ISIS Terrorist Organization: आईएसआईएस एक दुर्दांत और क्रूर आतंकी संगठन है जो पत्रकारों, मानवाधिकार के लिए काम करने वाली युवतियों और विरोधियों को मौत के घाट उतारते हुए जश्न मनाता है और उस की वीडियो बना कर दुनिया को दिखाता है. इस के बावजूद बहुत से देश उसे आतंक फैलाने के लिए फंडिंग तो कर ही रहे हैं, कट्टरपंथी सोच वाले कितने ही युवा और महिलाएं भी इस संगठन से जुड़ने के लिए लालायित हैं.

पहले पेरिस, एक बार फिर पेरिस, उस के बाद बेल्जियम की राजधानी ब्रसेल्स. आईएसआईएस ने यूरोप में पिछले 3 सालों में इस तरह की एक दर्जन से ज्यादा खूनखराबे की घटनाओं को अंजाम दिया है, लेकिन इन 3 आत्मघाती हमलों ने यूरोप के समूचे मनोविज्ञान में ही दहशत बैठा दी है. पिछले दिनों यूरोप के कई अखबारों द्वारा अलगअलग देशों में इस खूंखार संगठन को ले कर जाने गए लोगों के मनोविज्ञान का साझा निष्कर्ष यह था कि आज की तारीख में यूरोप के 60 फीसदी से ज्यादा लोग इस वहशी संगठन से बेहद डरे हुए हैं. वे इस से किस कदर भयग्रस्त हैं, इस का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस का डर उन की हड्डियों तक में समा गया है.

सन 2001 में अलकायदा ने अमेरिका के ट्रेड टावर में हवाई जहाजों को मिसाइल की तरह इस्तेमाल करते हुए जो हमला किया था, उस ने अमेरिकियों के दिलोदिमाग में जबरदस्त खौफ पैदा कर दिया था. तकरीबन वैसा ही खौफ और वैसी ही दहशत इन दिनों यूरोपीय लोगों के दिलोदिमाग में घर किए हुए है. यह दहशत कितनी हौलनाक है, इस का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि लंदन के 50 फीसदी से ज्यादा लोग मानते हैं कि सुबह जब वे घर से निकलते हैं तो एक बार सीने में कहीं धक सा कुछ होता है कि क्या शाम को वे सहीसलामत वापस आ पाएंगे?

सवाल है, हथियार, तकनीक, धन और वर्चस्व से लबालब यूरोप जैसे भूखंड में एक जिहादी संगठन ने इस कदर अपना आतंक क्यों मचा रखा है? क्या यह महज संयोग है या फिर खौफ और आतंक कि इस समूची दास्तां में तमाम व्यवस्थित षडयंत्रों का भी गुप्त योगदान है? निश्चित रूप से ऐसा ही है. लेकिन यह सब इतना जटिल है कि आईएसआईएस की शुरू से आखिर तक दास्तां को जाने बिना श्यामश्वेत ढंग से कुछ भी कह देना खतरे से खाली नहीं है. आइए, इस खूंखार संगठन के गठन से ले कर इस के इस भयानक आतंक के सौदागर होने तक के सफर में एक संपूर्ण नजर डालें.

आईएसआईएस कब, कैसे और क्यों बना?

संगठित खौफ के इतिहास में आज तक आईएसआईएस जितना दुर्दांत और मनुष्य को पीड़ा पहुंचाने वाला कोई दूसरा संगठन नहीं हुआ. आईएसआईएस यानी ‘इस्लामिक स्टेट औफ इराक ऐंड सीरिया’ नाम से इस संगठन के मौजूदा स्वरूप का गठन अप्रैल, 2013 में हुआ था, लेकिन इस की जड़ें इस से भी एक दशक पुरानी हैं. इब्राहिम अव्वद अल बदरी उर्फ अबु बक्र अल बगदादी इस का मौजूदा मुखिया है, जिसे अब तक के दुनिया के इतिहास का सब से दुर्दांत रक्तपिपासु माना जाता है.

दुनिया के मौजूदा कायदेकानूनों के हिसाब से यह संगठन, जो खुद को इराक और सीरिया के भौगोलिक क्षेत्र को मिला कर इस्लामिक राज्य कहना पसंद करता है, एक अमान्य राज्य तथा इराक एवं सीरिया में सक्रिय जिहादी सुन्नी सैन्य समूह है. अरबी भाषा में इस संगठन का नाम है ‘अल दौलतुल इस्लामिया फिल इराक वल शाम’ जिस का हिंदी में मतलब है, ‘इराक एवं शाम का इस्लामी राज्य’. शाम सीरिया का प्राचीन नाम है.

लेकिन इस के यही 2 नाम भर नहीं हैं. इस दुर्दांत संगठन के और भी कई नाम हैं. मसलन, आईएसआईएल या दाइश इस्लामिक स्टेट औफ इराक ऐंड लेवांट. पुराने समय में लेवांट उस इलाके को कहा जाता था, जिस में आज सीरिया, लेबनान और फिलिस्तीन आते हैं. कहने का मतलब यह है कि लेवांट एक ऐसे इलाके के रूप में जाना जाता है, जहां दुनिया के लिखित इतिहास में सब से अधिक खूनी संघर्ष हुए हैं. इस संघर्ष के दायरे में दुनिया के जो मौजूदा देश शामिल रहे हैं, वे हैं—जौर्डन, इजरायल, कुवैत, फिलिस्तीन, लेबनान, साइप्रस तथा दक्षिणी तुर्की के कुछ भाग.

खौफ के पर्याय इस संगठन को इराक और सीरिया के लोग इशारों में ‘दौलत’ अर्थात सरकार भी कहते हैं. यह सशस्त्र तकफीरी सलफी और जेहादी संगठन है. इस का घोषित उद्देश्य इस्लामी शासन व्यवस्था और इस्लामी कानून को लागू करना है. इस आतंकी संगठन के गठन, इस के अस्तित्व में आने, इस की गतिविधियों, लक्ष्यों और कौन से देशों से इस के संपर्क हैं, इस बारे में दुनिया के हर देश के पास एकदूसरे से भिन्न यानी विरोधाभासी सूचनाएं हैं, जो खुद एक रणनीति के तहत इस ने और इस संगठन के मददगारों ने फैलाई हैं.

मसलन कुछ लोगों और देशों का मानना है कि यह संगठन सीरिया में अलकायदा की एक शाखा है, जबकि दूसरे लोगों का कहना है कि यह एक स्वतंत्र संगठन है, जो इस्लामी सरकार के गठन का प्रयास कर रहा है. इसी तरह कुछ अन्य सूचना समूहों और देशों का मानना है कि यह सीरिया सरकार के विरोधियों को विभाजित करने के लिए सीरिया की सरकार और पश्चिमी देशों के षडयंत्रों का सांगठनिक विस्तार है. इस की पुष्टि अमेरिका के एक पुराने जासूस एडवर्ड स्नोडेन के इंटरव्यू से होती है, जो उस ने जुलाई, 2014 में ईरान के अखबार तेहरान टाइम्स को दिया था. गौरतलब है कि एडवर्ड स्नोडेन सन 2013 तक अमेरिका की खुफिया एजेंसी सीआईए (सेंट्रल इंटेलीजेंस एजेंसी) में था.

सन 2013 में जब उस की सीआईए की नौकरी छूट गई तो वह हांगकांग भाग गया और फिर वहां से रूस. आज भी वह रूस में ही किसी अज्ञात स्थान में छिपा है. स्नोडेन ने अमेरिका की करतूत के बहुत सारे काले चिट्ठे पूरी दुनिया की मीडिया के सामने खोले हैं, जिस से पता चलता है कि कैसे अमेरिका ने ही ओसामा बिन लादेन की तरह खौफ के मौजूदा सौदागर अबू बक्र अल बगदादी को पैदा किया. बहरहाल, स्नोडेन द्वारा तेहरान टाइम्स को दिए गए इंटरव्यू के मुताबिक अमेरिका, ब्रिटेन और इजरायल ने मिल कर बगदादी और उस के संगठन आईएसआईएस को खड़ा किया है.

स्नोडेन ने अपनी इस बातचीत में खुलासा किया था कि वह इजरायल ही था, जिस ने बगदादी को हथियार चलाने की ट्रेनिंग दी थी. वास्तव में इस पूरे खुफिया षडयंत्र को जिस कोड नाम से अंजाम दिया गया था, वह था ‘बीहाइव’ यानी मधुमक्खी का छत्ता. स्नोडेन के मुताबिक बगदादी और उस के संगठन को खड़ा करने के पीछे अमेरिका और उस के साथी देशों का मकसद था कि इजरायल के आसपास वाले देशों में आतंकवाद की एक ऐसी ताकत खड़ी कर दी जाए, जिस से इजरायल के दुश्मन उस ताकत से लड़ने में ही उलझ कर रह जाएं और इस तरह इजरायल सुरक्षित रहे.

स्नोडेन के मुताबिक, जहां साल भर से ज्यादा समय तक इस काम को अंजाम देने के लिए इजरायल ने बगदादी को अत्याधुनिक हथियारों को चलाने की ट्रेनिंग दी थी, वहीं खुद अमेरिका ने भारीभरकम आर्थिक सहायता दे कर बगदादी से मिडिल ईस्ट के अपने दुश्मन देशों पर हमला कराया था. वास्तव में इस के पीछे मकसद था कि इस आतंक की दहशत से अमेरिका द्वारा मध्यपूर्व के उन तमाम देशों में भी अपनी सेना की तैनाती थी, जहां फिलहाल वह नहीं है या सन 2012-13 में नहीं था.

यह स्नोडेन का शिगूफा भी हो सकता है, लेकिन जहां तक आईएसआईएस के खौफनाक इतिहास की बात है तो उस की जड़ें हाल के इन सालों से भी कहीं पीछे हैं. वास्तव में इस संगठन के गठन का इतिहास सन 2004 से शुरू होता है. जब खूंखार आतंकवादी अबू मुस्सअब जरकावी ने जमातुत्तवहीद और अल जेहाद नामक संगठनों का गठन किया. जरकावी ओसामा बिन लादेन के नेतृत्व में काम कर चुका था. उस ने ओसामा की मदद से अपने संगठन का इराक में काफी हद तक विस्तार कर लिया था. दरअसल इस संगठन ने इराक में अमेरिका के हमले का बदला लेने की कसम खाई थी.

यही वजह थी कि इस ने इराक के कोनेकोने से नौजवानों को अमेरिकी सैनिकों के विरुद्ध लड़ने के लिए तैयार किया. अपनी आक्रामक अमेरिका विरोधी नीतियों के चलते यह संगठन न सिर्फ बहुत कम समय में ही इराकी युवाओं के बीच लोकप्रिय हो गया, बल्कि मध्यपूर्व और उस के बाहर के अन्य देशों के युवाओं में भी इस संगठन के प्रति तेजी से झुकाव बढ़ा. सन 2006 में अबू मुस्सअब जरकावी ने अपने एक वीडियो संदेश में अब्दुल्लाह रशीद अल बगदादी के नेतृत्व में मुजाहिदीन परिषद का गठन किया. लेकिन दुर्भाग्य से उसी महीने जरकावी मारा गया, जिस से उस की जगह अबू हमजा अल मुहाजिर को इराक में अलकायदा का मुखिया बना दिया गया.

सन 2006 के अंत तक इराक के और भी कई छोटेछोटे संगठन, जो अमेरिकी हमले के विरोध में छिटपुट मोर्चा संभाले हुए थे, वे सब भी इस से आ मिले और इस तरह इस संगठन का नाम हो गया ‘दौलतुल इस्लामिया फिल इराक वल शाम’, जिस का मतलब हम ऊपर ही बता चुके हैं. इस संगठन का मुखिया अबू उमर अल बगदादी था. संगठन का उद्देश्य बिलकुल साफ था, इराक से अमेरिका को उखाड़ फेंकना और इसलाम की पाबंद सरकार का गठन करना.

कौन है अबू बक्र अल बगदादी?

आज पूरी दुनिया जानना चाहती है कि खौफ का सौदागर अबू बक्र अल बगदादी आखिर है कौन और वह आईएसआईएस का मुखिया कब और कैसे बना? पहले यह जानते हैं कि आखिर ईदी अमीन और हिटलर से भी बड़ा खूंखार तानाशाह अबू बक्र अल बगदादी है कौन? बगदादी का जन्म सन 1971 में इराक के सामर्रा शहर में हुआ था. आज की तारीख में इस के कई नाम हैं जैसे, अल बदरी सामर्राई, अबू दुआ, डाक्टर इब्राहिम, अल कर्रार और अबू बक्र अल बगदादी.

बगदादी एक जमाने में दुनिया के आतंकी नंबर एक रहे ओसामा बिन लादेन की ही तरह बेहद पढ़ालिखा शख्स है. सच बात तो यह है कि वह ओसामा से भी ज्यादा पढ़ालिखा है. उस ने इस्लामिक स्टडीज से डाक्टरेट यानी पीएचडी कर रखी है. बगदादी बगदाद के इस्लामी विज्ञान विश्वविद्यालय से इस्लामी विज्ञान में मास्टर की डिग्री हासिल की है और बाद में यहीं से पीएचडी की डिग्री अर्जित की. बगदादी के पिता अल बदरी हैं. वह भी तकफीरी सलफी विचारधारा को मानते हैं. अबू बक्र बगदादी की कट्टरपंथ में आमद धर्म के प्रचार और उस की विधिवत शिक्षा से हुई. बचपन से ही उस में जेहाद के प्रति झुकाव था. इसीलिए वह इराक के दियाला और सामर्रा में जेहादी पृष्ठभूमि के 2 केंद्रों में से एक के रूप में उभरा.

तमाम जेहादी वेबसाइटों के मुताबिक वह अच्छीखासी आर्थिक और प्रतिष्ठित पृष्ठभूमि से है. सन 2003 में जब इराक में अमेरिकी सेनाओं ने घुसपैठ की थी, तभी वह अल जेहाद, जो बाद में अल दौलतुल इस्लामिया फिल इराक वल शाम बना, संगठन के साथ जुड़ गया था. वह बहुत दिलेरी के साथ अमेरिकी फौज से लड़ा था. उसी दौरान लड़ते हुए अमेरिकी फौजों द्वारा पकड़ लिया गया था, जिस की वजह से उसे सन 2005-09 तक दक्षिणी इराक में अमेरिकी सेना द्वारा बनाए गए गिरफ्तार आतंकी कैंप उर्फ बक्का जेल में रखा गया. सन 2009 में उसे अमेरिकी सेना ने छोड़ दिया, लेकिन अमेरिका के प्रति उस के गुस्से और नफरत में कमी नहीं आई.

वह सन 2010 में फिर से पुराने संगठन में ही लौट गया और पहले से कहीं ज्यादा ताकतवर ढंग से अमेरिकी फौजों पर हमले किए. इस के बाद की कहानी पूरी दुनिया जानती है कि कैसे उस ने खुद को दुनिया भर के मुसलमानों का खलीफा घोषित किया और कैसे इराक व सीरिया के तमाम ऐतिहासिक शहरों को खंडहरों में बदल दिया.

कैसे शुरू हुआ आईएसआईएस के खौफ का सफर?

एक लंबी लड़ाई के बाद अमेरिका इराक को सद्दाम हुसैन के चंगुल से आजाद करा चुका था. मगर इस आजादी को हासिल करने के लिए उसे बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ी थी. एक तरफ जहां इराक अमेरिकी फौजों के बूटों तले रौंदे जाने से तहसनहस हो चुका था, वहीं दूसरी तरफ अमेरिकी सेनाएं भी युद्ध लड़तेलड़ते पस्त हो चुकी थीं. जब अमेरिकी सेनाओं ने सन 2011 में इराक छोड़ा, तब वे इतनी जर्जर हो चुकी थीं कि उन के सामने ही धीरेधीरे सिर उठा रही फिदायीन ताकतों की अमेरिकी फौजों ने एक तरह से अनदेखी कर दी थी. अब तक सद्दाम हुसैन मारा जा चुका था. लेकिन इराक में आतंक का इंफ्रास्ट्रक्चर अब भी मौजूद था.

हालांकि यह बात भी थी कि अमेरिकी सेनाओं के जाने के बाद भी संसाधनों की कमी के चलते बगदादी जैसे आतंकी ज्यादा कुछ नहीं कर पा रहे थे. अब तक उस ने अपने संगठन का नाम आईएसआई यानी इस्लामिक स्टेट औफ इराक रख लिया था. बरबाद बगदाद में बड़े पैमाने पर सद्दाम हुसैन की सेना के ऐसे पुराने सैनिक मौजूद थे, जिन के अंदर गहरे तक ग्लानि और अवसाद था कि वे अमेरिकी फौजों को हरा नहीं पाए. अब तक अमेरिकी फौजें जा चुकी थीं, लेकिन उन की नुमाइंदगी कर रहीं मौजूदा इराकी सेनाओं को भी वे पुराने सिपाही देश के गद्दारों में गिनती कर रहे थे. यही कारण थे कि वे उन के खिलाफ लड़ने को बगदादी के आह्वान पर उस के संगठन आईएसआई से जुड़ गए.

बगदादी ने बड़ी ही खुशी और चतुराई से सद्दाम हुसैन की सेना के इन कमांडरों और सिपाहियों को अपने साथ मिला लिया. इस के बाद उस ने शुरुआती निशाना पुलिस, सेना के दफ्तर, चैक पौइंट्स और भरती दफ्तरों को बनाना शुरू किया. धीरेधीरे उसे सफलताएं मिलने लगीं और उस के लड़ाकों की संख्या कई हजार हो गई.

मगर अब भी बगदादी को इराक में वह कामयाबी नहीं मिल रही थी, जो उस के जेहन में थी. उसे लगा, शायद जर्जर इराक में यह कामयाबी उसे मिलेगी भी नहीं, इसलिए वह थोड़ी निराशा और बड़ी ही चतुराई से इराक छोड़ सीरिया पहुंच गया, जो एक तरह से इराक का पड़ोसी है. सीरिया उन दिनों जबरदस्त गृहयुद्ध की चपेट में था. अलकायदा और फ्री सीरियन आर्मी वहां के 2 सब से बड़े गुट थे, जो सीरियाई राष्ट्रपति असद के विरुद्ध मोर्चा बांधे थे. लेकिन सीरिया में भी घुसते ही उसे कामयाबी नहीं मिल गई. कई सालों तक सीरिया में भी बगदादी का कोई नामलेवा नहीं था.

अलबत्ता उस ने अब तक अपने संगठन का नाम एक बार फिर बदल लिया था और अब की बार वह आईएसआईएस हो चुका था, जोकि अभी तक है. बताने की जरूरत नहीं कि आईएसआईएस का मतलब इस्लामिक स्टेट औफ इराक ऐंड सीरिया था. एक  तरफ जहां बगदादी बड़े मंसूबे बांध कर यहां आया था, वहीं दूसरी तरफ असद की सेनाओं से दोदो हाथ कर रही फ्री सीरियन आर्मी जून, 2013 को अपने खस्ता हालत हो चुकने के चलते पहली बार सामने आई और इस के मुखिया ने दुनिया से अपील की कि उसे हथियार दिए जाएं, वरना असद की फौजें उसे नेस्तनाबूद कर देगी और निर्णायक रूप से वे महज एक महीने के अंदर हार जाएंगे.

यहां॒से॒पलटे॒आईएसआईएस॒के॒दिन

इस अपील के हफ्ते भर के अंदर ही अमेरिका, इजरायल, जौर्डन, टर्की, सऊदी अरब और कतर ने फ्री सीरियन आर्मी को हथियार, पैसे और ट्रेनिंग की मदद देनी शुरू कर दी. इन देशों ने बाकायदा सारे आधुनिक हथियार, एंटी टैंक मिसाइलें, गोलाबारूद, सब कुछ सीरिया पहुंचा दिया. बस यहीं से आईएसआईएस के दिन पलट गए.

दरअसल, हुआ यह कि जो हथियार फ्री सीरियन आर्मी के लिए आ रहे थे, बड़े पैमाने पर उन्हें या तो पहले ही रास्ते में आईएसआईएस के लड़ाकों ने लूट लिया या फ्री सीरियन आर्मी के तमाम कमांडर गुपचुप रूप से आईएसआईएस से जा मिले थे और इस तरह दुनिया भर से आए हथियारों का 90 फीसदी सीरियन आर्मी के पास पहुंचने के बजाय आईएसआईएस के पास पहुंच गए. फ्री सीरियन आर्मी में गहरी निराशा थी, इस का मुख्य कमांडर पहले ही हार की आशंका और हताशा का बयान दे चुका था. नतीजतन बचेखुचे फ्री सीरियन आर्मी के सदस्यों ने आईएसआईएस से लड़ने का इरादा त्याग दिया और ज्यादातर उसी से जा मिले.

अगर कहा जाए उन दिनों तमाम आईएस लड़ाके फ्रीडम फाइटर का नकाब ओढ़ कर हथियार लूटे और अमेरिकी कमांडरों से बेहतरीन ट्रेनिंग हासिल की तो भी गलत नहीं होगा, क्योंकि सीरिया में लड़ रहे संगठन फ्री आर्मी के पीछे अमेरिका की ही ताकत, हथियार और रणनीति रही है. एक बार जब बड़े पैमाने पर आईएसआईएस के पास हथियारों का जखीरा हो गया तो फिर उस ने खौफ का ऐसा कहर बरपाया कि हजारों लोगों को मौत के घाट उतारते हुए महज एक साल के भीतर सीरिया और इराक दोनों ही देशों के एक बड़े हिस्से में कब्जा कर लिया.

इन में इन दोनों देशों के तमाम बड़े शहर भी शामिल थे. इराक में तो आईएसआईएस अब लगातार बगदाद की तरफ कूच कर रहा था. दूसरी तरफ इस ने सीरिया के तमाम प्राचीन शहरों को अपने गोलाबारूद से खंडहरों में बदल दिया था. जून, 2014 से आईएसआईएस की लगातार विजयगाथा में हर रोज कोई न कोई नया पन्ना जुड़ रहा है, जो आज भी बदस्तूर जारी है. आईएसआईएस के आतंकी इराक और सीरिया के तकरीबन आधे से ज्यादा बड़े शहरों में आज की तारीख में कब्जा जमाए हुए हैं और अपनी सरकार चला रहे हैं.

आईएसआईएस ने सीरिया के रक्का, पामयेरा, दियर, इजौर, इसाक्का, एलेप्पो, हम्मास और यारमुक इलाके के तमाम शहरों पर कब्जा कर लिया है. इस ने इराक में भी रमादी, अनबार, तिकरित, मोसुल और फालुजा शहरों को तहसनहस कर दिया है और अब यहां इसी का हुक्म चलता है. मगर सवाल है कि क्या इराक की इस दुर्दशा के लिए यहां का शिया समुदाय दोषी है? एक तरह से देखें तो यही सच है, क्योंकि सद्दाम की मौत के बाद अमेरिका की सरपरस्ती में सन 2006 में यहां एक तथाकथित लोकतांत्रिक सरकार बनी, जिस के मुखिया शिया समुदाय के नूर अल मलीकी थे.

कहते हैं कि इस शिया सरकार ने इराक के सुन्नियों के साथ जबरदस्त भेदभाव किया था. जबकि अमेरिका ने न केवल इस ओर से आंखें मूंदे रखीं, बल्कि कहीं न कहीं इस सब को बढ़ावा भी दिया, ताकि इराक में अल्पसंख्यक मलीकी सरकार पर उस का मजबूत कब्जा बना रहे. इस का नतीजा यह निकला कि आईएसआईएस के पक्ष में इराक के ज्यादातर सुन्नी होते चले गए. कोढ़ में खाज की स्थिति यह हुई कि सन 2011 के बाद राष्ट्रपति ओबामा ने इराक से अपनी फौज वापस बुलाने का फैसला कर लिया. अमेरिकी सेनाओं के चले जाने के बाद हर गुजरते दिन के साथ आईएसआईएस इतना मजबूत होता गया कि इराक सरकार कमजोर होती गई.

आईएसआईएस के लड़ाकों की संख्या इसी बीच 10 हजार से बढ़ कर 1 लाख की संख्या भी पार कर गई है. लेकिन जिस समय आईएसआईएस ताबड़तोड़ खौफ की काररवाहियां कर के ज्यादा से ज्यादा इलाकों में कब्जा जमा रहा था, उस समय इराक की सेना उस से कई गुना ज्यादा संख्या में थी और ज्यादा हथियारों से भी लैस थी, फिर भी आईएसआईएस के लड़ाकों ने इराकी सेना से बड़े पैमाने में उस के टैंक, हेलीकौप्टरों और लड़ाकू विमान छीन लिए.

कैसे फंडिंग जुटाता है आईएसआईएस?

अखबार ग्लोबल न्यूज के मुताबिक आईएसआईएस आतंकी संगठन न सिर्फ दुनिया का सब से खूंखार और क्रूर संगठन है, बल्कि यह खर्च के मामले में भी बहुत शाहाना है. यह दुनिया का सब से धनी आतंकी संगठन है. माना जाता है कि इस के पास 1 हजार अरब डौलर से ज्यादा की संपत्ति है, जिस में से 5 सौ अरब डौलर की संपत्ति तो उस ने इराक के विभिन्न शहरों, बैंकों और तेल कुओं को लूट कर हासिल की है. यह आतंकी संगठन तकरीबन 9 हजार बैरल तेल रोज बेचता है और उस से हर दिन 26 करोड़ रुपए से ज्यादा कमाता है.

जब इराक के मोसुल शहर पर इस ने कब्जा किया था, उन दिनों 7 बैंकों को लूट कर कई करोड़ डौलर अपने खजाने में जमा कर लिए थे. कहते हैं, आईएसआईएस के पास इतना पैसा है कि वह अपने 60 हजार से 90 हजार के बीच लड़ाकों को हर महीने 42 हजार से 50 हजार रुपए महीने की तनख्वाह देता है, जबकि इस में खानापीना, रहना और सैक्स शामिल नहीं होता.

द एक्सप्रैस ट्रिब्यून और न्यूयार्क टाइम्स के हालिया रिपोर्टों के मुताबिक पाकिस्तान, इजिप्ट, जौर्डन, बांग्लादेश, अल्जीरिया, फिलिपींस, इंडोनेशिया, गाजा और लेबनान से न केवल इसे अपने 90 फीसदी लड़ाके मिलते हैं, बल्कि इन देशों से बड़े पैमाने पर हवाला के जरिए फंड भी इसे हासिल होता है. अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए के मुताबिक, 22 देशों से भी ज्यादा के 3 सौ बैंक आईएसआईएस के फंड जुटाने के काम में हाथ बंटाते हैं. इस सब के अलावा आईएसआईएस बडे़ पैमाने पर खुद भी फंड जुटाता है, जिस में एक जरिया है अफगानिस्तान में पैदा होने वाले हेरोइन को अमेरिका और यूरोप के बाजारों में बेचना.

माना जाता है कि आईएसआईएस हर साल तकरीबन 70 अरब रुपए की हेरोइन अकेले अमेरिका के बाजारों में बेच देता है. इस सब के अलावा तमाम मुसलिम देश विशेषकर सुन्नी मुसलमानों वाले देश इस खूंखार संगठन को लड़ने के लिए धन देते हैं. अमेरिकी खुफिया एजेंसियों के मुताबिक आईएसआईएस को फंड देने वाली सरकारों में कतर की सरकार भी शामिल है. हालांकि एडवर्ड स्नोडेन जैसे अमेरिका के भगोड़े जासूसों का तो यह भी कहना है कि एक बड़ी मात्रा में आईएसआईएस को अमेरिका भी फंडिंग करता है. हालांकि अमेरिका इस खुलासे को बकवास बताता है.

आईएसआईएस दुनिया का न सिर्फ पहला ऐसा खूंखार संगठन है, जिस ने तमाम देशों की ताकत को खुलेआम चुनौती दी है, बल्कि यह पहला ऐसा संगठन है, जिस के पास इतना धन है कि वह यूरोप के कई छोटे मगर विकसित देशों की अर्थव्यवस्था से टक्कर लेता है.

निस्संदेह इस की इस भारीभरकम अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान खुद उन आत्मघाती आतंकियों का है, जो अपनी जान हर समय हथेली पर रख कर दुनिया भर में आईएसआईएस के खौफ का सिक्का जमाते हैं. मसलन जिस आतंकी ने पेरिस में हमले की अगुवाई की थी (जिस हमले में 130 से ज्यादा लोग मारे गए थे) अकेले इस आतंकी ने 30 हजार यूरो या 32 हजार अमेरिकी डौलर का फंड उन आत्मघाती लड़ाकों के लिए इकट्ठा किया था, जिन्होंने इस हमले को अंजाम दिया था. इस से अंदाजा लगाया जा सकता है कि दुनिया का यह खूंखार संगठन क्यों कभी पैसे की दिक्कत महसूस नहीं करता.

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आईएसआईएस का खौफनाक चेहरा आखिर आईएसआईएस के युवा इतने दीवाने क्यों हैं?

एक संगठन, जो हजारों लोगों की मौजूदगी में पिंजरे में जानवरों की तरह बंद कर के बेकसूर पत्रकारों, मानवाधिकारों के लिए काम करने वाली युवतियों और विरोधी संगठनों के सैनिकों पर पैट्रोल छिड़क कर आग लगा देता है और उन के धूधू कर के जलने का सामूहिक उत्सव मनाता है. एक ऐसा संगठन, जो किसी मां के बेटे को ही मजबूर करता हो कि वह अपनी मां का सिर धड़ से अलग कर दे. एक ऐसा संगठन, जो बाकायदा 4-4 कैमरों के सामने इस बर्बरता से विदेशी पत्रकारों की गरदन हलाल करता हो, जैसे बकरे की कुरबानी कर रहा हो.

एक ऐसा संगठन, जो ज्ञानविज्ञान की हजारों किताबों को यह कह कर जला देता हो कि ये युवाओं को इसलाम से विमुख कर रही हैं. सवाल है, ऐसे क्रूर और खौफनाक संगठन में शामिल होने के लिए दुनिया भर से युवक और युवतियां भागे क्यों चले आते हैं? ट्यूनीशिया के गृहमंत्री लोफी बेन जेडौअ के मुताबिक तो उन के देश से हजारों युवतियां सीरिया में विद्रोह की कमान संभाले लड़ाकों को सैक्स सुख देने के लिए तथा उन के साथ कंधे से कंधा मिला कर लड़ने के लिए चोरीछिपे देश से भाग रही हैं. ट्यूनीशिया के गृहमंत्री इसे ‘सैक्स जिहाद’ की संज्ञा देते हैं और उन के मुताबिक इसे चला रही हैं खुद ट्यूनीशिया की युवतियां.

यह बात संसद के भीतर कही गई है, जिस से इस की गंभीरता पर सवाल नहीं उठाया जा सकता. बेन के मुताबिक, ‘ये औरतें 20, 30 या 100 के करीब विद्रोहियों के साथ सैक्सुअल रिलेशनशिप बनाती हैं. वे इसे जिहाद-अल-निकाह (सैसुअल होली वार) की संज्ञा देते हैं और प्रैग्नेंट हो कर घर लौट आती हैं.’ इस से अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस संगठन के प्रति युवाओं में चाहे वे लड़कियां हों या लड़के, एक अजीब किस्म की दीवानगी है. पिछले 3 सालों में हिंदुस्तान से भी कई दर्जन युवक चोरीछिपे इस में हिस्सा लेने के लिए जा चुके हैं, जिन में से कइयों को एयरपोर्ट से वापस किया गया है तो कइयों के शहीद होने की खबरें ही लौट कर आई हैं.

जबकि यह संगठन अपने लड़ाकों से भी क्रूरता बरतने में पीछे नहीं रहता. अगर इसे अंदाजा हो गया कि कोई लड़ाका छोड़ कर भागने की फिराक में है तो यह संगठन बहुत नृशंसता से उस लड़ाके को बाकी तमाम लड़ाकों के सामने मौत के घाट उतार देता है, जिस से कि बाकी लड़ाके खौफ से भर जाएं और कभी वापस जाने का साहस न कर सकें.

यह संगठन लड़कियों के साथ तो और भी ज्यादा क्रूर है. यह संगठन लड़कियों को 7 से 9 साल की उम्र में भी शादी को मंजूरी देता है और 16 साल तक में हर हाल में शादी करने की हिदायत देता है. यह संगठन खुलेआम अपने लड़ाकों को सैक्स के लिए महिलाओं की मांग करता है और साफ चेतावनी देता है कि अगर उस की बात अनसुनी की गई तो खैर नहीं. यह हैरानी की ही बात है कि इस के बावजूद इस अमानवीय और बर्बर संगठन के प्रति लड़कियां और लड़के खिंचे चले आते हैं. सवाल है कि आखिर क्यों? उन में इस के लिए इतनी दीवानगी क्यों है?

ये कुछ ऐसे सवाल हैं, जो सिर्फ पत्रकारों को ही नहीं, पूरी दुनिया के समाजशास्त्रियों और सरकारों को भी परेशान कर रहे हैं. दि इंस्टीट्यूट फौर स्ट्रैटजिक डायलौग की एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, सीरिया या इराक जाने वाले करीब 3 हजार यूरोपीय युवाओं में 5 सौ से ज्यादा युवतियां शामिल हैं. कुछ तो किशोर उम्र की और कुछ भले ही अपवाद के तौर पर हों, मगर 50 साल के पार की प्रौढ़ महिलाएं भी हैं.

‘बिकमिंग मुलान’ नामक इस रिपोर्ट के मुताबिक वास्तव में ये तमाम महिलाएं फिर चाहे वे जिस उम्र समूह से रिश्ता रखती हों, इस बात से प्रभावित होती हैं कि मुसलमानों के लिए नए इलाके का निर्माण हो रहा है. एक नई दुनिया, जहां किसी और के लिए कोई जगह नहीं होगी. यहां तक कि मुसलमानों में भी गैरसुन्नियों के लिए भी नहीं.

इसीलिए तमाम सुखसुविधाओं में पलीबढ़ी पश्चिमी देशों, विशेषकर अमेरिका और इंग्लैंड की लड़कियां भी रोमांचित हो कर इस सपने वाले देश या भूखंड की तरफ कूच कर रही हैं. जाहिर है, वे उस सपने का हिस्सा होना चाहती हैं. यहां तक कि युद्ध के मोर्चे पर डंट कर भी और लड़ाकों के लिए सेज में बिछ कर भी. सवाल है, क्या ये युवा, खासकर लड़कियां दिमागी रूप से बीमार हैं? समाजशास्त्रियों की मानें तो हां, कुछकुछ ऐसा ही है. इन में से कई युवाओं का व्यक्तित्व कई हिस्सों में बंटा सा लगता है, विशेषकर युवतियों का. ऐसी कुछ महिलाओं, जिन के बारे में माना जाता है कि वे इस वक्त सीरिया या इराक में हैं, के ट्विटर या फेसबुक एकाउंट को देखने पर भी यह बात साफ प्रतीत होती है.

क्योंकि ये महिलाएं जहां एक पल को किसी फिल्म से संबंधित कोई बात कहती हैं या अपने पालतू कुत्ते के बच्चे के साथ अपनी वाल पर तसवीर लगाती हैं, वहीं दूसरे ही पल वे किसी सार्वजनिक जगह पर आईएस के लड़ाकों की किसी का सिर काटते या नृशंसता से पेश आने वाली तसवीरें पोस्ट कर रही होती हैं. सवाल है, आखिर ये महिलाएं ऐसा क्यों कर रही हैं? बहुचर्चित हो रही बिकमिंग मुलान रिपोर्ट के मुताबिक वास्तव में ये महिलाएं भी वही चाहती हैं, जो इन दिनों आईएसआईएस की तरफ आकर्षित दुनिया भर के खासतौर पर पश्चिम के युवा मुसलिम चाहते हैं या कहें जिन बातों से मुसलिम युवक प्रेरित हैं, उन्हीं से महिलाएं भी प्रेरित हैं.

मुसलिम युवाओं की तरह ही ये मुसलिम महिलाएं भी आईएसआईएस की तरफ खलीफा के शासन की स्थापना, पश्चिम से नफरत, पहचान की तलाश जैसे वैचारिक कारणों से प्रेरित हैं. आईएस के आतंकियों के उन के कब्जे वाले इलाके में, ऐसे ही अफगानिस्तान या बाल्कन में सक्रिय कट्टरपंथियों से इसलिए भूमिका बिलकुल अलग है, क्योंकि आईएस के आतंकी यहां एक राष्ट्र का निर्माण करना चाह रहे हैं. इसलिए यहां स्थानीयता के साथ कोई टकराव नहीं है.

इसीलिए ये गतिविधियां आतंक के मनोविज्ञान से ऊपर उठ कर एक ‘राष्ट्र निर्माण’ की प्रक्रिया का हिस्सा हो जाती हैं. इसीलिए इस में भाग लेते हुए महिलाएं भी इतिहास रचने वालों में शामिल होना चाहती हैं. फिर चाहे भले ही लड़ाकों के लिए सैक्स परोस कर या उन के लिए घर की देखरेख कर के ही क्यों न ये संभव हो. सच तो यह है कि ज्यादातर महिलाएं अपनी भूमिका घर की देखरेख करने वाले के तौर पर ही देख रही हैं. इसीलिए ये महिलाएं जेहादियों को अपने पति के रूप में चुन रही हैं. कुछ महिलाओं के सोशल मीडिया एकाउंट के अनुसार, जिहादी लड़ाके से शादी करने पर उन्हें घर इत्यादि की सुविधाएं मिलती हैं यानी इस उन्माद में आर्थिक असुरक्षा भी एक कारण है.

इन महिलाओं की मंशा को उजागर करने वाली कई वेबसाइटों के मुताबिक सीरिया में होने का दावा करने वाले कुछ लोग ‘खलीफा के राज्य’ में शादी की संभावना से जुड़े सवालों का जवाब देते हैं. हालांकि इन में से कई शादियां ज्यादा समय तक नहीं चलतीं, क्योंकि उन के पति लड़ाई में मारे जाते हैं. ऐसे में ये महिलाएं ट्विटर पर अपने पतियों के शहीद हो जाने की घोषणा करती हैं. आईएस से तेजी से जुड़ रही ये महिलाएं एक मामले में पुरुषों से काफी हद तक अलग हैं. इन में से ज्यादातर ने इस्लाम में धर्मांतरण  किया है यानी ये जन्म से मुसलमान नहीं थीं. इसलिए ये इस्लाम से बहुत गहरे तक वाकिफ भी नहीं हैं. शायद यही इस सवाल का जवाब भी है कि कमउम्र की लड़कियां ऐसा माहौल क्यों स्वीकार करना चाहती हैं?

असली सवाल इन के इस्लाम की ओर झुकाव का है. आईएस की तरफ तीव्रता से आकर्षित हो रही ज्यादातर लड़कियों की उम्र 18 से 25 साल के बीच है. इस्लाम ग्रहण करने वाली इन ज्यादातर लड़कियों को इस्लाम धर्म के बारे में बिलकुल भी पता नहीं होता. वास्तव में उन्होंने इंटरनेट पर इस के बारे में सर्च किया होता है, जैसा आम लोग करते हैं.

उन्होंने यूट्यूब पर ऐसे वीडियो देखे होते हैं, जिन में अतिशयोक्तिपूर्ण दावे किए गए होते हैं. धर्म के बारे में जानने के लिए उन के पास यही एक आधुनिक और आसान रास्ता होता है. ऐसी लड़कियां न कभी मसजिद गई होती हैं, न किसी लाइब्रेरी. वे सौ प्रतिशत यूट्यूब, गूगल, सोशल मीडिया पर निर्भर होती हैं. इसीलिए ये इस्लाम की संवेदनशीलता से परिचित नहीं होतीं. ऐसे में ये अपना भी नुकसान करती हैं और इस्लाम को भी बदनाम करती हैं. ISIS Terrorist Organization

 

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