Adoption Rights Case. गोद लिए बच्चे पर कानूनी हक पाने के लिए शबनम हाशमी ने सर्वोच्य न्यायालय में 17 सालों तक जंग लड़ी. लंबी सुनवाई के बाद माननीय न्यायालय ने जो फैसला सुनाया, वह ऐतिहासिक था.

सोशल एक्टिविस्ट शबनम हाशमी के पास 9 साल का एक बेटा था साहिर. इस के बावजूद भी उन्हें एक बेटी की जरूरत महसूस हुई. उस समय उन की उम्र 39 साल थी. उन के पति गौहर रजा पेशे से एक वैज्ञानिक हैं इस के अलावा वह सामाजिक कार्यकर्ता और एक कवि भी हैं. शबनम हाशमी ने बेटी के बारे में पति से बात की. चूंकि दोनों ही खुली विचारधारा के थे, इसलिए उन्होंने सलाहमशविरा कर के फैसला लिया कि किसी एडाप्शन सेंटर से बच्ची गोद ली जाए.

बच्ची एडाप्ट करने के लिए वे दोनों कई संस्थाओं में गए. लेकिन उन संस्थाओं ने उन्हें यह कह कर बच्ची गोद नहीं दी कि वे अल्पसंख्यक हैं. इस बात का उन्हें बड़ा दुख हुआ कि क्या अल्पसंख्यक होना कोई गुनाह है जो उन से इस तरह की बात की जा रही है. इस बारे में उन्होंने संस्थाओं के संचालकों से तर्क किए तो संस्थाओं ने उन्हें टका सा जवाब दिया कि मुसलिम पर्सनल ला बोर्ड भी मुसलिमों को बच्चा गोद लेने की इजाजत नहीं देता.

https://youtube.com/shorts/9T1zmBXZoEU?si=XPPumHVJqv6iZFDs

शबनम हाशमी और गौहर रजा मुसलिम पर्सनल ला बोर्ड वाली बात जानते थे. उन का कहना था कि मान लो कि उन के मजहबी कानून में बच्चा गोद लेने की इजाजत नहीं है तो भारतीय संविधान में तो पक्षपात नहीं होना चाहिए. जब भारतीय कानून हिंदुओं को बच्चा एडाप्शन का अधिकार देता है तो अल्पसंख्यकों को क्यों नहीं?

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