Hindi Stories: पैराशूट के सिद्धांत पर बना पैराग्लाइडर मानव की आकाश में पक्षियों की तरह उड़ने की चाह को पूरा कर रहा है, शायद इसीलिए दिनोंदिन इस की लोकप्रियता बढ़ती जा रही है. इस की रैलिया आयोजित होने लगी है…

भारत में यूरोप के 2 खेल, कार रैली और हैंग ग्लाइडिंग बहुत लोकप्रिय हुए हैं. कार रैली की शुरुआत भारत में सन 1980 में हुई तो हैंग ग्लाइडिंग की शुरुआत 1984 में. देश में कार रैली शुरू करने का श्रेय मुंबई के नाजिर हुसैन को जाता है. वह खुद सफल कार रैली चालक रह चुके हैं. जबकि आकाशीय जोखिम भरे हैंग ग्लाइडिंग खेल की शुरुआत भारत में पुणे के ईएमई में कार्यरत मेजर विवेक मुंडकर ने की. पैरा ग्लाइडिंग के बारे में पाठकों को अन्य जानकारी दें, पहले आइए हैंग ग्लाइडिंग के बारे में  बता दें. यूं तो हैंग ग्लाइडिंग की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रैली 1984 में आयोजित हुई, पर इस खेल से देशवासियों को परिचित करवाने में मेजर विवेक मुंडकर की अहम भूमिका रही है.

मेजर ने इस खेल के बारे में जो बताया, उस के अनुसार, सन 1975 की बात है. तब उन की पोस्टिंग पूना के सीएमई कालेज में थी. उन दिनों उन के चचेरे भाई अमेरिका से आए हुए थे. उन्होंने उन्हें आकाशीय खेल हैंग ग्लाइडिंग के बारे में काफी जानकारी दी. इस साहसिक खेल के बारे में उन्होंने पहले भी बहुत कुछ सुन रखा था. उन के भाई अमेरिका से हैंग ग्लाइडर की ड्राइंग भी लाए थे, साथ ही कुछ नोट्स भी. उन्होंने भारत में अपने प्रयत्न से पहला हैंग ग्लाइडर बनाया.

पूना में उन्होंने बनेर नामक स्थान पर, जहां कुछ ऊंची पहाडि़यां हैं, पहली बार उड़ान भरी. यह 1976 की गरमियों की बात है. पहली बार हवा में पक्षियों की तरह उड़ना उन्हें कितना रोमांचक लगा था, इसे वह शब्दों में व्यक्त नहीं कर सके. 1500 रुपए से बने हैंग ग्लाइडर में बहुत सी कमियां थीं, जिस के कारण पहली उड़ान में उन्हें बहुत चोटें आईं. मेजर को पक्षियों की तरह आकाश में उड़ता देख प्रिंट मीडिया ने इस आकाशीय खेल के बारे में पत्रपत्रिकाओं में काफी लिखा. अखबारों में इस खेल के बारे में लेख प्रकाशित होने के बाद बहुत से लोग, जिन में सेना व सिविलियन शामिल थे, उन से इस खेल का प्रशिक्षण ले कर आकाश में उड़ने लगे. यह खतरे का खेल था तथा इस के लिए बेहतर हैंग ग्लाइडरों की जरूरत थी.

इस खेल के बारे में जानकारी पाने के लिए आर्मी की ओर से उन्हें इंग्लैंड के बेल्स नामक स्थान पर 45 दिनों के लिए ट्रेनिंग कोर्स पर मई 1979 में भेजा गया. अपना प्रशिक्षण पूरा कर वह पूना लौटे. इस बार उन्होंने ब्रिटेन से 3 अच्छे ग्लाइडर खरीदे. इन ग्लाइडरों से उन्होंने हेरियर नामक ग्लाइडर का डिजाइन चुन कर पूना में स्वयं अपने ग्लाइडर बनाने शुरू किए. इन का नामकरण भारतीय पक्षी गरुड़ के नाम पर किया गया. विश्व के अच्छे हैंग ग्लाइडर पायलटों में विश्व कीर्तिमान स्थापित करने वालों में अमेरिका के लेरी ट्यूडर (225.5 मील) और महिला पायलटों में ब्रिटेन की जूड़ी लीडन (146 मील) ने लंबी दूरी तय की.

हिमाचल प्रदेश खूबसूरत पहाड़ी राज्य है. यहां के बर्फीले ऊंचे पहाड़, घने वन, सर्पीली सड़कें, ऊबड़खाबड़ रास्ते, साल भर नदियों में बहता पानी प्रदेशवासियों के लिए प्रकृति का वरदान है. हिमाचल में हर साल देशविदेश के खेलप्रेमी पर्वतारोहण, बर्फ पर फिसलने का खेल स्कीइंग, वेब से बहती नदी की उफनती लहरों में राफ्टिंग, सर्पीली सड़कों पर कार रैली, ऊबड़खाबड़ रास्तों पर ट्रेकिंग और मछली आखेट जैसी प्रतियोगिताओं में भाग लेने आते हैं.

अब यहां की ऊंची बंजर घाटियां, जो सालों से उपेक्षित थीं, आकाशीय खेल हैंग ग्लाइडिंग के कारण न केवल विश्व के मानचित्र पर अंकित हुई हैं, बल्कि खेलप्रेमियों में चर्चित हुई हैं. भारत तथा विदेशों के खेल प्रेमी हर साल इस जोखिम भरे खेल में भाग लेने आ रहे हैं. हिमाचल प्रदेश भारत का एकमात्र ऐसा राज्य है, जहां यह खेल खेला जाता है. इस खेल को करीब से देखने के लिए खेलप्रेमी ‘बिलिंग’ पहुंचते हैं. पाठकों के लिए बिलिंग नया नाम है. आइए, पहले बिलिंग चलते हैं.

पठानकोट-मंडी राष्ट्रीय उच्च मार्ग पर पठानकोट से 145 किलोमीटर दूर बीड़ रोड नामक स्थान आता है, जहां से एक पक्की सड़क चढ़ाई का मार्ग पार करती घने जंगलों के बीच से गुजर कर समुद्रतल से 2400 मीटर ऊंची बिलिंग घाटी को छूती है. यह घाटी सन 1984 तक उपेक्षित रही है. कभीकभार कोई गद्दी अपने भेड़बकरियों के रेवड़ सहित यहां से गुजर जाता था, क्योंकि बिलिंग बंजर, वीरान घाटी, जहां पानी की बूंद तक नहीं थी, जा कर कोई क्या करेगा? यही बिलिंग घाटी सन 1984 की गर्मियों में एक अनोखे साहसिक आकाशीय खेल हैंग ग्लाइडिंग के कारण विश्व के मानचित्र पर उभर कर आई. इस खेल को देखने के लिए पहली बार हजारों लोगों के पांव इस निर्जन घाटी पर पड़े.

बिलिंग घाटी ऊपर से समतल है. यहां एक साथ 40 हैंग ग्लाइडर खड़े करने की व्यवस्था है. दक्षिणपूर्व की ओर से 2 पायलट एक साथ उड़ान भर सकते हैं. इस खेल में कई किलोमीटर दूरी तक उड़ान भरी जा सकती है. अच्छी व सफल ग्लाइडिंग के लिए साफ आसमान और खिली हुई धूप का होना जरूरी है. हैंग ग्लाइडर के पायलट को थरमल (गर्म हवा के बुलबुले) ढूंढने आवश्यक हैं. इन के मिलने से ही पायलट 10-12 हजार फुट की ऊंचाई तक उड़ सकता है. बिलिंग घाटी की खोज मुंबई के दीपक महाजन और इंग्लैंड के जौन बाव ने सन 1983 में की थी. दोनों सफल पायलट थे. हिमाचल में 6 माह तक इन दोनों पायलटों ने कई घाटियों का सर्वे किया तथा अंत में बिलिंग घाटी को हैंग ग्लाइडिंग रैली के लिए उत्तम घोषित किया.

वेस्टर्न हिमालयन हैंग ग्लाइडिंग एसोसिएशन, पालमपुर द्वारा पहली बार 28 मई से 4 जून तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हैंग ग्लाइडिंग रैली का आयोजन किया गया. इस रैली में अमेरिका, ब्रिटेन, इटली, फ्रांस, स्विटजरलैंड, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, जर्मनी, चेकोस्लोवाकिया आदि देशों से 32 दिग्गज पायलटों ने भाग लिया. भारत की ओर से दीपक महाजन, कमांडर मोहन कुट्टी, मेजर विवेक मुंडकर, हवलदार शीश कुठियाल, लेफ्टिनेंट कर्नल वी.एस. प्रसाद, स्क्वाड्रन लीडर आर.पी. देव, शोएब अहमद आदि पायलटों ने उड़ान भरी.

इस प्रथम अंतरराष्ट्रीय हैंग ग्लाइडिंग रैली में पश्चिमी जर्मनी के पायलट रोमन मैनीज की लैंडिंग करते हुए मृत्यु हो गई थी, जिससे वहां तत्काल चिकित्सा सहायता उपलब्ध न होने से रैली में भाग ले रहे विदेशी पायलटों में रोष फैल गया. यह रैली निजी एसोसिएशन द्वारा फोर स्क्वैयर सिगरेट कंपनी के सहयोग से आयोजित की गई थी. अखबारों ने रैली आयोजकों की इस लापरवाही के लिए कटु आलोचना की. इन बातों को ध्यान में रखते हुए हिमाचल पर्यटन निगम एवं एयरो स्पोर्ट्स सोसायटी औफ हिमाचल प्रदेश ने हैंग ग्लाइडिंग रैली का आयोजन अपने हाथों में ले कर कुछ सालों तक इसे राष्ट्रीय स्तर पर ही आयोजित करने का निर्णय लिया. क्योंकि विदेशी पायलटों के मुकाबले भारतीय पायलटों के उड़ने का अभ्यास न के बराबर था.

सन 1985 से 1989 तक हिमाचल प्रदेश में 5 राष्ट्रीय स्तर की रैलियां संपन्न हुईं. वर्ष 1990 में हैंग ग्लाइडिंग रैली न करवा कर मई 1991 में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हैंग ग्लाइडिंग रैली आयोजित की गई. सन 1991 में संपन्न हैंग ग्लाइडिंग अंतिम रैली थी. इस के बाद बिलिंग घाटी पर हैंग ग्लाइडर के स्थान पर पैराग्लाइडिंग रैली की शुरुआत हुई. खेल क्षितिज पर नया खेल पैराग्लाइडिंग हैंग ग्लाइडिंग का ही परिष्कृत रूप है. हैंग ग्लाइडिंग की अपेक्षा यह खेल कम जोखिम भरा तथा कई अर्थों में सुविधाजनक है. इस की शुरुआत सन 1980 में फ्रांस से हुई थी. वर्ष 1985 तक यह खेल लोकप्रियता के शिखर चूमता हुआ यूरोप के सभी देशों में खेला जाने लगा.

पैराशूट के सिद्धांत पर बना पैराग्लाइडर मानव की आकाश में पक्षियों की तरह उड़ने की चाह को नई दिशा प्रदान करने में सक्षम सिद्ध हुआ. पैराशूट में आदमी हवाई जहाज से छलांग लगाता है और पैराग्लाइडिंग में वह ऊंची घाटी से नीचे कूद कर हवा में तैर जाता है. भारत में पैराग्लाइडिंग शुरू करने का श्रेय दिल्ली के केशव जैनी तथा विजय जैनी बंधुओं को जाता है. कनाट प्लेस दिल्ली में इन का आयातनिर्यात का व्यवसाय है. शनिवार व रविवार को वे दिल्ली से 60 किलोमीटर दूर औच नामक स्थान पर पैराग्लाइडिंग का अभ्यास करते थे.

जैनी बंधुओं को इस रोमांचक खेल की जानकारी उन के एक रिश्तेदार ने दी थी, जो सेना में कैप्टन थे. फिर तो उन्होंने विदेशी खेल पत्रपत्रिकाओं से इस खेल के बारे में काफी जानकारी प्राप्त की. वे भारत में हैंग ग्लाइडिंग की लोकप्रियता से परिचित थे. हैंग ग्लाइडिंग की अपेक्षा उन्हें पैराग्लाइडिंग काफी सुविधाजनक खेल लगा. उन्होंने भारत में इस खेल को शुरू करने का मन बना लिया. भारत सरकार के पर्यटन विभाग की अनुमति से उन्होंने ब्रिटेन के इस खेल के 2 प्रशिक्षक आर. स्कौट तथा डी. हापकिन को भारत में प्रशिक्षण देने के लिए बुलाया. इसी के साथ उन्होंने ब्रिटेन से 4 पैराग्लाइडर भी खरीदे.

जैनी बंधुओं ने ब्रिटेन से आए प्रशिक्षकों की देखरेख में 11 मई से 13 मई, 1991 तक इस खेल का प्रशिक्षण प्राप्त किया. फिर पहली बार भारत की ओर से 19 मई, 1991 को बिलिंग घाटी से सफल उड़ान भरी. उन दिनों बिलिंग घाटी पर दूसरी अंतरराष्ट्रीय हैंग ग्लाइडिंग रैली की प्रतियोगिता संपन्न हुई थी, जिस में भाग लेने के लिए आस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस, स्विटजरलैंड, स्वीडन, नार्वे, इटली, अमेरिका आदि देशों से 33 पायलट आए थे. इन में 3 महिलाएं भी शामिल थीं.

विदेशी पायलटों ने पैराग्लाइडिंग में भी शौकिया भाग लिया. इस प्रकार बिलिंग घाटी, जो हैंग ग्लाइडिंग खेल के कारण विख्यात थी, एक अन्य नए आकाशीय खेल पैराग्लाइडिंग से जुड़ गई. सन 1991 के बाद से बिलिंग घाटी पर प्रतिवर्ष पैराग्लाइडिंग खेल खेला जा रहा है. कई सालों से प्री वर्ल्ड कप रैली संपन्न होती रही, लेकिन इस बार अक्तूबर में वर्ल्ड कप पैराग्लाइडिंग का आयोजन हिमाचल पर्यटन निगम एवं एयरो स्पोर्ट्स सोसायटी औफ हिमाचल प्रदेश कर रही है.

हैंग ग्लाइडिंग की तरह पैराग्लाइडिंग में भी लीवर लगा होता है, जिस से पायलट आसानी से दाएंबाएं मुड़ सकता है. हैंग ग्लाइडिंग की तरह पैराग्लाइडिंग करते समय पायलट के पास अल्ट्रामीटर और बैरोमीटर यंत्र होते हैं, जिन से वह ऊंचाई और वायु दाब का पता लगाता है. पैराग्लाइडिंग में भी पायलट को थर्मल ढूंढने जरूरी हैं, जिन की सहायता से वह 12 हजार फुट की ऊंचाई तक उड़ान भर सकता है. पैराग्लाइडर उच्चकोटि के नायलोन अथवा डेकोरन से बनाया जाता है, जिस के फटने की आशंका बहुत कम होती है.

दुर्भाग्य से कहीं छेद भी हो जाए तो उस का विस्तार आगे नहीं होता. इस कारण दुर्घटना की गुंजाइश कम रहती है. पैराग्लाइडर में और भी कई खूबियां हैं, जिन के कारण हैंग ग्लाइडिंग की अपेक्षा पायलट पैराग्लाइडर उड़ाना अधिक पसंद कर रहे हैं. हैंग ग्लाइडर और पैराग्लाइडर में बड़ा अंतर इस के भार से है. हैंग ग्लाइडर का भार 70 से 80 पौंड होता है, जबकि पैराग्लाइडर का भार 20 से 25 पौंड तक. पैराग्लाइडर का भार कम होने से उसे पायलट आसानी से उठा कर पहाड़ी पर चढ़ सकता है. इसे एक थैले में पैक किया जा सकता है.

हैंग ग्लाइडर को ऊंची पहाड़ी तक ले जाने के लिए वाहन की आवश्यकता होती है. जहां वाहन न जा सके, वहां हैंग ग्लाइडर को उठा कर चढ़ाई चढ़ना असंभव है. इस का आकार इतना विशाल होता है कि चौड़ी सड़क के बिना इसे गंतव्य तक पहुंचाना मुश्किल है. हैंग ग्लाइडिंग व पैराग्लाइडिंग में सब से बड़ा अंतर टैंडम फ्लाइट का है. हैंग ग्लाइडर का पायलट अकेला हवा में उड़ता है, जबकि पैराग्लाइडर का पायलट अपने साथ एक व्यक्ति को ग्लाइडर पर बिठा कर उड़ान भर सकता है.

जिन लोगों को हवाईजहाज में यात्रा करने का अवसर नहीं मिला है, वे अपना शौक टैंडम फ्लाइट से पूरा कर सकते हैं. अब कई स्थानीय युवक पैराग्लाइडिंग में माहिर हो गए हैं. टैंडम फ्लाइट से उन्हें अच्छी आमदनी हो जाती है. यह फ्लाइट 10-12 मिनट की ही होती है, पर यह जिंदगी की यादगार बन जाती है. कमजोर हृदय वाले टैंडम फ्लाइट का मजा नहीं ले सकते. बिलिंग के अलावा कुल्लू घाटी के प्रसिद्ध पर्यटनस्थल मनाली के पास सोलंगनाला में भी टैंडम फ्लाइट होती है. देशविदेश के पर्यटक हवा में उड़ने के रोमांच का मजा लेते हैं.

पैराग्लाइडर की इन्हीं खूबियों के कारण अब महिलाएं भी पुरुष पायलटों के साथ पैराग्लाइडिंग में पीछे नहीं रही हैं. इस बार अक्तूबर महीने में हो रहे वर्ल्ड कप में कई महिला पैराग्लाइडिंग की कलाबाजियां दिखा कर हजारों दर्शकों को आश्चर्यचकित कर देंगी. पैराग्लाइडर पायलटों का खेल शुरू होने से पहले ब्लड ग्रुप ले कर खून की व्यवस्था की जाती है, ताकि दुर्घटना होने की स्थिति में खून की व्यवस्था में परेशानी न हो. इस के अतिरिक्त सभी पायलटों का व्यक्तिगत बीमा और ग्लाइडर का बीमा किया जाता है. Hindi Stories

लेखक – अशोक सरीन 

और कहानियां पढ़ने के लिए क्लिक करें...