Hindi Stories: पिता के प्यार को समझना उतना आसान नहीं होता, जितनी आसानी से मां के प्यार को समझा जा सकता है. पिता का प्यार क्या होता है, यह मैं ने उस दिन जाना, जब मैं...

वह दिल्ली की दिसंबर की ठंड से कांपती सुबह थी, जब मैं अपना घर छोड़ कर भाग खड़ा हुआ था. उस समय सुबह के 5 बज रहे थे. मैं तंग आ चुका था अपनी जिंदगी से. खासतौर पर अपने पिता के व्यवहार से तो मैं इतना थक गया था कि अब उन की शक्ल भी नहीं देखना चाहता था. सच तो यह था कि मुझे न सिर्फ अपने पिता से, बल्कि अपने पूरे परिवार से नफरत हो गई थी. घर जाता तो वहां मेरा दम घुटता था. इसलिए मैं ने फैसला कर लिया था कि अब कभी वापस नहीं लौटूंगा.

बचपन से ले कर आज तक मुझे हर कदम पर समझौता करना पड़ा था. और तो और अब मैं अपनी पसंद की लड़की से शादी भी नहीं कर सकता था. यह तो हद ही हो गई थी. शादी न करने की वजह थी, मेरे महान पिता की यह सोच कि लड़की बड़े घर की है, ज्यादा पढ़ीलिखी है, हाईक्लास. बड़ी सोसायटी में उठनेबैठने वाली. वह हमारे घर में एडजस्ट नहीं कर सकेगी. उन का कहने का अंदाज कुछ ऐसा था, जैसे लड़की न हो कर कोई सोफा सेट हो, जिसे घर में फिट करने की बात कर रहे हों. भला यह भी कोई वजह होती है किसी लड़की को रिजैक्ट करने की?

शायद वह चाहते थे कि मैं ऐसी लड़की से शादी करूं, जो अंगूठा छाप हो. छोटे से दो बाई दो के कमरे में रहती हो और दिमाग से पैदल हो. मतलब अगर उसे सोसायटी की समझ आ गई, तो फिर वह घर की बहू बनने लायक नहीं रहेगी. ऐसे महान विचार थे मेरे पिता के.

आगे की कहानी पढ़ने के लिए सब्सक्राइब करें

डिजिटल

(1 साल)
₹ 399₹ 299
सब्सक्राइब करें

डिजिटल + 12 प्रिंट मैगजीन

(1 साल)
₹ 1239₹ 799
सब्सक्राइब करें

बुकलेट की सुपर डील!

(डिजिटल + 12 प्रिंट मैगजीन + बुकलेट!)
₹ 1514₹ 999
सब्सक्राइब करें
और कहानियां पढ़ने के लिए क्लिक करें...