Family Betrayal Story: तुम्हारे आखिरी दाग की निशानी मेरे वजूद पर लग चुकी है और शायद इसी से मेरी बेनाम जिंदगी की शुरुआत हो. यही दाग मेरे जीने का बहाना बन जाए. तुम्हारी दलील अपनी जगह सही है कि एक वक्त में 2 इंसानों को एक जैसा, एक ही जितना प्यार किया जा सकता है.   जब मैं 9 साल की थी और मेरा भाई 3 साल का तो मेरी मां ने मेरे लखपति बाप जफर अली खां से तलाक ले कर अजीज मियां से शादी कर ली थी, जो नयानया दौलतमंद बना था. उस ने भी अपनी बीवी को तलाक दे कर मम्मी से

शादी की थी. मगर पहली बीवी से उस के कोई औलाद नहीं थी, जबकि मम्मी हम बहनभाई को छोड़ कर उस की बीवी बन गई थीं. अहमद को तो अब्बू ने अपने पास मुंबई में रख लिया था. वह वहीं बिजनैस करते थे, मुझे पूना भेज दिया गया था, जहां मेरी दादी और दादा रहते थे. मेरे अब्बू अपने मांबाप की एकलौती औलाद थे, इसलिए मुझे दादीदादा से भरपूर प्यार मिला. मगर वह प्यार भी मेरी शख्सियत में जगह बना लिए उस खालीपन को न भर सका, जो मांबाप से बिछुड़ने की वजह से पैदा हुआ था. दादाजान के पास भी दौलत की कोई कमी नहीं थी, मगर वह बड़े कठोर और उसूल वाले इंसान थे.

अगर मुझे नाश्ते या दोपहर और रात के खाने पर डायनिंग रूम में पहुंचने में एक मिनट की भी देर हो जाती तो मेरा कोर्टमार्शल हो जाता. इसी तरह अगर मैं क्लास में सेकेंड या थर्ड आ जाती तो दो ट्यूटर लगा दिए जाते. जब तक मैं जूनियर स्कूल में रही, मुझे चूडि़यांबुंदे तक पहनने की इजाजत नहीं थी. लेकिन दादी अपनी अलमारी खोल कर खूबसूरत जेवरात दिखातीं और कहतीं, ‘‘कंवल बेटी! यह सब कुछ तेरा है, मगर अभी नहीं.’’

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