कलाकार: चंदन राय, चंदन राय सान्याल, कुब्रा सैत, मनु ऋषि चड्ढा, प्रियांशु पेन्युली, श्रुति मेनन, मंजरी पुपला, आशीष थपलियाल, ज्ञान प्रकाश, गौरव कोठारी, श्रुति जौली, संजय शिव नारायण आदि.
निर्देशक: नवदीप सिंह
निर्माता: औफरोड फिल्म्स,
संगीतकार: शिवांश जिंदल
छायांकन: विशाल विट्ठल
लेखक: नवदीप सिंह और देविका भगत
प्लेटफार्म: अमेजन प्राइम वीडियो
एपिसोड: 8
अमेजन प्राइम वीडियो पर दिखाई जाने वाली वेब सीरीज ‘शहर लखोट’ (Shehar Lakhot) है तो आपराधिक, लेकिन अब तक आ चुकी वेब सीरीजों से यह थोड़ा हट कर है. इस वेब सीरीज (Web Series) में वह सब लाने की कोशिश की गई है, जिस की वजह से कभी ‘मनोहर कहानियां’ पत्रिका (Manohar Kahaniyan) देश की नंबर वन पत्रिका थी. लेकिन अपराध कथाओं के साथ दिक्कत यह है कि हर बार वह नया स्वाद मांगती है, जबकि ‘शहर लखोट’ में वही नहीं है.
वेब सीरीज ‘शहर लखोट’ नवदीप सिंह (Navdeep Singh) ने देविका भगत (Devika Bhagat) के साथ मिल कर लिखी है. लेकिन इस में ऐसा कुछ भी नहीं है, जो पहले नहीं देखा गया है. इस अपराध कथा का मुख्य आधार खनन माफिया है. इस की पटकथा को इस तरह लिखा गया है कि इस में सब कुछ दिखाने की कोशिश की गई है. लेकिन इस में कोई भी ऐसा सीन नहीं है, जिस पर दर्शकों की नजर गड़े या प्रभावित करे या सोचने को मजबूर करे.
सीरीज में पुलिस विभाग को तो माफिया और नेताओं का नौकर बना दिया गया है. यहां तक कि थाने का इंसपेक्टर नेता के लिए एक दूसरे नेता की हत्या तक कर देता है, जो सत्य से एकदम परे लगता है. इतना ही नहीं, बाद में पुलिस इंसपेक्टर भी मार दिया जाता है और पुलिस सब कुछ जानते हुए भी उसे गुमशुदा घोषित करने की कोशिश करती है.
इन बातों से सीरीज नाटक लगती है. जबकि दर्शक सत्य के साथ सस्पेंस भी देखना चाहते हैं. लेकिन इस सीरीज में न सस्पेंस है और न ही सत्य. जिन लोगों ने ‘मनोहर कहानियां’ पढ़ी है, उन्हें पता है कि अपराध कथाएं क्या होती हैं और कैसी कथाएं देखने या पढऩे में अच्छी लगती हैं.
अगर शहर लखोट के लेखकों ने ‘मनोहर कहानियां’ ध्यान से पढ़ी होती तो शायद उन्हें समझ होती कि दर्शक क्या चाहता है. पूरी सीरीज देख लेने के बाद भी पता नहीं चलता कि लेखक कहना या दिखाना क्या चाहते हैं. न पुलिस की भूमिका सशक्त लगती है न माफिया की और न नेता की. सारा कुछ गड्डमड्ड हो गया है.
कहानी का नायक हर जगह पिटता नजर आता है. वह न परिवार के लिए कुछ कर पाता है और न अपने बौस के लिए और न अपने लिए. अंत में निराश हो कर लौट जाता है. नेताओं की भूमिका भी कहीं खास नजर नहीं आती. खनन माफिया आधी हिंदी और आधी अंगरेजी में अटका रहता है. यह भी साफ नहीं हो पाता कि वह करता क्या है और करना क्या चाहता है?
इस में अभिनय करने वाला कोई भी कलाकार दर्शकों को न तो अपने अभिनय से प्रभावित कर पाता है और न ही बोली, भाषा या डायलौग से. सब से दुखद तो यह है कि कहानी में कोई चौंकाने वाला खुलासा नहीं होता, जिस का दर्शकों को इंतजार रहता है. इस सीरीज में सब से बड़ी कमी यह है कि इस के हर किरदार में सिर्फ ऐब ही ऐब है.
कोई भी ऐसा कलाकार नहीं है, जिस में कोई अच्छाई नजर आती हो. यह भी पता नहीं चलता कि हीरो कौन है और खलनायक कौन. ऐसी वेब सीरीज को देखना समय नष्ट करना है. हमारे खयाल से तो इसे न ही देखा जाए तो अच्छा रहेगा.
एपीसोड-1
पहले एपीसोड की शुरुआत शहर लखोट से होती है, जहां शहर के बाहर खेल रहे बच्चों को एक लाश दिखाई देती है. इस के बाद गुरुग्राम के एक गैंगस्टर का औफिस दिखाया जाता है, जहां देव यानी देवेंद्र सिंह तोमर उस के लिए काम करता है. देव की भूमिका प्रियांशु पिनयुल ने की है. वह अपनी भूमिका में न हीरो नजर आता है और न खलनायक. जहां भी जाता है, केवल पिटता ही है.
गैंगस्टर उसे शहर लखोट जाने को कहता है, अपने क्लाइंट कैरव सिंह की मदद के लिए. कैरव का रोल चंदन राय सान्याल ने किया है. वह अपनी पूरी भूमिका में नाटक करता नजर आया है, जबकि सीरीज में उस का महत्त्वपूर्ण रोल है. दरअसल, वहां के आदिवासी आंदोलन कर रहे होते हैं. देव को इस से छुटकारा दिलाने के लिए लखोट भेजा जाता है. देव बहुत दिनों से लखोट नहीं गया था, इसलिए वहां अपना रौब दिखाने के लिए अपने बौस की फाच्र्युनर मांगता है.
फाच्र्युनर गैंगस्टर की रखैल पिंकी की थी. देव फाच्र्युनर ले कर लखोट स्थित माइनिंग पर जाता है, जहां कक्षदारों का लीडर विकास प्रोटेस्ट कर रहा होता है. विकास की भूमिका में चंदन राय है, जो कहीं से लीडर नजर नहीं आता. देव पैसा ले कर विकास से आंदोलन खत्म करने को कहता है, पर विकास इस के लिए साफ मना कर देता है. इस के बाद कैरव सिंह अपने कुत्ते को गोली मार देता है.
लखोट थाने के एसएचओ राजबीर सिंह रंगोट से उसे फेंकने को कहता है. इस के लिए राजबीर सिंह खुद को बहुत अपमानित महसूस करता है. इंसपेक्टर राजबीर सिंह रंगोट का रोल मनु ऋषि चड्ढा ने किया है. उस में कहीं भी पुलिसिया रौब नजर नहीं आता. वह नेताओं और गुंडों का नौकर बन कर रह गया है. कैरव सिंह विकास को अपने घर समझौता करने के लिए बुलाता है, पर विकास अपनी बात पर अडिग रहता है.
देव अपने पिता से मिलने उन के औफिस जाता है, जहां उस की अपने बड़े भाई जयंत से लड़ाई हो जाती है. यहां पता चलता है कि 10 साल पहले देव ने किसी का कत्ल किया था, जिस की वजह से उस के घर वालों ने उस से रिश्ता खत्म कर लिया था और इंसपेक्टर राजबीर भी उसे पसंद नहीं करता.
देव अपने पिता से मिलने घर जाता है, जहां उस की भाभी विदुषी उसे देख कर बहुत खुश होती है. पर पापा आज भी उस से बहुत नाराज हैं. पापा उसे घर से निकाल देते हैं तो वह घर के बाहर खड़ा रहता है. देव के पापा की भूमिका ज्ञान प्रकाश ने की है तो विदुषी की भूमिका में श्रुति जौली हैं.
तभी कुछ गुंडे उस के भाई जयंत को पैसों के लिए मारते हैं. देव कुछ कहने के बजाय अपनी पूर्व प्रेमिका संध्या के घर चला जाता है. संध्या का रोल श्रुति मेनन ने किया है. यहां पता चलता है कि देव ने जो 10 साल पहले हत्या की थी, वह संध्या के लिए ही की थी. क्योंकि जिस का कत्ल हुआ था, वह संध्या को छेड़ रहा था.