Emotional Story Hindi: कहीं रेगिस्तान तो कहीं बर्फ ही बर्फ, कहीं पहाड़ तो कहीं जंगल, ऐसी दुर्गम जगहों पर देश की सुरक्षा में तैनात सैनिकों के जज्बे के बारे में हम कहसुन या पढ़ तो सकते हैं, लेकिन उन की हिम्मत और परेशानियों को सही मायनों में माप नहीं सकते. शहीद लांसनायक हनुमंथप्पा और उन के साथियों की शहादत से लोगों को यह पता चल गया है कि हमारे सैनिकों में मौत से लड़ने का अद्भुत जज्बा होता है.

एवरेस्ट से थोड़ी कम ऊंचाई पर बर्फ की एक ऐसी बेजान दुनिया बसी है, जहां का आसमान तो क्या, जमीन भी इंसानी जिंदगी की दुश्मन है. यह जमीन तो क्या हिम का ऐसा सैलाब है, जिस पर प्रशिक्षित हिमयोद्धा ही चलनेफिरने की हिम्मत कर सकते हैं. 3 फरवरी, 2016 की सुबह ऐसे ही 10 योद्धाओं की एक टीम के सभी सदस्य इग्लूनुमा फाइबर प्लास्टिक के बने शिविर में अपनेअपने आर्कटिक स्लीपिंग बैगों में घुसे यह जानने की कोशिश कर रहे थे कि खतरा टल गया है या नहीं?

दरअसल, इस टीम को पहली फरवरी को सूचना मिली थी कि एवलांच (बर्फीला तूफान) आने वाला है. तब यह टीम 19,500 फुट की ऊंचाई पर स्थित सोनम पोस्ट पर थी, जो माउंट एवरेस्ट के कैंप-2 के बराबर ऊंचा है. यहां पर एवलांच के खतरे के बारे में दिन में 3 बार सूचना फ्लैश की जाती है. फरवरी की पहली तारीख शांति से गुजर गई थी. वही स्थिति 2 फरवरी की भी रही.

सोनम चौकी पर तैनात भारतीय सेना के जवानों में थे हवलदार एलुमलाई एम., लांस हवलदार एस. कुमार, लांसनायक हनुमंथप्पा कोप्पड़, सुधीश बी, सिपाही मुश्ताक, ए. सूर्यवंशी, महेश पी.एन., रामामूर्ति एन. और गणेशन. इन 9 हिमयोद्धाओं के ऊपर ट्रुप लीडर के रूप में जेसीओ सूबेदार नागेशा टी.टी. थे. इन सभी का संबंध 19 मद्रास बटालियन से था. जहां पर इन की तैनाती थी, वह सोनम पोस्ट चर्चित बानाटौप के दाईं ओर थोड़ा नीचे की ओर है. चेतावनी के बावजूद इन सैनिकों को खतरे का सामना करने की नौबत नहीं आई थी. इन लोगों ने 2 और 3 फरवरी की रातें बातें करते हुए गुजारीं. अन्य पोस्टों के रेडियो सैट पर भी औपरेटरों से इन की बातें होती रहीं. बातों के दौरान वे उन्हें अपने बारे में बताते भी रहे.

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