Crime Story: दिल्ली पुलिस का सिपाही रविंद्र एक समृद्ध परिवार से था. लेकिन अपनी बुरी लतों की वजह से उस पर लाखों रुपए का कर्ज हो गया. इस कर्ज को अदा करने और सुखसुविधाओं वाली जिंदगी जीने के लिए उस ने अपने अपहरण का जो ड्रामा रचा, उस से आखिर उसे क्या मिला…

किसी पुलिस वाले के साथ कोई वारदात पेश आ जाए तो पूरा पुलिस विभाग बिजली की सी गति से सक्रिय हो जाता है. इस की 2 प्रमुख वजहें होती हैं. एक तो यह कि वह विभाग का आदमी होता है, दूसरे प्रतिष्ठा दांव पर लगने के साथ कानूनव्यवस्था पर भी सवालिया निशान लग जाते हैं. सिपाही रविंद्र के मामले में भी ऐसा ही हुआ था. उस के अपहरण की खबर से पुलिस विभाग में हड़कंप मच गया था.

उत्तर प्रदेश के कृषि प्रधान जनपद बागपत के एसएसपी रविशंकर छवि ने एएसपी विद्यासागर मिश्र और सीओ श्वेताभ पांडेय के निर्देशन में आननफानन में पुलिस टीमों का गठन कर उस की तलाश में लगा दिया था. रविंद्र के अपहरण से न सिर्फ उस के परिवार वाले परेशान थे, बल्कि गांव वाले भी हैरान थे. अपहर्त्ताओं ने उसे छोड़ने के बदले 20 लाख रुपए की फिरौती मांगी थी. सिपाही रविंद्र कुमार जिला बागपत के थाना चांदीनगर के गांव ढिकौली का रहने वाला था. वह दिल्ली पुलिस में था और उस समय दिल्ली के थाना नरेला में तैनात था.

उस का परिवार काफी मजबूत हैसियत और रसूख वाला था. उस के पिता राजकुमार दिल्ली पुलिस से सबइंसपेक्टर सेवानिवृत्त हुए थे. गांव में उन के पास काफी खेतीबाड़ी थी. रविंद्र का एक और भाई था सुधीर, जो गांव में ही रहता था. दिल्ली के थाना नरेला में तैनात रविंद्र, बीचबीच में छुट्टी ले कर घर भी आता रहता था. वह छुट्टी पर घर आया था, तभी 22 फरवरी, 2016 की सुबह रहस्यमय स्थितियों में उस का अपहरण हो गया था. अपहरण की सूचना मिलते ही थानाप्रभारी अमर सिंह पंवार पुलिस बल के साथ उस के घर पहुंच गए थे. मामला चूंकि सिपाही के अपहरण का था, इसलिए एएसपी विद्यासागर मिश्र और सीओ श्वेताभ पांडेय भी पहुंच गए थे.

रविंद्र के घर वालों ने पुलिस को जो बताया, उस के अनुसार रविंद्र सुबह 10 बजे के करीब घर से थोड़ी दूरी पर अपने चचेरे भाई सत्यवीर और पड़ोसी सुकरमपाल से बातें कर रहा था. सत्यवीर और सुकरमपाल अपनेअपने घर चले गए. रविंद्र भी अपने घर की ओर आ रहा था, तभी वह रहस्यमय स्थितियों में गायब हो गया था. वह कहां, किस के साथ गया, इस की किसी को खबर नहीं थी. उस के घर वालों ने सोचा कि वह छुट्टी पर आया है, इसलिए गांव में किसी से मिलने चला गया होगा. लेकिन दोपहर 12 बजे के आसपास सुधीर के मोबाइल पर उस के मोबाइल से फोन आया. सुधीर ने फोन उठा कर पूछा, ‘‘हैलो रविंद्र कहां हो तुम?’’

सुधीर को तब झटका लगा, जब पलभर की खामोशी के बाद दूसरी ओर से रविंद्र के बजाय किसी दूसरे आदमी की आवाज आई, ‘‘रविंद्र हमारे कब्जे में है. अगर तुम उसे सहीसलामत पाना चाहते हो तो बहुत जल्द 20 लाख रुपए का इंतजाम कर लो.’’

यह सुन कर सुधीर के पैरों तले से जमीन खिसक गई. वह सन्न रह गया. उस ने हकलाते हुए कहा, ‘‘अ…अ…आप कौन बोल रहे हैं?’’

‘‘इस बात पर ज्यादा ध्यान मत दो. जितना कहा है, उतना करो.’’ कुछ पल रुक कर फोन करने वाले ने कहा, ‘‘और हां, पुलिस को खबर करने की गलती मत करना, वरना हम रविंद्र को जिंदा नहीं छोड़ेंगे.’’

इतना कह कर फोन करने वाले ने फोन काट दिया. उस ने पलट कर फोन किया तो मोबाइल स्विच्ड औफ हो चुका था. इस से घर वाले घबरा गए. रविंद्र की जान खतरे में थी. अपहर्त्ता उस के साथ कुछ भी कर सकते थे. अपहर्त्ताओं ने पुलिस में न जाने की धमकी दे कर उलझन पैदा कर दी थी. घर वालों ने आपस में विचारविमर्श किया. वे किसी नतीजे पर पहुचं पाते, एक घंटे बाद दोबारा दूसरे नंबर से फोन आया. इस बार उस ने कहा, ‘‘पैसे का इंतजाम जल्द से जल्द करो. पैसा कहां पहुंचाना है, इस के लिए हम दोबारा फोन करेंगे.’’

‘‘रविंद्र को कुछ नहीं होना चाहिए.’’ रविंद्र के घर वालों ने कहा.

‘‘कुछ नहीं होगा, लेकिन अगर पैसे नहीं मिले और तुम ने पुलिस को खबर कर दी तो हम अपना वादा भूल जाएंगे. फिर वह आप को जिंदा नहीं मिलेगा.’’ अपहर्त्ता ने धमकी भरे लहजे में कह कर फोन काट दिया.

राजकुमार बेटे के अपहरण से बुरी तरह परेशान थे. उन्होंने पुलिस की नौकरी की थी. मामले को छिपाना ठीक नहीं था, इसलिए उन्होंने पुलिस को सूचना दे दी. इस के बाद पुलिस उन के घर पहुंच गई. पुलिस को उम्मीद थी कि अपहर्त्ताओं ने रविंद्र को आसपास कहीं खेतों में छिपा दिया होगा, इसलिए पुलिस ने आसपास के खेतों में उस की तलाश शुरू कर दी. लेकिन इस का कोई नतीजा नहीं निकला. पुलिस ने गांव के अन्य लोगों से इस उम्मीद में पूछताछ की कि कोई सुराग या चश्मदीद मिल जाए. लेकिन इस का भी कोई फायदा नहीं हुआ. इस बीच थाने में रविंद्र के भाई सुधीर की तहरीर पर अज्ञात अपहर्त्ताओं के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया गया.

पुलिस अधिकारी पसोपेश में थे. इस बात का अंदेशा था कि रविंद्र का अपहरण किसी बड़े गिरोह ने किया होगा. अपहर्त्ता उसे नुकसान भी पहुंचा सकते थे. क्राइम ब्रांच की टीम को भी इस मामले में लगा दिया गया. अगले दिन रविंद्र के अपहरण की खबर अखबारों में छपी तो जिले में सनसनी फैल गई. थानाप्रभारी अमर सिंह पंवार अपने सहयोगियों एसआई सतबीर सिंह भाटी और कर्मवीर सिंह के साथ सुरागरसी में लगे थे. जिस नंबर से अपहर्त्ताओं का फोन आया था, पुलिस ने उस नंबर की जांच की. उस की लोकेशन गाजियाबाद जिले के लोनी इलाके की पाई गई.

तुरंत एक पुलिस टीम गाजियाबाद भेजी गई. पुलिस के साथ रविंद्र के घर वाले और नातेरिश्तेदार भी अपने स्तर से उस की खोजबीन में जुटे थे. लेकिन उस का कुछ पता नहीं चल रहा था. दिल्ली पुलिस को भी इस की सूचना दे दी गई थी. अपने सिपाही के अपहरण के बारे में जान कर थाना नरेला पुलिस सन्न रह गई थी. अपहर्त्ताओं ने उस दिन के बाद घर वालों से कोई संपर्क नहीं किया था. इस बात ने पुलिस की चिंता और बढ़ा दी थी. पुलिस रविंद्र की खोजबीन में लगी थी कि एक नाटकीय घटना घट गई. अगले दिन रविंद्र ने शाम को अपने घर वालों को फोन किया कि वह खेकड़ा इलाके में रेलवे स्टेशन के पास है, वे उसे लेने आ जाएं. घर वाले वहां पहुंचे तो रविंद्र डरासहमा खड़ा मिल गया. वे उसे घर ले आए.

इस की सूचना पुलिस को दी गई तो पुलिस उस के घर पहुंच गई. उस की सकुशल रिहाई से घर वाले खुश थे. इस बीच चर्चएं भी चलीं कि घर वाले उसे फिरौती दे कर ले आए हैं. रविंद्र बेहद हताश नजर आ रहा था. पुलिस ने उस से पूछताछ की तो उस ने बताया कि सुबह जब वह घर की ओर जा रहा था, तभी एक कार उस के पास आ कर रुकी. कार की ड्राइविंग सीट पर बैठे शख्स ने उस की तरफ एक विजिटिंग कार्ड बढ़ा कर कहा, ‘‘भाईसाहब, यह पता बता देंगे?’’

रविंद्र विजिटिंग कार्ड चेहरे के नजदीक ला कर पढ़ने लगा, तभी उसे चक्कर आ गया. बस उतने में ही कार सवार बदमाशों ने उसे खींच कर कार में डाल लिया. रविंद्र के अनुसार, विजिटिंग कार्ड में कोई ऐसा नशीला पदार्थ था, जो सांसों के जरिए शरीर में गया और उसे चक्कर आ गया. बदमाशों ने उस के साथ मारपीट कर के उस का मोबाइल छीन लिया. एक बदमाश ने कहा, ‘‘हम ने तुम्हारा अपहरण किया है. अब हम तुम्हें तभी छोडेंगे, जब हमें 20 लाख रुपए मिल जाएंगे.’’

रविंद्र ने पूरी ताकत से विरोध किया, छूटने की भी कोशिश की. इस पर बदमाशों ने उस के साथ मारपीट कर के हथियार तान कर कहा, ‘‘जरा भी चालाकी दिखाई तो तुम्हारा काम तमाम कर देंगे.’’

वे कार से उसे कहीं दूर ले गए और खेत में बांध कर बैठा दिया. इस बीच उन्होंने जबरन उसे नशे की गोलियां खिला कर उसे पानी पिला दिया. बीचबीच में उसे होश आता रहा. वह बुरी तरह आतंकित था. अगले दिन बदमाश आपस में बातें कर रहे थे कि मामला पुलिस तक पहुंच गया है. पुलिस एड़ीचोटी का जोर लगा रही है. इसलिए इसे ज्यादा रखा गया तो खतरा बढ़ सकता है. पुलिस एनकाउंटर के डर से शाम के समय वे उसे कार में डाल कर खेखड़ा कस्बे तक लाए और स्टेशन के पास धकेल कर चले गए.

पुलिस ने रविंद्र से बारीकी से पूछताछ करनी चाही तो उस ने कहा, ‘‘सर, मेरी तबीयत अभी ठीक नहीं है. मेरे साथ जो हुआ है, मैं उसे भूलना चाहता हूं. मैं ने कभी सोचा भी नहीं था कि बदमाश मेरा ही अपहरण कर लेंगे.’’

पुलिस को लगा कि इस की मनोस्थिति अच्छी नहीं है, लेकिन यह साफ हो गया था कि पुलिस के बढ़ते दबाव के चलते अपहर्त्ताओं ने उसे छोड़ दिया था. रविंद्र भले ही अपहर्त्ताओं के चंगुल से छूट कर आ गया था, लेकिन पुलिस अपहर्त्ताओं तक पहुंचना चाहती थी. अपहर्त्ताओं के नंबर के साथ पुलिस ने अगले दिन रविंद्र के मोबाइल की भी लोकेशन हासिल कर ली. उसे देख कर पुलिस को हैरानी हुई, क्योंकि रविंद्र के मोबाइल की लोकेशन उन स्थानों से नहीं मिल रही थी, जहांजहां उस ने अपहर्त्ताओं द्वारा ले जाने की बात बताई थी.

अपहरण के बाद उस के मोबाइल की लोकेशन दिल्ली के नांगलोई की भी थी. यह बड़ी अजीब बात थी. पुलिस ने उस से गहराई से पूछताछ करनी चाही तो वह कन्नी काटते हुए बोला, ‘‘सर, जो होना था, सो हो गया. जांच करने से क्या फायदा. बदमाशों ने मुझे जिंदा छोड़ दिया, यही बहुत बड़ी बात है, वरना वे मेरी जान भी ले सकते थे.’’

यह बात पुलिस अधिकारियों को अजीब लगी. क्योंकि रविंद्र खुद पुलिस वाला था. वह पुलिस जांच में सहयोग देने से न जाने क्यों कतरा रहा था. इस से पुलिस को दाल में काला नजर आने लगा. लेकिन कोई पुख्ता वजह पुलिस के हाथ नहीं लगी. इस बीच पुलिस को पता चला कि अपहर्त्ताओं ने जिस नंबर से फिरौती के लिए फोन किया था, वह सिमकार्ड दिल्ली के नरेला से खरीदा गया था. जांच को दिशा मिली तो पुलिस सिम बेचने वाले तक पहुंच गई. पुलिस ने सिम बेचने वाले अबरार को हिरासत में ले लिया.

अबरार नरेला का ही रहने वाला था और मोबाइल की दुकान चलाता था. पुलिस ने जब उस से पूछताछ की तो उस ने जो बताया, सुन कर पुलिस चकरा गई. पता चला कि वह सिम सिपाही रविंद्र ने ही खरीदा था. जांच नाटकीय मोड़ पर आ गई. पुलिस ने 25 फरवरी को रविंद्र को हिरासत में ले लिया. पहले तो वह सिम खरीदने वाली बात से इनकार करता रहा, लेकिन जब पुलिस ने मोबाइल लोकेशन दिखा कर अबरार से उस का सामना कराया तो वह टूट गया. पुलिस ने जब उस से विस्तार से पूछताछ की तो उस ने जो बताया, वह बेहद चौंकाने वाला था.

बुरी लतों के शिकार रविंद्र ने खुद ही अपने अपहरण की ऐसी पटकथा लिखी थी, जिस से वह अपने ही घर वालों से फिरौती के रूप में मोटी रकम वसूल करना चाहता था. दरअसल, रविंद्र महत्वकांक्षी युवक था. उस ने पुलिस की नौकरी जरूर कर ली थी, लेकिन वेतन के रूप में मिलने वाली रकम से वह संतुष्ट नहीं था. वह तमाम सुखसुविधाओं के बीच ऐश की जिंदगी जीना चाहता था. जल्द अमीर बनने की चाहत में वह पुलिस होने के बावजूद जुएसट्टे की लत का शिकार हो गया था. इस तरह की लत इंसान को बर्बादी की ही ओर ले जाती है. रविंद्र के साथ भी ऐसा ही हुआ.

धीरेधीरे वह करीब 5 लाख रुपए का कर्जदार हो गया था. बड़ा झटका तब लगा, जब जनवरी, 2016 के पहले सप्ताह में वह 44 हजार 600 रुपए सट्टे में हार गया. इस से उसे बड़ा झटका लगा. इस बीच एएसआई बनने के लिए वह एग्जाम भी दे चुका था. रविंद्र ने सोचा था कि वहां भी शायद उसे रकम खर्च करनी पडे, जबकि उस के पास कोई जमापूंजी नहीं थी. वह चाहता था कि उस के पास स्विफ्ट डिजायर कार हो. वह चाहता तो सब्र व समय के साथ घर वालों की मदद से उस की ये इच्छाएं पूरी हो सकती थीं, लेकिन सोच फितरती हो जाए तो बेलगाम हो जाती हैं. रविंद्र के साथ भी ऐसा ही हुआ. उस ने सोच लिया कि एक ही झटके में वह अपने सारे सपने पूरे कर लेगा.

कई दिनों की उधेड़बुन के बाद उस ने अपने ही अपहरण का नाटक कर के घर वालों से रुपए वसूलने की योजना बनानी शुरू कर दी. योजना के तहत उस ने अबरार की दुकान से फर्जी पते पर 2 सिमकार्ड खरीद कर एक्टिवेट करा लिए. योजना को अंजाम देने के लिए वह छुट्टी पर घर आ गया. 22 फरवरी की सुबह अपने चचेरे भाई और पड़ोसी से बात करने के बाद वह घर की तरफ चला जरूर, लेकिन उन लोगों के ओझल होते ही चुपचाप गांव से बाहर निकल गया. खेतों के रास्ते से होते हुए उस ने रास्ते से ही आवाज बदल कर अपने मोबाइल से फिरौती के लिए अपने  भाई को फोन कर दिया. आवाज बदलने की वह पहले ही कई दिनों से प्रैक्टिस कर रहा था.

वहां से निकल कर पहले वह लोनी पहुंचा, जहां से नए सिमकार्ड से उस ने एक बार फिर आवाज बदल कर फिरौती की रकम मांगी और धमकाया भी. इस के बाद वह दिल्ली पहुंचा और नांगलोई में रुक गया. रविंद्र को पूरी उम्मीद थी कि उस की जान की कीमत पर घर वाले फिरौती की रकम दे देंगे और उस की धमकी से डर कर पुलिस को सूचना नहीं देंगे. लेकिन ऐसा हुआ नहीं, घर वालों ने पुलिस को सूचना दे दी. उस ने अगले दिन के अखबार देखे तो अपने अपहरण को ले कर पुलिस की सक्रियता की खबर पढ़ कर उस के होश उड़ गए. इस से उसे अपनी योजना धराशाई होती नजर आई.

वह जानता था कि सर्विलांस के जरिए उस की पोल खुल जाएगी. उस ने अपनी योजना बदल दी. वह नहीं चाहता था कि उस के अपहरण की जांच पुलिस आगे बढ़ाए. उस ने सोचा कि अगर वह सकुशल वापस घर पहुंच जाएगा तो मामला अपने आप ठंडे बस्ते में चला जाएगा. पुलिस जांच को आगे नहीं बढाएगी. इसी सोच के तहत वह अगले दिन खेखड़ा पहुंचा और घर वालों को फोन कर के अपने पास बुला लिया. घर आ कर उस ने पुलिस और घर वालों को मनगढंत कहानी सुना दी. पुलिस बारीकियों में न जाए, इस के लिए उस ने पहले तबीयत खराब होने का बहाना और फिर जांच न करने का आग्रह किया. लेकिन वह अपने ही बुने जाल में उलझ गया. पुलिस ने उस के मोबाइल से वह सिमकार्ड बरामद कर लिया.

पूछताछ के बाद एएसपी विद्यासागर मिश्र ने प्रेसवार्ता कर के उसे पत्रकारों के सामने पेश किया. बाद में रविंद्र और अबरार को अदालत में पेश किया. माननीय अदालत ने दोनों को 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया. कथा लिखे जाने तक दोनों जेल में थे. उन की जमानतें नहीं हो सकी थीं. योजना में रविंद्र का कोई साथी तो नहीं शामिल था. पुलिस इस की भी जांच कर रही थी. रविंद्र बुरी लत का शिकार न हुआ होता  और अपनी महत्वाकांक्षाओं को काबू में रखा होता तो आज यह नौबत न आती. बागपत पुलिस की रिपोर्ट के आधार पर दिल्ली पुलिस ने भी उसे सस्पैंड कर दिया था. हालांकि जेल जाने से पूर्व रविंद्र का कहना था कि उस का अपहरण हुआ था और बदमाशों ने ही फिरौती मांगी थी. उस पर लगे आरोप गलत हैं. Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

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