Emotional Story: इंसान की मृत्यु पर किसी का वश नहीं चलता, किंतु युवा हरीश राणा को 13 साल कोमा में जीवनमौत से संघर्ष करते हुए देखना उस के पेरेंट्स के लिए कितना असहनीय और असाधारण था...इस की केवल कल्पना ही की जा सकती है. उन्होंने जब इस से छुटकारा पाने के लिए कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, तब लंबी कानूनी जंग के बाद ही बेटे की अंतिम विदाई हो पाई. पढ़ें, हरीश राणा की दुर्घटना से इच्छामृत्यु तक की पूरी कहानी.

नई दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के पैलिएटिव डिपार्टमेंट में 24 मार्च, 2026 की शाम के समय नि:शब्द शांति थी. जबकि वहीं एडमिट विशेष मरीज हरीश राणा के बैड के पास वार्डबौय से ले कर नर्सों और डौक्टरों तक के बीच चहलकदमी तेज बनी हुई थी.

शाम के सवा 4 बजने वाले थे. उस के पेरेंट्स भी बैड के एक किनारे चुपचाप खड़े थे. दोनों अपने बेटे हरीश के सामने हाथ जोड़े थे. वे सिर कभी ऊपर तो कभी सामने नीचे झुका रहे थे. भावशून्य चेहरे पर उदासी और निश्चिंतता के भाव बने हुए थे. वार्ड में मौजूद तमाम चिकित्साकर्मी अपनेअपने काम में व्यस्त थे. उन में से ही एक डौक्टर हरीश राणा के पेरेंट्स के पास एक परची ले कर आया और वह उन की ओर बढ़ा दी.

डौक्टर के कुछ बोले बिना ही वे समझ गए कि परची में क्या लिखा होगा. उन की आंखों की कोर से आंसू बह निकले. डौक्टर के साथ आई नर्स ने उन की आंखों से आंसू पोंछ डाले. वह 3 शब्द बोली, ''मुक्ति मिल गई.’’

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