Struggle Story : भारतीय संगीत जगत की दिग्गज पाश्र्वगायिका आशा भोसले ने अपनी बहुमुखी प्रतिभा और जादुई आवाज से विश्व भर में अपनी पहचान बनाई. 7 दशकों से अधिक के करिअर में उन्होंने शास्त्रीय संगीत से ले कर पौप और गजल तक, हजारों गाने गाए. सब से अधिक रिकौर्डिंग कागिनीज बुक औफ वल्र्ड रिकौर्डउन के नाम है. उन्हेंदादा साहब फाल्केऔरपद्म विभूषणजैसे सर्वोच्च सम्मानों से नवाजा गया है. पढि़ए कि इस के लिए उन्हें कैसेकैसे संघर्षों से गुजरना पड़ा?

जानीमानी पाश्र्वगायिका और पंडित दीनानाथ मंगेशकर की बेटी आशा भोसले का 12 अप्रैल, 2026 को 92 वर्ष की आयु में निधन हो गया. आशा भोसले पंडित दीनानाथ मंगेशकर की बेटी थीं. उन के पिता का जन्म गोवा के एक छोटे से गांव मंगेशी में 29 दिसंबर, 1900 को हुआ था.

दीनानाथजी बहुत कम उम्र में ही अपनी संगीत यात्रा और काम की तलाश में गोवा से महाराष्ट्र आ गए थे. वे अपने जन्म स्थान से इतना प्यार करते थे कि जब वे महाराष्ट्र आए तो उन्होंने अपना पुराना उपनाम ‘अभिषेकी’ या ‘नवाथे’ छोड़ कर ‘मंगेशकर’ अपना लिया, ताकि उन की पहचान हमेशा उन के गांव मंगेशी से बनी रहे. पंडित दीनानाथ मंगेशकर की 5 संतानें हुईं, जिन में सब से बड़ी लता मंगेशकर, मीना खडीकर, आशा भोसले, ऊषा मंगेशकर व हृदयनाथ मंगेशकर थीं.

दीनानाथ मंगेशकर की मृत्यु 24 अप्रैल, 1942 को महाराष्ट्र के पुणे में हुई थी. बताया जाता है कि 1930 के दशक के अंतिम वर्षों में वे गंभीर आर्थिक तंगी से जूझ रहे थे, जिस के कारण उन का स्वास्थ्य काफी गिर गया था. उन्हें पीलिया और लिवर संबंधी बीमारियां हो गई थीं. महान गायक दीनानाथ मंगेशकर की बेटी होने के कारण संगीत मानो बच्चों के खून में था. बचपन से ही घर का माहौल सुरों से भरा रहता था. महाराष्ट्र के सांगली में सितंबर 1933 में आशा ने अपनी आंखें खोलीं तो उस के कानों में सब से पहले शास्त्रीय संगीत की गूंज पड़ी.

आशा का बचपन सुरों के बीच बीता. लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था. जब आशा केवल 9 वर्ष की थीं, तब उन के पिता का साया सिर से उठ गया. मां शेवंती मंगेशकर के लिए सिर्फ एक पति का खोना नहीं था, यह पूरे परिवार के सहारे का खत्म हो जाना था. अब घर में न कमाई थी, न सहारा. बस एक मां थी और 5 छोटे बच्चे. उन्होंने अपने बच्चों को संभाला, उन्हें टूटने नहीं दिया. घर की आर्थिक स्थिति बेहद खराब थी. कभीकभी खाने तक के लाले पड़ जाते थे.

पिता की डैथ के बाद परिवार पुणे से कोल्हापुर और उस के बाद मुंबई आ गया. परिवार की सहायता के लिए आशा और इन की बड़ी बहन लता मंगेशकर ने गाना और फिल्मों में अभिनय शुरू कर दिया. छोटी सी उम्र में ही लता मंगेशकर ने गाना शुरू किया. मां ने उन्हें हिम्मत दी. यह दुनिया का शायद इकलौता ऐसा परिवार है, जहां पांचों भाईबहनों ने एक ही क्षेत्र (संगीत) में काम किया और सभी ने ऊंचाइयों को छुआ.

महान गायक आशा भोसले की कहानी कुछ अलग ही है. उन्होंने 14 साल की उम्र से ले कर 92 साल के इस आखिरी सांस तक यानी जिंदगी के करीब 78 साल तक बहुत ही उतारचढ़ाव का सामना किया. दुनिया ने उन्हें हमेशा एक बिंदास, बेबाक और खुशमिजाज इंसान के रूप में देखा. लेकिन परदे के पीछे की सच्चाई यह रही कि वह एक ऐसी मां, एक ऐसी पत्नी और एक ऐसी बहन रहीं, जिसे अपनों ने ही सब से ज्यादा खून के आंसू रुलाए.

पिता का साया उन के सिर से हमेशा के लिए उठ जाने के बाद घर की पूरी जिम्मेदारी और संगीत की विरासत का पूरा बोझ रातोंरात बड़ी बहन लता मंगेशकर के कंधों पर आ गया. लताजी ने पूरे परिवार को एक मुखिया की तरह संभाला, लेकिन इस वजह से आशा को अपना बचपन मारना पड़ा. उन्हें हमेशा अपनी बड़ी बहन के विशाल साए में दब कर रहना पड़ा.

उन के अंदर का वह अकेलापन उस घुटन भरे माहौल में सांस लेने के लिए तड़पने लगा. अपनी इसी घुटन और किसी भी कीमत पर आजादी पाने की चाहत में आशा ने अपनी जिंदगी का सब से पहला और शायद सब से खतरनाक कदम उठा लिया.

16 की उम्र में प्यार

सिर्फ 16 साल की कच्ची और नासमझ उम्र में उन्हें एक ऐसे इंसान से प्यार हो गया, जो हर लिहाज से उन के लिए उचित नहीं था. वह शख्स गणपतराव भोसले थे, जो उम्र में आशा से पूरे 15 साल बड़े यानी 31 साल के थे. नीम चढ़े करेला यह है कि वह लता मंगेशकर के ही पर्सनल सेक्रेटरी थे.

जब यह खबर मंगेशकर परिवार में पहुंची तो वहां एक भयंकर तूफान आ गया. लताजी ने साफ शब्दों में चेतावनी दे दी कि अगर आशा ने यह शादी की तो वह अपनी बहन से जिंदगी भर बात नहीं करेंगी और उस के लिए मंगेशकर परिवार के दरवाजे हमेशा के लिए बंद हो जाएंगे.

लेकिन उस अंधे प्यार और आजादी की जिद में आशा ने किसी की एक न सुनी. उन्होंने अपने पूरे परिवार से बगावत कर दी और घर से भाग कर गणपत राव भोसले से शादी रचा ली. उन्हें लगा कि जिस पिंजरे में वह अब तक कैद रही, यह इंसान उन्हें वहां से निकाल कर एक खुली और प्यार भरी दुनिया में ले जाएगा, लेकिन उन का यह भरम ऐसे टूट गया, जैसे शीशा जमीन पर गिर कर चकनाचूर हो जाता है.

शादी के कुछ ही महीनों बाद गणपत राव का असली और खूंखार चेहरा आशा के सामने आ गया. गणपत राव आशा को अपनी पत्नी नहीं बल्कि सिर्फ पैसा छापने की एक मशीन समझने लगा. एक तरफ आशा को छोटी उम्र में ही रिकौर्डिंग स्टूडियो के चक्कर काटने पड़ते. दिनरात मेहनत करके गाना पड़ता और दूसरी तरफ घर वापस लौटने पर उन्हें अपने उसी पति की गालियां और मारपीट सहनी पड़ती. वह बात बातबात पर आशा के चरित्र पर अंगुली उठाते.

किसी संगीतकार या गायक ने आशा से हंस कर बात कर ली तो घर आने पर आशा को इस की कड़ी सजा भुगतनी पड़ती. 11 सालों तक आशा ने इस नर्क को खामोशी से बरदाश्त किया. क्योंकि अपने परिवार से उन के संबंध विच्छेद हो गए थे और वह तब तक 2 बच्चों की मां बन चुकी थीं. उन्हें अपने बच्चों के भविष्य की चिंता थी.

धक्के मार कर निकाला

एक दिन गणपत राव ने सारी इंसानियत को ताक पर रख दिया. उन्होंने आशा से उस की सारी खून पसीने की कमाई छीन ली. उन्हें बहुत बुरी तरह पीटा और आधी रात को घर से बाहर धक्के मार कर निकाल दिया. मुंबई की उस अनजान सड़क पर एक अकेली और बेसहारा औरत खड़ी थी. उस के एक हाथ में उन का रोता हुआ छोटा बेटा हेमंत और दूसरे हाथ में डरी हुई बेटी वर्षा थी. अपनों से ठुकराई हुई वह औरत उस रात कहां जाती? उस समय वह गर्भवती भी थीं.

इस तरह 11 साल बाद आशा भोसले और गणपत राव के बीच शादी का बंधन टूट गया. मां के घर के दरवाजे उन के लिए बंद हो चुके थे और उन के पास इस के अलावा कोई रास्ता भी नहीं था. आखिरकार उन्हें वही दरवाजा खटखटाना पड़ा, जिसे वह सालों पहले छोड़ कर चली गई थीं. इस तरह वह अपने मायके लौट आईं.

मायके में उन्हें छत तो मिल गई, लेकिन वहां भी उन्हें वो अपनापन और सुकून नहीं मिला, जिस की एक टूटी हुई औरत को सब से ज्यादा जरूरत होती है. बड़ी बहन लता मंगेशकर के साथ उन के रिश्ते इस शादी की वजह से पहले ही खराब थे. एक ही छत के नीचे रहते हुए भी दोनों बहनों के बीच सालों से कोई बातचीत नहीं हुई.

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बड़ी बहन लता मंगेशकर के साथ उन के रिश्ते काफी खराब थे. एक ही छत के नीचे रहते हुए भी दोनों बहनों के बीच सालों तक कोई बातचीत नहीं थी.

आशा अपने ही घर में एक अजनबी और अछूत की तरह जिंदगी गुजारने पर मजबूर हो गईं. अपने 3 बच्चों को पालने के लिए आशा को दरदर की ठोकरें खानी पड़ीं. उस समय फिल्मी दुनिया में लता मंगेशकर का जादू चलता था. कोई भी बड़ा संगीतकार या फिल्म निर्माता लताजी को नाराज करने का जोखिम नहीं उठाना चाहता था.

हर कोई इस बात से डरता कि अगर उन्होंने आशा को काम दिया तो कहीं लताजी उन से नाराज न हो जाएं. इस डर की वजह से आशा को कभी कोई बड़ा या सीधासादा रोमांटिक गाना नहीं दिया गया. आशा की झोली में सिर्फ वही गाने आते  जैसे किसी क्लब में नाचने वाली कैब डांसर के गाने, किसी खलनायिका के होंठों पर सजने वाले उत्तेजित गीत या फिर बहुत ही छोटे बजट की सी ग्रेड फिल्मों के सस्ते गाने आशा के हिस्से में आते थे.

लेकिन एक मां को अपने बच्चों का पेट भरने के लिए किसी भी हद तक जाना मंजूर होता है. आशा ने अपने आंसुओं और अपने अपमान को पीया और उन गानों को अपनी आवाज दी. उन्होंने लोकल ट्रेनों में धक्के खाए. रिकौर्डिंग स्टूडियो के बाहर भूखे पेट घंटों इंतजार किया. इंडस्ट्री के लोग मुंह पर तो उन के गानों की तारीफ कर देते, लेकिन पीठ पीछे उन के चरित्र को ले कर भद्दी बातें करते. उन्हें हमेशा एक दोयम दरजे की गायिका माना गया. लता की तरह उन्हें कभी सम्मान भरी निगाहों से नहीं देखा गया.

अपनी ही सगी बहन के सामने हर रोज खुद को साबित करने की यह जंग और लोगों के तानों का यह जहर उन्हें अंदर ही अंदर खोखला कर रहा था. वह एक ऐसे अंधेरे भंवर में डूबती जा रही थीं, जहां से बाहर निकलने का कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था. तभी उन की मुलाकात ओ.पी. नय्यर से हुई. एक ऐसे संगीतकार थे, जो अपनी अलग सोच और जिद के लिए जाने जाते थे. लता की किसी बात से छुब्ध हो कर अचानक नय्यर साहब ने एक फैसला लिया कि वह लता मंगेशकर के साथ काम नहीं करेंगे. यह फैसला जितना बड़ा था, उतना ही जोखिम भरा भी था. लेकिन इसी फैसले ने आशा भोसले की किस्मत बदल दी.

नय्यर साहब ने आशा की आवाज में वह बात देखी, जो शायद उस समय किसी और ने नहीं देखी थी. शरारत, अदा और एक वेस्टर्न स्टाइल की झलक, आशा की आवाज में छिपी हुई वो कशिश, वो दर्द और वो खनक नय्यर साहब ने बहुत करीब से पहचान ली. इन दोनों ने मिल कर रिकौर्डिंग स्टूडियो के अंदर दिनरात एक कर दिया. वह ऐसा दौर रहा, जब आशा को अपनी काबिलियत साबित करने की और अपनी बहन के साए से बाहर निकलने का एक सुनहरा अवसर मिला था. लगभग 1954-55 से शुरू हुआ यह सफर 1960 के दशक में अपने चरम पर पहुंच गया.

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आशा भोलसे ने किशोर कुमार के साथ कई सुपरहिट गाने गए

लेकिन हर कहानी में एक मोड़ आता है. 1970 के दशक की शुरुआत में दोनों के बीच मतभेद बढऩे लगे. धीरेधीरे यह दूरी इतनी बढ़ गई कि दोनों ने साथ काम करना बंद कर दिया. किस्मत ने आशा के नसीबों में सुकून और खुशियां बहुत कम लिखी थीं. अगस्त 1972 का वह दिन भारतीय संगीत के इतिहास में एक ऐसा अनसुलझा राज बन कर रह गया, जिस का जवाब आज तक किसी को नहीं मिल पाया.

ओ.पी. नय्यर और आशा के बीच अचानक एक ऐसी भयानक तकरार हुई, जिस ने इस 14 साल पुराने रिश्ते को हमेशा के लिए तबाह कर दिया. उस दिन रिकौर्डिंग स्टूडियो के बंद दरवाजे के पीछे क्या हुआ? किस ने क्या कहा और बात इतनी कैसे बिगड़ गई? यह आज तक कोई नहीं जान पाया. उस मनहूस दिन आशा स्टूडियो से बुरी तरह रोते हुए और कांपते हुए बाहर निकलीं. उस के बाद उन्होंने जिंदगी में कभी ओ.पी. नय्यर की तरफ पलट कर नहीं देखा.

किसी ने आशा के उस दर्द को और उन के आंसुओं को समझने की कोशिश नहीं की. बल्कि उल्टा लोगों ने इस अलगाव को भी आशा के स्वार्थ और उन की चालाकी का ही नतीजा बता दिया. लोग कहने लगे कि आशा ने अपने फायदे के लिए नय्यर साहब का इस्तेमाल किया और अब जब उन का काम निकल गया तो उन्हें छोड़ दिया. इस दूसरे भयानक टूटन के बाद आशा अंदर से पूरी तरह बिखर गईं. अलग होने के बाद भी दोनों ने अपनेअपने रास्ते पर काम किया, लेकिन जो जादू उन्होंने साथ मिल कर रचा था, वह फिर कभी दोहराया नहीं जा सका.

पंचम दा से दूसरी शादी

आशा भोसले अपनी पहली शादी टूटने के बाद करीब 20 साल तक अकेली रहीं. 47 साल की उम्र में 1980 में उन की शादी हुई. उन्होंने दूसरी शादी मशहूर म्यूजिक कंपोजर आर.डी. बर्मन (राहुल देव बर्मन) से की, जिन्हें सब पंचम दा के नाम से बुलाते थे. वह उम्र में आशा भोसले से 6 साल छोटे थे.

आशा भोसले अपनी पहली शादी टूटने के बाद करीब 20 साल तक अकेली रहीं. 47 साल की उम्र में 1980 में उन्होंने दूसरी शादी आर.डी. बर्मन (पंचम दा) से की

यह सिर्फ आशा भोसले की ही नहीं, बल्कि आर.डी. बर्मन की भी दूसरी शादी थी. आशा भोसले की आर.डी. बर्मन से शादी आसानी से नहीं हुई थी, क्योंकि उन की मां इस के खिलाफ थीं. बताया जाता है कि आर.डी. बर्मन की मां ने उन से साफ कह दिया था कि अगर यह शादी होगी तो उन की लाश के ऊपर से गुजरने के बाद होगी. तब आर.डी. बर्मन मान गए और कुछ नहीं कहा. मां इसलिए खिलाफ थीं क्योंकि एक तो आशा उम्र में आर.डी. बर्मन से बड़ी थीं और फिर 3 बच्चों की लथेडऩ भी उन के साथ थी.

लेकिन जब आर.डी. बर्मन के पिता का देहांत हुआ तो उन की मां की हालत बिगड़ गई. वह अपनी मानसिक स्थिति खो बैठीं. तब आर.डी. बर्मन ने उन्हीं की खातिर आशा भोसले से शादी कर ली. आर.डी. बर्मन से शादी के बाद आशा भोसले बहुत खुश थीं. दोनों ने साथ में फिल्मों में खूब गाने बनाए और गाए. पंचम दा उस वक्त के सब से आधुनिक, बिंदास और नए विचारों वाले संगीतकार माने जाते थे. उन्होंने आशा की आवाज में एक अलग ही रौकस्टार वाली झलक देख ली.

जहां दुनिया आशा को सिर्फ दर्द भरे या कैबरे गानों तक सीमित मानती, वहीं पंचम दा ने उन्हें पाश्चात्य पौप और क्लासिकल धुनों का एक ऐसा अनोखा मिश्रण दिया, जिस ने उन्हें पूरी दुनिया के युवाओं की पहली पसंद बना दिया. ‘सर पर टोपी लाल हाथ में रेशम का रुमाल हो तेरा क्या कहना…’, ‘पिया तू अब तो आजा…’ और ‘दम मारो दम…’ जैसे गानों ने आशा को शोहरत की एक ऐसी बुलंदी पर पहुंचा दिया, जहां पहुंचना हर गायक का सपना होता है. पंचम दा स्वभाव से बहुत ही हंसमुख और सुलझे हुए इंसान रहे. स्टूडियो में साथ काम करते हुए और संगीत की नईनई धुनें बनाते. इन दोनों के टूटे हुए दिल थे. जिस के कारण दोनों ही एकदूसरे को बहुत करीब से समझने लगे.

पंचम दा खुद अपनी पहली शादी टूटने का भयानक दर्द झेल चुके थे और अकेलेपन की मार सह रहे थे और आशा की जिंदगी तो पहले से ही जख्मों का एक ऊंचा अंबार थी. दोनों ने एकदूसरे के दर्द को महसूस किया. एकदूसरे के आंसू पोंछे और एक बहुत ही मजबूत सहारा बन गए. शुरुआत के कुछ साल इन दोनों की जिंदगी बहुत ही खूबसूरत और खुशहाल गुजरी. ऐसा लगने लगा आशा को आखिरकार इतनी तकलीफों और आंसुओं के बाद वो मुकम्मल जहां मिल गया, जिस की तलाश में वह अपनी आधी जिंदगी दरदर भटकती रहीं.

पंचम दा ने आशा के बच्चों को भी बहुत प्यार दिया और एक असली पिता की तरह उन्हें अपनाया. घर में हंसीमजाक गूंजने लगा और संगीत की महफिलें सजने लगीं. आशा भोसले की किस्मत में यह खुशी भी ज्यादा दिन के लिए नहीं लिखी थी. 80 के दशक का आखिरी दौर आतेआते वक्त ने एक बार फिर करवट ली और यह करवट बहुत ही खौफनाक साबित हुई. पंचम दा का करिअर अचानक ढलान पर आने लगा.

उन दिनों फिल्म इंडस्ट्री में नए संगीतकारों की पूरी फौज आ गई. पंचम दा की धुनों को पुराना माना जाने लगा. कई बड़े निर्माता- निर्देशकों ने उन्हें काम देना बंद कर दिया. उन की धुनें उतनी लोकप्रिय नहीं रहीं. संवेदनशील कलाकार होने के कारण यह असफलता उन्हें गहरे अवसाद में ले गई. इस दौर में उन्होंने तनाव और बेइज्जती को भुलाने के लिए शराब पीनी शुरू की. इस भयानक नाकामी और बेइज्जती ने पंचम दा को अंदर तक तोड़ कर रख दिया. वह एक बहुत ही संवेदनशील कलाकार रहे और अपनी इस हार को बरदाश्त नहीं कर पाए.

पंचम दा का बरताव पूरी तरह से बदलने लगा. आशा भोसले के घर एक बार फिर उस पुराने और दर्दनाक माहौल में तब्दील होने लगा, जिसे आशा सालों पहले पीछे छोड़ कर आई थीं. दिनरात शराब की लत की वजह से दोनों के बीच दूरियां बढऩे लगीं, जो बहुत गहरी होती चली गईं. आशा को अब इस उम्र में अपने जवान होते बच्चों के भविष्य, उन की पढ़ाई और उन के अपने बचेखुचे करिअर की भी चिंता सताने लगी. वह एक तरफ अपने पति को शराब के गर्द में डूबते हुए देख रही थीं और दूसरी तरफ अपने बच्चों को संभाल रही थीं.

फिर लगा एक लांछन

जब हालात बिलकुल बेकाबू हो गए, तब मजबूर हो कर आशा ने पंचम दा के उस घर को छोड़ दिया और अपने बच्चों के साथ एक अलग फ्लैट में रहने लगीं. हालांकि वह रोज पंचम दा के घर जातीं. उन के लिए अपने हाथों से खाना पकातीं. उन की दवाइयों का ध्यान रखतीं और उन का पूरा खयाल रखतीं. इस तरह आर.डी. बर्मन का साथ सिर्फ 14 साल रहा. 4 जनवरी, 1994 को पंचम दा का निधन हुआ, आशाजी उस वक्त एक समारोह के लिए बाहर थीं, इस तरह आर.डी. बर्मन उन्हें हमेशा के लिए छोड़ कर चले गए.

उन की मौत का जिम्मेदार भी आशा भोसले को बताया गया. इस भयंकर लांछन ने आशा को पूरी तरह से अंदर तक खामोश कर दिया. उन्हें अपनी हर एक सांस के लिए इस बेदर्द समाज को सफाई देनी पड़ रही थी. वह अंदर से एक जिंदा लाश बन गई थी. ऐसा लगने लगा कि शायद अब उन की जिंदगी में आंसू बहाने के अलावा कुछ और बचा ही नहीं है. पर कहते हैं कि दुख कभी अकेले नहीं आता. दुनिया के तानों और पंचम दा के जाने का गम अभी पूरी तरह से भरा भी नहीं कि नियति ने आशा के लिए एक ऐसी रूह कंपा देने वाली त्रासदी लिख कर रखी थी, जिस ने उन्हें सचमुच जीते जी मार डाला.

जिस औरत ने अपनी पूरी जिंदगी, अपना पूरा करिअर और अपनी हर खुशी सिर्फ अपने बच्चों के लिए कुरबान कर दी, उस औरत को अपने ही बच्चों की मौत का वो खौफनाक मंजर अपनी आंखों से देखना पड़ा. आशा की इकलौती बेटी वर्षा भोसले अपनी मां के बहुत करीब रही. वर्षा बहुत ही टैलेंटेड एक शानदार लेखिका और एक अच्छी गायिका भी रही, लेकिन उनकी जिंदगी भी अपनी मां की तरह ही दुखों और अवसाद के भंवर में फंस गई थी.

वर्षा की शादीशुदा जिंदगी बहुत ही बुरी तरह नाकाम हो गई. तलाक के बाद वह पूरी तरह टूट गई और भयानक डिप्रेशन का शिकार हो गई. आशा ने अपनी बेटी को इस अंधेरे से बाहर निकालने की हर मुमकिन कोशिश की. वह अपनी बेटी का इलाज करवातीं. उसे हमेशा अपने साथ रखतीं और उस का सहारा बनने की कोशिश करतीं. लेकिन 8 अक्तूबर, 2012 का दिन आशा की जिंदगी का सब से काला दिन साबित हुआ. यह घटना सुबह के वक्त हुई थी. वर्षा ने अपनी मां के ही घर ‘प्रभु कुंज’ में खुद को गोली मारी थी. पुलिस जांच में सामने आया था कि वर्षा ने जिस पिस्तौल का इस्तेमाल किया था, वह लाइसैंसी थी और कथित तौर पर आशा भोसले की ही थी.

उस दिन आशा एक कांसर्ट के सिलसिले में सिंगापुर में मौजूद थीं. तभी उन्हें मुंबई से एक फोन आया. फोन सुन कर उन के पैरों तले जमीन खिसक गई. फोन पर खबर मिली कि 56 साल की वर्षा ने मुंबई के उसी परेड रोड वाले फ्लैट प्रभु कुंज में खुद को गोली मार कर आत्महत्या कर ली है. सोचिए, जो सात समंदर पार बैठी है और उसे खबर मिलती है कि उस की बेटी का खून से लथपथ शरीर उसी के घर में पड़ा है. उस मां के दिल की हालत क्या हुई होगी?

आशा तुरंत फ्लाइट पकड़ कर मुंबई लौटीं. जब उन्होंने अपनी बेटी के उस निर्जीव शरीर को देखा तो उन के मुंह से एक आवाज तक नहीं निकल पाई. उन की आंखों के आंसू जैसे हमेशा के लिए सूख गए. आशा ने अपनी पूरी जिंदगी दुनिया से लड़ाई की ताकि उन के बच्चों को कोई तकलीफ न पहुंचे, लेकिन उन की अपनी ही बेटी ने जिंदगी से हार मान कर मौत को गले लगा लिया.

प्रौपर्टी विवाद बना तमाशा

मीडिया ने इस भयानक मौके पर भी आशा को नहीं बख्शा. वर्षा की आत्महत्या को ले कर भी कई तरह के विवाद खड़े हो गए. लोगों ने कहना शुरू कर दिया कि आशा अपनी बेटी को वक्त नहीं दे पाई या फिर मंगेशकर परिवार के आपसी झगड़ों ने वर्षा को आत्महत्या करने पर मजबूर कर दिया.

इस घटना ने आशा की बचीखुची रूह को भी पूरी तरह से जला कर राख कर दिया. लेकिन इस दर्दनाक सफर का अंत यहीं नहीं हुआ. वर्षा के जाने के 3 साल बाद आशा के सब से बड़े बेटे हेमंत की भी मौत हो गई. हेमंत भोसले भी संगीत की दुनिया में अपना नाम कमाना चाहते थे. उन्होंने कुछ फिल्मों में संगीत भी दिया, लेकिन उन्हें वह कामयाबी कभी नहीं मिल पाई, जिस की उन्हें उम्मीद रही.

अपनी असफलताओं और पारिवारिक तनाव से दूर भाग कर हेमंत स्काटलैंड में जा कर बस गए. वहां उन्हें कैंसर जैसी भयानक बीमारी ने जकड़ लिया. साल 2015 में कैंसर से लड़ते हुए हेमंत ने भी इस दुनिया को अलविदा कह दिया. अपनी आंखों के सामने अपने 2 जवान बच्चों को खोने का दुख किसी भी इंसान को पागल कर देने के लिए काफी होता है. आशा की उम्र तब 80 के पार हो चुकी थी. उस ढलती उम्र में जब इंसान को अपने बच्चों के सहारे की सब से ज्यादा जरूरत होती है, तब वह अकेली औरत अपने बच्चों के जाने का मातम मना रही थी.

जिस आवाज ने पूरी दुनिया को झूमने पर मजबूर कर दिया, उसी आवाज में अब सिर्फ एक खौफनाक सन्नाटा और मौत का मातम पसरा था. वह बंद कमरे में अपने बच्चों की तसवीरें सीने से लगाए फूटफूट कर रो रही थीं. इन सारे पारिवारिक दुखों के अलावा उन के बुढ़ापे में उन की जिंदगी एक और नए विवाद का अखाड़ा बन गई. यह विवाद उन के नातीपोतों और परिवार के बीच उन की संपत्ति को ले कर था.

परिवार के आपसी क्लेश ने उन्हें बुढ़ापे में भी सुकून से जीने नहीं दिया. अपनी जिंदगी के आखिरी सालों में जब इंसान सिर्फ शांति चाहता है, तब आशाजी को कोर्टकचहरी, वकीलों और पारिवारिक राजनीति के बीच घिसटना पड़ा. जिस औरत ने अपने खूनपसीने से करोड़ों की दौलत कमाई. अपने परिवार का नाम रोशन किया. उसी के अपने लोग उस दौलत के लिए आपस में लड़ते नजर आए. उन की अपनी कोई दुनिया बची ही नहीं.

लता दीदी के जाने के बाद तो वह और भी ज्यादा अकेली पड़ गईं. दोनों बहनों के बीच चाहे जितने भी गिलेशिकवे रहे हों, परंतु जवानी ढलने के बाद बुढ़ापे में वे एकदूसरे का बहुत बड़ा सहारा बन चुकी थीं. लताजी के निधन ने आशा को पूरी तरह से तोड़ दिया. एकएक कर के उन के सारे अपने उन के सारे साथी इस दुनिया से रुखसत होते चले गए और वो अकेली उस बड़े से आलीशान घर में अपनी मौत का इंतजार करने को मजबूर हो गईं.

छोटा बेटा आनंद भोसले है, जो न सिर्फ मां आशा भोसले के करिअर को मैनेज करता रहा है, बल्कि उन का रेस्टोरेंट बिजनैस भी संभालता है. आशा भोसले जब भी टेलीविजन पर किसी गायन प्रतियोगिता या रियलिटी शो में बतौर मेहमान बन कर जातीं तो लोग उन्हें चमकती हुई खूबसूरत साडिय़ों, हीरों के जेवर और मोतियों की मालाओं में सजा हुआ देख कर यही सोचते कि इस औरत की जिंदगी कितनी खुशनसीब और मुकम्मल है. मंच पर वह हंसतीं, मुसकरातीं और लोगों के साथ अपने पुराने किस्से साझा करतीं.

लेकिन उस झूठी मुसकान के पीछे के आंसुओं को देखने वाली आंखें इस दुनिया में किसी के पास नहीं थीं. जब वह उस चकाचौंध भरे मंच से अपने घर में कदम रखतीं तो वहां कोई उन का स्वागत करने वाला नहीं होता. वहां कमरे का खालीपन और जिंदगी भर के मिले हुए धोखे उन का इंतजार करते.

उन्होंने अपनी गायकी से पूरी दुनिया का मनोरंजन किया. जब देश का श्रोता उदास होता तो वह आशा के गाए हुए मस्ती भरे गीत सुन कर अपना गम भुला लेता, लेकिन खुद आशा को अपने गम भुलाने के लिए कोई दवा या कोई गीत नहीं मिला.

इंसान जब उम्र के इस आखिरी पड़ाव पर पहुंचता है तो वह चाहता है कि उस के नातीपोते उस के पास बैठ कर उस की कहानियां सुनें. उस का परिवार उस के साथ बैठ कर खाना खाए, लेकिन आशा की किस्मत में यह सुख भी नहीं लिखा था.

12 अप्रैल, 2026 को ब्रीच कैंडी अस्पताल में 92 साल की उम्र में आशाजी का निधन हो गया

दौलत और संपत्ति के झगड़ों ने परिवार के बचे हुए लोगों को भी एकदूसरे का दुश्मन बना दिया और आशा इन सब के बीच एक तमाशा बन कर रह गईं. अंतत: 12 अप्रैल, 2026 को 92 वर्ष की आयु में यह मशहूर गायिका दुनिया से रुखसत कर गई. अब बची हैं तो गीतों के रूप में उन की यादें.

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