Social stories: आजकल टीवी मनोरंजन का सब से बड़ा साधन है. लेकिन टीवी पर अच्छे मनोरंजक प्रोग्राम कभीकभी ही नजर आते हैं. ‘भाबीजी घर पर हैं’ एक ऐसा सीरियल है, जिसे हर दृष्टि से मनोरंजक कहा जा सकता है. साथ ही सोद्देश्य भी.
टी वी जिसे दूरदर्शन के जमाने में बुद्धू बक्सा कहा जाता था, अब बुद्धू नहीं रहा. बुद्धू इसलिए नहीं क्योंकि अब यह स्मार्ट बन कर मोटी कमाई करने लगा है. लाखों लोगों की रोजीरोटी चलाने लगा है. और हां, अच्छे पढ़ेलिखों को बेवकूफ भी बनाने लगा है. कमाई को देखते हुए अब कभी के इस बुद्धू बक्से पर दर्जनों इंटरटेनमेंट चैनल आ गए हैं. न्यूज चैनलों की तो भरमार है ही. टीवी पर तमाम प्रोग्राम बने हैं, बन रहे हैं. कुछ अच्छे तो कुछ बुरे लेकिन अपनेअपने कंटेंट के हिसाब से चलते सब हैं. वैसे यह सब भी चैनल्स पर निर्भर करता है कि किस प्रोग्राम को कितने दिन चलाना है, दर्शकों पर नहीं. अब कलर्स के ‘बालिका वधू’ को ही ले लीजिए, जो एक अच्छे उद्देश्य, अच्छी कहानी और अच्छे कलाकारों के साथ शुरू हुआ था.
लोगों ने इसे पसंद भी किया लेकिन अब बोझ से लगने वाले इस सीरियल को चैनल रबर की तरह खींचे जा रहा है. टीआरपी से भी उसे कोई लेनादेना नहीं. कहानी तो मूल कहानी से भटक कर कहीं से कहीं चली ही गई, कलाकार भी वक्तवक्त पर बदलते रहते हैं. शुरू की बालिका वधू भी अब जवान हो गई.
ऐसा नहीं है कि दूरदर्शन या दूसरे चैनल्स पर अच्छे प्रोग्राम्स नहीं आते. कई यादगार सीरियल्स आए. दूरदर्शन के ‘हमलोग’, ‘बुनियाद’, ‘ये जो जिंदगी’, ‘कथा सागर’ और ‘तमस’ को भला कौन भूल सकता है. जहां सवाल दूसरे इंटरटेनमेंट चैनल्स का है तो उन पर सिर्फ इंटरटेनमेंट (उन के हिसाब से) रचा जाता है. इस इंटरटेनमेंट में अगर आप समाज या परिवार के लिए कोई मैसेज ढूंढने लगें तो यह सिर्फ एक छलावा ही साबित होगा. अलबत्ता भव्यता जरूर आप को प्रभावित करेगी.






