पक्ष की काररवाई पूरी होने के बाद 20 जनवरी, 2017 को कोड औफ क्रिमिनल प्रोसीजर की धारा 313 के तहत अभियुक्त शाहबाज का स्टेटमैंट रिकौर्ड किया गया. अभियुक्त ने उक्त सभी गवाहों को झूठ करार देते हुए यही कहा कि वह बेकसूर है. उसे झूठा फंसाया गया है.

बचाव पक्ष की ओर से साहिबा को पेश किया गया. कोड औफ क्रिमिनल प्रोसीजर की धारा 315 के अधीन दर्ज अपने बयान में साहिबा ने अदालत को बताया कि उस ने इरफान से प्रेम विवाह किया था, जिस का परिवार वालों ने पहले तो विरोध किया, लेकिन बाद में मान गए थे.

इरफान ने उसे बताया था कि उस की कुछ गलत लोगों से ऐसी दुश्मनी हो गई है कि वे मौका मिलने पर उस की जान ले सकते हैं. ऐसे में हो सकता है, इरफान को उन्हीं लोगों ने मारा हो, न कि शाहबाज ने.

बचाव पक्ष की ओर से अशोक कुमार को अविश्वसनीय करार देते हुए अदालत ने उसे मुकरा गवाह घोषित करने की गुहार लगाई गई, जो अदालत ने मान भी ली. यह भी दलील दी गई कि पुलिस द्वारा बरामद चाकू पर डाक्टर की रिपोर्ट के मुताबिक मानवीय खून नहीं लगा था.

31 जनवरी, 2017 को विद्वान जज अतुल कसाना ने इस मामले का फैसला सुनाते हुए खुली अदालत में कहा कि उन्होंने दोनों पक्षों को ध्यानपूर्वक सुनने के अलावा सभी साक्ष्यों को गौर से जांचापरखा है, जिन से यह केस शीशे की तरह साफ है. अशोक कुमार को भले मुकरा गवाह करार दिया गया है, लेकिन उस की गवाही को नकारा नहीं जा सकता.

वह भी एक तरह से इस केस का चश्मदीद गवाह था. भले ही उस की गवाही में बाद में कुछ विपरीत बातें सामने आईं, जिस वजह से उसे मुकरा गवाह घोषित किया गया. लेकिन उस की शुरू की गवाही अभियोजन पक्ष को पूरी तरह मजबूती देने में सहायक सिद्ध हुई है.

society

चाकू पर मानवीय खून का अंश होने की बात रिपोर्ट में पहले ही आ चुकी है. हालांकि अभियुक्त ने उसे फेंकने से पहले साफ कर दिया था. साहिबा को बचाव पक्ष ने गवाह के रूप में पेश कर के केस की दिशा बदलने का प्रयास किया. लेकिन उस की प्रेम विवाह वाली बात मान लेने से ही प्रौसीक्यूशन की कहानी को बल मिल जाता है.

लिहाजा यह अदालत इस निष्कर्ष पर पहुंची है कि अभियोजन पक्ष आरोप सिद्ध करने में कामयाब रहा है और अभियुक्त शाहबाज खान मृतक मोहम्मद इरफान का कत्ल करने का दोषी पाया गया है. अभी वह जेल में है. सजा की बाबत सुनने के लिए उसे अगले दिन अदालत में पेश किया जाए.

अगले दिन शाहबाज को ला कर अदालत में पेश किया गया तो माननीय एडीजे अतुल कसाना ने उसे उम्रकैद के अलावा 10 हजार रुपए जुरमाने की सजा सुनाई. Haryana Crime News

– कथा अदालत के फैसले पर आधारित