Superstition: खजाने के लिए मासूम जाकिर की बलि देने वाले इमरान को खजाना नहीं मिला तो उसे बड़ा अफसोस हुआ. अपने इसी अपराधबोध की वजह से वह बेचैन रहने लगा. बेचैनी कम करने के लिए वह हज करने गया. उस के बाद भी...

उत्तर प्रदेश के शहर अलीगढ़ की कोतवाली के मोहल्ला पठानान में रहती थी संजीदा बेगम. उन के कुल 11 बच्चे थे. बच्चे बड़े होने लगे तो उन का घर छोटा पड़ने लगा. उन्होंने सोचा कि एक मकान और ले लिया जाए तो परिवार आराम से रह सकेगा. संजीदा बेगम के बड़े बेटे इमरान का फलों का कारोबार था. उन्होंने इमरान से कहा कि उन्हें एक मकान और खरीद लेना चाहिए. इस के बाद वह मकान के लिए जमीन की तलाश में लग गया. तभी उसे बहन से पता चला कि उस के पड़ोस में रहने वाली मुन्नी दरजिन का मकान बिक रहा है. उस की बहन गुलफ्शां बाबरी मंडी में रहती थी. उस ने वह मकान अपनी मां संजीदा बेगम के नाम से खरीद लिया.

वह मकान काफी पुराना था, इसलिए संजीदा बेगम उसे अपने हिसाब से बनवाना चाहती थीं. उन्होंने अपने हिसाब से मकान बनवाना शुरू भी कर दिया. मकान बनाने का ठेका उन्होंने आमिर को दिया, जो अपने साथियों बाबू, इरफान, शहजाद और राजू के साथ मकान तोड़वाने लगा. यह जनवरी, 2014 की बात है. संजीदा बेगम को क्या पता था कि यह मकान ले कर उस ने अपने लिए मुसीबत खड़ी कर ली है. मकान का काम अभी शुरू ही हुआ था कि 11 मार्च, 2014 को इमरान अपने छोटे भाई शाजेब के साथ कोतवाली पहुंचा. उस ने कोतवाली प्रभारी मोहम्मद हनीफ त्यागी को बताया कि उस के निर्माणाधीन मकान के एक कमरे में एक 11-12 साल के बच्चे की लाश पड़ी है, जिस की गरदन काट कर हत्या की गई है.

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