Hindi stories: समाज की यही सोच है कि तवायफ सिर्फ पैसों से प्यार करती है, लेकिन कजरी अपने प्रेमी जावेद के बेटे को जिस तरह पालपोस कर बड़ा कर रही है, उस से साफ साबित होता है कि तवायफ के अंदर भी दिल होता है, जो किसी से प्यार भी कर सकता है.
शहर के बीच बने उस प्रमुख बाजार में काफी रौनक थी. सड़क किनारे दोनों ओर दुकानें बनी थीं तो उन के ऊपर रहने के लिए मकान बने थे. उन मकानों पर जाने के लिए दुकानों के बराबर सीढि़यां बनी थीं. यह बात अलग थी कि उन पर चढ़ने से ज्यादातर लोग कतराते थे. मकानों की रैलिंग और खिड़कियों पर रंगबिरंगी भड़काऊ पोशाक व चेहरोें पर गाढ़ा मेकअप पोते लड़कियां खड़ी रहती थीं. सड़क पर आनेजाने वाले लोग कनखियों से उन की ओर देखते तो आंखों व हाथों को नचा कर इशारे कर दिया करती थीं. जहां वे रह रही थीं, वहां की भाषा में वे तवायफों के कोठे थे.
नीचे जो बाजार थी, वहां कपड़े, राशन, हार्डवेयर, चाय आदि की दुकानें थीं. ये कोठे अंगरेजों के जमाने से भी पहले से आबाद थे. लोग समाज से नजरें चुराने की नाकाम कोशिश करते हुए सीढि़यां चढ़ जाया करते थे और उसी अंदाज में तेजी से उतर कर बाजार की भीड़ का हिस्सा बन कर ओझल हो जाया करते थे. मुद्दतों से यही सिलसिला चला आ रहा था. सीढि़यों से कोठे तक न जाने कितनी यादें, किस्से और कद्रदानों के राज दफन थे. उन कोठों की चारदीवारियों ने कई तवायफों की इठलाती जवानी और उन की रेशमी जुल्फों में बड़ेछोटे धन्नासेठों को उलझते देखा था. जिन चेहरों का आकर्षण लोगों को अपनी तरफ खींचता था, उन्हें वक्त के साथ बेरौनक होते हुए भी देखा था.






